Wednesday, 30 December 2015

भरोसे के पाकिस्तानी नाव पर सवार मोदी...

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विपक्ष के शोर-शराबे के काल्पनिक समुद्री लहर में पाकिस्तानी नौके पर सवार होकर बेहताशा शांति और भाईचारे के तलाश में भागे चले जा रहे हैं| नौके में ताशकंद, शिमला, कारगिल, मुंबई ब्लास्ट जैसे काफी छेद हैं फिर भी जबतक की उनका नौका डूब ना जाए वो मानने को तैयार नहीं की उनका नौका डूब सकता है| इतना ओवर कॉन्फिडेंस उन्हें बेशक चुनाव का समुद्री लहर डूबा ले जायेगी अगर इस बीच कोई अनहोनी हो गयी तो| सारा दोष मोदी के ऊपर जाएगा| अभी तो डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, स्वच्छ भारत या क्लीन गंगा जैसे उनके अभियानों की चर्चा दूर-दराज के गांवों में उनकी विफलता के उदाहरण में गिनाये जाते हैं| फिर भी तो गोल्ड स्कीम लाने का सुझाव उन्हें किसने दिया, उसे ढूंढ़कर ‘ग्रेट थिंकर ऑफ़ द वर्ल्ड’ का अवार्ड दिया जाना चाहिए| वे अपने सिपह्सलाहरों की भंवर में फंसकर मान बैठे हैं की वे जो भी फैसले लेंगे, जनता उसे सिर-आँखों पर लेगी| वे इंदिरा की तरह मानने लगे हैं की ‘मोदी इज इंडिया’!
              मोदी अपने कार्यकाल के दूसरे साल में 2.5 लाख किलोमीटर की विदेश यात्रा कर चुके हैं| इस बार तो हद ही कर दी, गए थे रूस आते समय उतर गए पाकिस्तान में| पता है, उनके इस फैसले से पूरा देश सन्न रह गया| पाकिस्तान, जहाँ की मिट्टी को चूमने वाले हर भारतीय प्रधानमंत्री को बदले में खंजर ही मिला है| यह सच्चाई है उस पाकिस्तान की जिसने हमेशा भारत की बर्बादी के सपने देखे हैं, उसे बर्बाद करने की कई सफल साजिश भी की है| चंद पाकिस्तानियों की वजह से हमारी घाटी सुलग रही है| कश्मीरी पंडितों को फिर से बसाने का दावा करने वाले मोदी असहाय-बेबसी से पाकिस्तान की तरफ देख रहे हैं| 17 साल पहले अटल ने भी कोशिश की की थी भाईचारा निभाने की, लेकिन क्या हुआ? आज चीन हमारे कश्मीर से सड़क ले गया, वहां हवाई अड्डे बना रहा है, रेल की पटरियां बिछा रहा है, लेकिन हम क्या कर रहे हैं? वही तोता-रटंत जुमले की ‘कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है’ वो भी तब जब पाकिस्तान हमारी कश्मीर की दो-तिहाई हिस्से पर कब्जे कर चुका है| नेहरु की बसाई कश्मीर भंवर में हमारा कोई प्रधानमंत्री संयुक्त राष्ट्र से आगे क्यों नहीं सोच पाता? देश को अब तो जानने का अधिकार मिलना ही चाहिए की ऐसा कौन सा डर है जो मोदी जैसे स्पष्टवादी व्यक्ति को भी मौन धारण करा देता है? कब तक हम POK को सिर्फ भारत के नक़्शे पर ही दिखाते रहेंगे? क्या मजबूरी है हमारे देश की?
                   क्या हम युद्ध से डरते हैं या हमारी डर की वजह इस्लामिकImage result for modi with nawaz imageImage result for modi with nawaz image देश हैं? या हम अमेरिका के इशारों पर चलने के लिए बेबस हैं? हम सम्पूर्ण प्रभुतत्व संपन्न परमाणु शक्ति हैं, लेकिन किस काम के? 125 करोड़ आबादी वाले देश को 18 करोड़ आबादी वाला पाकिस्तान जैसा मामूली और भ्रष्ट देश परमाणु हमले की धमकियाँ देकर डरा जाता है| हमारे सैनिकों के सिर काट लिए जाते हैं, पाकिस्तान में बैठकर भारत के हृदय मुंबई को दहला देने की सफल साजिश रची जाती है, सीमा पर अंधाधुंध गोलीबारी करके सैकड़ों मासूमों की जान ले ली जाती है| हमारे साथ ही ऐसा क्यों होता है? चाइना के साथ ऐसा क्यों नहीं होता, इजराइल के साथ ऐसा क्यों नहीं होता? क्योंकि हमारे देश के तथाकथित शांतिप्रिय और सहिष्णु लोगों ने हमारे परमाणु अस्त्रों को चूड़ियाँ पहना रखी है| ‘नो फर्स्ट यूज़’! मतलब हम पहला प्रयोग नहीं करेंगे| जब तक की पाकिस्तान अपने परमाणु बम हमपर न गिरा जाए| हंसी आती है मुझे ऐसे मूर्खतापूर्ण समझौतों से, क्योंकि तब न तो बम के बटन दबाने के लिए हमारे प्रधानमंत्री मौजूद रहेंगे और न ही पाकिस्तान पर निंदा प्रस्ताव पास करने के लिए हमारे नुमाइंदे! और न रहेगी इन सब का विश्लेषण करने के लिए हमारी जनता| क्योंकि पाकिस्तान कभी नहीं कहता की हम पहला प्रयोग नहीं करेंगे!
              हमारे प्रधानमंत्री बखूबी जानते हैं की इस तरह की यात्राओं से उन्हें कुछ हासिल नहीं होने वाला! नवाज शरीफ तो प्रधानमंत्री के पुतले हैं| पाकिस्तान में सेना की ताकतों के आगे सारा पॉलिटिक्स नतमस्तक है| ऐसा हमने तख्तापलट के रूप में कई बार देखा है| बेशक, हम जानते हैं की भारत और पाक के बीच मधुर संबंध स्थापित हो जाए तो दोनों को हथियारों पर की जाने वाली बेहताशा खर्च दोनों देशों की गरीबी, अशिक्षा का उन्मूलन करने में सार्थक होगी| ऐसे में न तो दोनों को हथियार के लिए अमेरिका-रूस की चमचागिरी करनी पड़ेगी और न ही उनके उलुलजुलुल के प्रतिबंधों को मानने के बाध्यता| फिर भी ऐसा करने कौन देगा दोनों देशों को? संयुक्त राष्ट्र जैसी दोगली मानसिकता वाली संस्था के रहते विश्व-शांति दूर-दूर तक फटक भी नहीं सकती| अमेरिका के टुकड़ों पर पल रही पाक की कश्मीर पर सीनाजोरी पर सारा संसार आँखें मुंदा बैठा है| हथियार के पैसे से फल-फुल रहे अमेरिका के पैरों में बेड़ियाँ पहनाने की जुर्रत इजराइल के अलावा है किसी में? इस सदी में तो दुनिया में शान्ति हो ही नहीं सकती क्योंकि, इस शोरशराबे से भरी दुनिया में शांति की वकालत वो करता है जिसने कभी ‘डाईनामाइट’ की अविष्कार की थी? (अल्फ्रेड नोबेल)...

लेखक:- अश्वनी कुमार, पटना जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’(ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... आते रहिएगा...


Monday, 28 December 2015

मेरी इलाहाबाद यात्रा...(सेकुलरिज्म से मेरा परिचय)

नमस्कार! पिछले कुछ दिनों से मैं प्रतियोगिता परीक्षा के तैयारियों में जुटा था, इस कारण मेरे पाठकों को नए-नए ब्लॉग से महरूम रहना पड़ा| खैर, परीक्षा के सिलसिले में मुझे अपने दोस्त राजीव के साथ इलाहाबाद जाना था| 19 दिसम्बर की सुबह हमदोनों ने पटना जंक्शन से ट्रेन पकड़ी और खड़े-खड़े पूरी यात्रा की| वहां पहले से मौजूद पटना शहर के दो और परीक्षार्थी अपने कुशल व्यक्तित्व से मेरे दोस्त बन गए| बता दूँ की उनमें से एक मुसलमान था, और उसका नाम आलम था| ये मेरे लिए हैरत की बात थी क्यूंकि आजतक मैंने संघ के दर्शन को मानते हुए कभी ऐसे किसी भी शख्स को नहीं देखा था जो मेरे विचारों पर खड़ा उतरता हो| छः-सात सालों का लम्बा समय मैंने विभिन्न समुदायों के छात्रों के साथ कोचिंग और कॉलेजों में गुजारा है| पटना, एक ऐसा शहर जहाँ हर-एक धर्मों का मिलन स्थल है| यहाँ जैन का भी पवित्र मंदिर है तो बोद्ध का पावन स्तूप भी है तो ईसाईयों के बड़े-बड़े चर्च (पादरी की हवेली) भी हैं| दशमेश गुरु गुरु गोविन्द सिंह जी की जन्मस्थली पर तो आम दिनों में सिखों से ज्यादा दुसरे समुदाय के लोग गुरुवाणी शबद का आनंद ले रहे होते हैं| मुसलमानों के इबदातखानों की तो भरमार है| बेशक, यहाँ की बहुसंख्यक आबादी हिन्दू है लेकिन हिन्दुओं का सहिष्णु व्यवहार अगर किसी सेक्युलर बयानवीरों को देखना है तो वो पटना आये, घूमकर इसकी वास्तविकता देखे| पर कोई ऐसा करेगा ही क्यों?

इलाहाबाद पहुँचने के बाद मैं, राजीव, रिक्की और आलम हम चारों ने स्टेशन के पास एक होटल लिया| कुछ देर तक पढने के बाद शाम को कमरे में मैं और रिक्की देश के कुछ ज्वलंत मुद्दों पर शालीनता से डिस्कशन कर रहे थे ताकी कुछ मनोरंजन हो जाए| उस वक्त आलम चुपचाप बैठा था, जब हमदोनों ने असहिष्णुता-संप्रदायिकता का जिक्र किया तो वो एकाएक बरस पड़ा| कहने लगा “अगर देश के साथ कोई मुसलमान गद्दारी करता है तो सबसे पहले उसे वह गोली मारेगा और साथ ही आमिर जैसे लोगों की जमकर आलोचना की| उसने कहा “कभी किसी राजनीतिक दल ने या किसी धर्मगुरुओं ने उससे कभी पूछने की जहमत क्यूँ नहीं उठाई की की वास्तव में वो चाहता क्या है? उसकी तकलीफ क्या है? कौन होते हैं ये लोग जिनकी एक बयान से सारे सेक्युलर हाय-तौबा करने लगे? बहुत ऐसे हैं जो खाते भारत का हैं और गाते पाक का हैं? हमें सुविधाएँ पाक सरकार तो नहीं देती? फिल्म बनाना है तो भारत आना है, गायक बनना है तो भारत आना है, हीरो-हेरोइन बनना है तो भारत आना है, सामान बेचना है तो भारत आना है, बम फोड़ना है तो भारत आना है| तो क्या सिर्फ बम बनाने के लिए देश का बंटवारा किया था?   कभी आकर देखा है हमारे इलाकों की सहिष्णुता को की भेदभाव किसे कहते हैं? बता रहा था की उसके इलाके में मुस्लिम महिलायें बुर्के पहनकर हिन्दुओं के घर शादी-पार्टी में जाया करती है, इसे मीडिया क्यों नहीं दिखता? खुले विचारों वाला आलम अपने इस्लाम से जितनी मोहब्बत करता है, उतना ही वो दुसरे धर्मों की इज्जत भी करता है और अजब-गजब धार्मिक पाबंदियों की मुखर आलोचना भी| इलाहाबाद में ही वे हम सभी के साथ संगम स्नान के लिए तैयार था लेकिन वक्त की कमी के कारण जा नहीं पाए| वापस लौटते समय ट्रेन की खचाखच भीड़ में भी वो हमलोगों के साथ संगम पुल से गुजरते वक्त माँ-गंगा को प्रणाम किया और उसने महाकुम्भ में इलाहाबाद आने की इच्छा दिखाई| उसके तौर-तरीकों से तो हम सभी लोग हैरान थे| इसे कहते हैं सेकुलरिज्म! प्रधानमंत्री जी कहते हैं ना की अलवर के इमरान में बसता हैं मेरा भारत; वैसे ही मैं कह सकता हूँ की पटना के आलम में बसता है मेरा हिंदुस्तान, पटना के आलम का है यह हिंदुस्तान|

फिर भी इनसब से अलग वापस लौटते हुए ट्रेन में लगभग पन्द्रह-बीस हजार परीक्षार्थियों की उबाऊ भीड़ साँस लेने में तकलीफ दे रही थी| ट्रेन को आये कुछ ही देर हुआ था की स्टेशन पर एक दम्पति मेरे ही बोगी में चढ़ा| महिला सम्मान के तकाजे से एक लड़के ने उनके लिए सीट छोड़ दिया| भीड़ इतनी थी की आजतक मैंने खड़े-खड़े भी ऐसी यात्रा नहीं की| किसी को पैर हिलाने के पहले सोचना पड़ता था, बैठना दूर की बात थी| दोनों को वाराणसी में उतरना था, सो ट्रेन चल पड़ी| वे शख्स मेरे ही पास थोड़ी सी जगह बनाकर खड़े थे| दोस्तों के साथ हो रही डिस्कशन में वे दोनों पति-पत्नी शामिल हो गए| मैंने लगभग दो घंटे तक उस शख्स से काफी बातचीत की| उन दोनों का कम्युनिकेशन स्किल बेहद उच्च क्वालिटी का था| मुझे एहसास हो रहा था की ये बिल्कुल प्रोफेशनल हैं| तभी मैंने पूछ दिया की आप करते क्या हैं? पहले तो हंसे, फिर बताया की वे बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी (BHU) के सिक्यूरिटी एडवाईजर हैं और वो इसी प्रतियोगिता परीक्षा के सिलसिले में आब्जर्वर बनकर वहां आये थे| ये सुनकर बोगी के सारे लड़के उनका मुंह देखने लगे तभी मैंने सवाल किया की आप इतने सक्षम होने के बावजूद भी जनरल बोगी में खड़े-खड़े यात्रा कर हैं? चाहते तो तत्काल टिकट ले सकते थे? फिर उन्होंने मुझे बताया की जब वो दिल्ली, गाजियाबाद या मेरठ जाते हैं तो ऐसी ही भीड़ का सामना करने को मजबूर हो जाते हैं और उनका शरीर मुश्किलें झेलने को आदि है इसलिए वे जिन्दगी में हर मुश्किल से आसानी से लड़ लेते हैं| और भी काफी बातें हुई जिसे लिखना संभव नहीं, अंततः वाराणसी में हाथ मिलकर वे उतर गए और मैं खड़े-खड़े 12 घंटे का सफ़र तय करके पटना पहुँचा तब तक सुबह हो चुकी थी...

अविश्मरनीय बात रही की पहले आलम के साथ और अब इन दोनों के साथ खासकर एक बात कॉमन थी की दोनों इस्लाम को मानने वाले थे| मेरी ब्लॉगर यात्रा में सेकुलरिज्म के साथ ये मेरा पहला साक्षात्कार था| क्यूंकि आलम में देशभक्ति का जज्बा दिखा क्योंकि उसकी भैया सेना में थे और वे दम्पति बेधड़क सामाजिक-धार्मिक बुराइयों की अज्ञानता को मिटाने के लिए प्रतिबद्ध थे| ख़ास बात रही की वे महिला मुझे अपने बेटे की उम्र से तुलना करके अपने पास थोड़ी जगह में बिठाया और अपनी बेटे-बेटियों की शैक्षणिक स्थिति की चर्चा की| इस तरह इस यात्रा से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला, धार्मिक बेड़ियों में जकड़ी हुई मानवीय आजादी को पाने की ललक देखी, उनका गुस्सा देखा और उनकी धर्मपरायणता भी देखने को मिली| इसलिए, कुल मिलाकर मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूँ की हमारा भारत सेक्युलर है, आधुनिक है और लिबरल भी है| बस इंसानियत के गद्दरों से नागरिकता का अवार्ड छिना जाना बाकी है...(फिर भी ऐसा हो नहीं सकता, हम जानते हैं...)


लेखक:- अश्वनी कुमार, पटना जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’(ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... आते रहिएगा...

Saturday, 5 December 2015

वेतन आयोग से गरीबों को क्या फायदा?

सातवां वेतन आयोग सरकारी कर्मचारियों के वेतन-भत्ते को 24 फीसदी तक बढाने की सिफारिश सरकार से कर चुकी है| इस समय भारत सरकार में लगभग 40 लाख कर्मचारी सेवारत हैं, जबकि 58 लाख पेंशनभोगी बेमतलब सरकार का खजाना खाली कर रहे हैं| यानी अगर आयोग की सिफारिशों को जस का तस लागू कर दिया जाए तो देश पर एक लाख करोड़ रूपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा| लगभग एक करोड़ लोगों की वेतन वृद्धि योजना पर लगता नहीं है की मोदी सरकार उन्हें नाराज करने का जोखिम ले पाएगी| क्योंकि किसी भी सरकार के लिए सबसे जरूरी चीज होती है, सत्ता में बने रहना| मोदी सरकार अपनी घटती लोकप्रियता के धारे में वेतन आयोग नहीं मानने जैसा बवंडर शामिल नहीं कर सकती| यह उसकी मजबूरी है, लेकिन क्या ऐसी सिफारिशें भारत की आर्थिकी में पंख लगा देगी या उसके पर कतर के मंदी को न्योता देगी? जाहिर बात है की देश पर एकाएक एक लाख करोड़ रुपये का बोझ मुद्रास्फीति, मंदी और महंगाई बढाने का कारण बन सकती है|

वेतन वृद्धि का पैमाना परफॉरमेंस के आधार पर बने| प्राइवेट सेक्टर की तरह, जितना काम-उतना पैसा| लेकिन यहाँ काम करने वाले भी और न करने वाले भी दोनों की वेतन में वृद्धि कर दी जाती है| सातवाँ वेतन आयोग बिना किसी शर्त या फेरबदल के लागू कर दी गयी तो सरकारी कर्मचारी, प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले लोगों को मुंह नहीं चिढ़ाएंगे? बेशक, उनकी कुंठा बढेगी, जब किसी को बिना काम किये वेतन मिलेंगे! ऐसे में जनता का पैसा बेवजह कामचोर कर्मचारियों पर खर्च करना मुर्खता ही है|

लेकिन भारत के उन 30 करोड़ गरीबों की चिंता किसे है? उनका क्या होगा, जिनकी 29 रुपये की दैनिक क्रय शक्ति से चुकाए गए उनके टैक्सों से नौकरशाह 2.50 लाख का वेतन पायेंगे? रिटायर होने पर भी कर्मचारियों को भारत में जितनी सुविधाएँ मुहैया कराई जाती है, उतनी दुनिया के किसी देश में नहीं मिलती| क्या अबतक हमारी सरकारों ने गरीबी, महंगाई से लड़ने के लिए बयानों और योजनाओं के अतिरिक्त कुछ किया है? कभी गरीबी उन्मूलन के प्रति सच्ची प्रतिबद्धता नहीं दिखी| उसे वेतन आयोग के जैसे ही किसान आयोग का भी गठन करना देश के लिए फायदेमंद होता| फिर भी जो है उसमें सुधार की गुंजाइश है| देश है, संसद है, क़ानून है और व्यवस्था भी है| लेकिन गरीबों के लिए नहीं! ये बातें वेतन आयोग के सन्दर्भ में लागू भी होती है|

गरीबों की कोई नहीं सुनता! अगर कोई सुनता तो उसे भी खाद्ध सब्सिडी, वृद्धावस्था पेंशन, छात्रवृति जैसी योजनाओं में वृद्धि की भी सिफारिशें होती| फिर हंगामा मचता और आर्थिक बोझ का हवाला देकर सिफारिश रद्द कर दी जाती!  सरकार हर महीने देश के गरीब बुजुर्गों को 400रु० का पेंशन देती है, जब कर्मचारियों के लिए महंगाई बढ़ रही है तो देश के अन्य लोगों के लिए क्यूँ नहीं? मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी क्यूँ नहीं बढती है? अनाज का न्यूनतम समर्थन मूल्य स्थिर करके किसानों को खेती छोड़ने पर मजबूर क्यूँ कर रही है? अक्सर हमारे देश की सरकार राजकोषीय घाटे का रोना रोती है| कहती है, खर्च बढ़ रहे हैं| लेकिन कभी उसने अपने लापरवाह और जिम्मेदार अफसरों की ठाठ-बाट या उसकी फिजूलखर्ची देखी है? सरकारी आयोजनों में 100रु प्रति प्लेट का खाना वो 400 रु/प्लेट खरीद कर लाते हैं, लाखों रूपये किराए वाले एसी होटलों में घंटे भर की मीटिंग कराते हैं उसका क्या? किसी महापुरुष की जयंती पर दिखावटी सम्मान जताने के लिए पूरे देश के सरकारी दफ्तरों में फिजूल खर्चे करके जनता का करोड़ों रुपये यूँ ही फूंक डालते हैं| इनसब पर कभी सोचा है हमारी सरकारों ने? फिर भी सब कुछ देखते हुए भी आँख बंद कर लेना उनकी राजनीतिक मजबूरी है!

मेरे कहने का कतई ये मतलब नहीं है की कर्मचारियों की वेतन में वृद्धि नहीं हो| हो पर परफॉरमेंस के आधार पर, काम के आधार पर, सामाजिक न्याय और समानता की शपथ को याद करते हुए| समानता का मतलब यह नहीं होता की देश में एक व्यक्ति को 2.50 लाख हर महीने मिले तो एक ओर 30 करोड़ की आबादी भूखे रहने को मजबूर हो, खुले में शौच करने को मजबूर हो|  इसलिए मोदी सरकार ये मान कर न चले की उनका हर फैसला उनके 19 करोड़ वोटर सर-आँखों पर लेंगे क्योंकि कांग्रेस के उत्पात से समूचा देश खदबदाया हुआ था| उसी के क्रोध ने मोदी की राजगद्दी पर पर बैठने का योग बनाया| सरकार हर सिफारिशों को आँख-मूंदकर मानने के बजाए उसे अच्छी तरह ठोक-बजाकर राष्ट्रहित सुनिश्चित करे इसी में देश की भलाई है...

लेखक:- अश्वनी कुमार, पटना जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता
है’(ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... आते रहिएगा...




Monday, 30 November 2015

आमिर, जानते हो देशभक्ति क्या होती है?

आमिर, तुने देश के लिए क्या किया? क्या अपने किसी बेटे को सीमा पर भेजा? कभी किसी आपदाओं में जाकर मदद की? देश के लिए अपना क्या खोया? तुम्हारी बेगम जो अब तुम्हें ये देश छोड़कर जाने को कहती है उससे जरा जाकर पूछो तो की असहिष्णुता का इतिहास किसकी रगों में है? ‘अतुल्य भारत’ का विज्ञापन करते हो, विदेशियों को भारत आने को कहते हो, राष्ट्र की एकता की वकालत करते हो, सत्मेव जयते जैसे कार्यक्रमों से सामाजिक बुराइयाँ दूर करने का पाखण्ड दिखाते हो! लेकिन किसके लिए? इतने ही सहिष्णु हो, इतने ही सेक्युलर हो तो क्यों नहीं मुस्लिम महिलायों की बेहतरी के लिए आवाज उठाते हो? क्यों नहीं बुर्का प्रथा, खतना, बहुपत्नी विवाह जैसी घिनौनी कुप्रथायों पर कार्यक्रम बनाते हो? उस समय तुम्हारी सहिष्णुता कहाँ गयी थी, जब तुमने अपनी पहली पत्नी को छोड़ डाला था? क्या गलती थी उसकी? खुद को बड़ा देशभक्त बताते हो, लेकिन कभी इस दोहरे चरित्र की सजा मिली तुम्हे? नहीं! क्योंकि मुस्लिम पर्सनल लॉ है ना तुम जैसे स्वार्थी को बचाने के लिए!

आमिर, शायद तुम सहिष्णु होने का कभी अर्थ नहीं जान पाए| लगान, मंगल पांडे जैसी फिल्मों के सहारे जिस देश ने तुम्हें सिर-आँखों पर बिठाया, देशभक्त का दर्जा दिया, शोहरत दिलाई, बेसिर-पैर के फिल्मों पर भी जमकर पैसे लुटाये आज तुम्हारे लिए असहिष्णु हो गया है| उसका मुखर हो जाना तुम्हे डरा रहा है| देश समझ सकता है की इसके पीछे भले ही कोई राजनैतिक स्वार्थ हो, लेकिन भारत का इतिहास इससे परे है| आमिर, जानते हो, भारत वो देश है जिसने हजारों सालों तक तुम्हारी कौम (इस्लाम) की गुलामी झेली है| उसने बाबर से लेकर अकबर, जहाँगीर और जिन्दा पीर औरंगजेब के शासन तक चुपचाप सिर झुकाकर कोड़े खाए हैं| उसके बाद अंग्रेजों को झेला|  उसके पूजा स्थलों तक तो लुट लिया गया, तलवार के जोर पर सनातन धर्म छोड़ने पर मजबूर किया| लेकिन इनसब पर कभी तुम्हारे जैसे तथाकथित सच्चे देशभक्त का न सोचना, इनपर फिल्म न बनाना अपने आप में तुम्हारे लिए जबाब है|

आमिर, जरा अपनी बेगम से पूछ कर देश को बताओ की दुनिया में तुम्हारे बच्चों के लिए सबसे सुरक्षित जगह कौन सी है? पता है तुम्हें की अभी पेरिस में सिर्फ 129 मरें हैं लेकिन बात मुसलमानों को देशनिकाली पर चली गयी है| लेकिन भारत में इस्लाम के बन्दों ने जो अबतक हमलों में 80,000 जानें लेकर सहिष्णुता दिखाई है इसपर भी तो अपनी राय दो|  कभी जैन, बौद्ध, सिख क्यों नहीं कहते की उनपर अत्याचार हो रहे हैं| दुनिया में सबसे ज्यादा खुशहाल भारत में रहने वाले ‘पारसी’ हैं| इनपर कभी अत्याचार की ख़बरें क्यूँ नहीं गूंजती? क्योंकि इन धर्मों का मिशन साम्राज्य विस्तार नहीं है| कभी समय मिले तो इराक या सीरिया में जाकर मकान देख आओ! या फिर सऊदी अरब तो है ही, बेगम को घुमाकर दिखा दो की महिला आजादी क्या होती है? सहिष्णुता क्या होती है?  बहुत मज़ा आता है न तुम्हें हिन्दू देवी-देवताओं का मजाक उड़ाने में| कभी कुरान का मजाक उड़ाकर देखो, तब तुम्हारे ही सहिष्णु लोग तुम्हें बताएँगे की असहिष्णुता क्या होती है?

Image result for aamir intolerance imageकश्मीर से चार लाख हिन्दुओं का सबकुछ लुटा जा रहा था, तब तुम कहाँ थे? जब कश्मीरी पंडितों का कत्लेआम हो रहा था, उनके घरों पर इश्तेहार चिपकाये जा रहे थे, उनकी इज्जत लुटी जा रही थी, तब तुम्हारी जुबान क्यों सिली थी? इनसब पर कभी तुम्हारी जुबान खुली? तब क्यों नहीं असहिष्णुता के विरोध में किसी ने पुरस्कार लौटाए थे?  मैं बताता हूँ की देशभक्ति क्या होती है| पिछले दिनों कश्मीर में शहीद हुए कर्नल संतोष महादिक की पत्नी ने अपने दो नन्हें बेटों को सेना में भेजने की घोषणा की| जबकि तुम जैसा स्वार्थी इंसान इतनी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद भी अपने बेटे की चिंता कर रहा है| तुम और शाहरुख़ जैसे इन्सान की सोच किस प्रवृति की देने है, सब जानते हैं|

आमिर, सहिष्णु तो हिन्दू हैं, क्योंकि “हर पीर फ़क़ीर कोठी में, राम हमारे तम्बू में” फिर भी अगर तुम्हें हिन्दू युवाओं का सर उठाकर चलना, मुखर होना या हर धर्म के साथ आँख से आँख मिलाकर व्यवहार करना असहिष्णुता है तो तुम अपने रहने न रहने के फैसले कर ही डालो| इस देश का इतिहास, उसकी विविधता तुम्हारे विचारों की मोहताज़ नहीं... क्योंकि इंसानियत के तराजू पर दोनों पलड़े बराबर होते हैं...      हंसी आती है की सहिष्णुता हमें वो सिखा रहा है जिसके धर्मं ने विरोध के डर से ईशनिंदा कानून बना रखा है...

लेखक:- अश्वनी कुमार, पटना जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’(ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... आते रहिएगा...


बच्चों का बिगड़ता बचपन

एक जमाना था जब बच्चे नानी-दादी की गोद में परी कथायों की रंगीन दुनिया में खो जाते और नींद में ही बुन लेते सपनों का एक सुनहरा संसार| एक अजीब सा वक्त, जिसमें न कोई फिक्र न कोई गम और न ही किसी की परवाह| याद है, जब हम हम बच्चे थे तो उस समय की मौज-मस्ती दुनिया की सारी खुशियों से भी ऊपर है| दादा का दुलार, दादी का प्यार और मम्मी-पापा की दी हुई आजादी का मोल नहीं लगाया जा सकता| हाँ, लेकिन जब उस दौर को याद करता हूँ तो उसे वापस पाने की चाहत में दिल रो जाता है|  कहाँ आ गया हूँ मैं? काश! वो वक्त वहीँ ठहर जाती...

बेशक, लेकिन अगर हमारी 15 साल पहले की सामाजिक स्थिति की आज से तुलना करें तो काफी कुछ बदला दिखता है| लोगों का स्वभाव, उनका व्यव्हार, उनकी जरूरतें सबकुछ बहुत तेजी से बदला है| कह सकतें हैं की जब देश बदल रहा है, समाज बदल रहा है, लोग बदल रहें हैं तो ऐसे में स्वाभाविक है की बच्चे का स्वाभाव, उनका व्यवहारसबकुछ बदलेगा ही| कुल मिलाकर आज के बच्चों की कोई तुलना ही नहीं है| टेलीविज़न, सिनेमा और इन्टरनेट की इस दुनिया में बच्चों की मासूमियत कहीं गम सी हो गयी है| स्कूल से घर आने पर दादा की आँखें तरसने लगी है, अपने पोते की मासूम कारनामों को देखने की| अब कोई बच्चा अपनी दादी से कहानियां सुनाने की जिद नहीं करता| जानते हैं क्यों?  आज की आधुनिकता की दौर में फंसे परिवारों में दादा-दादी अप्रासंगिक हो गए हैं| शहरी नौकरीपेशा परिवारों में तो लोग बड़े परिवार के साथ रहे से परहेज़ करने लगे हैं| चाचा-बुआ जैसे संबंधों को बच्चे नाम के अतिरिक्त ज्यादा कुछ नहीं समझ पाते!

इन सब से ठीक उलट इन बच्चों ने अपनी एक नई दुनिया बसा ली है| उनका दुनिया-जहाँ है, मार-काट से भरे कंप्यूटर गेम्स, उलुलजुलुल के कार्टून्स और बेसिर-पैर के भद्दे फ़िल्मी गीत| जाहिर सी बात है, इससे न तो उनका शब्द सामर्थ्य बढ़ना है और न ही बौधिक विकास होना है| हालात ये हैं की आज के बच्चों से किसी पौराणिक चरित्र का नाम पूछिये तो बगलें झाँकने लगेंगे, लेकिन किसी कार्टून कैरेक्टर या किसी फ़िल्मी हीरो का नाम पूछिये तो वह उनकी जुबान पर ही रखा होगा|  यह बदलाव कहाँ से आया? यह बदलाव उस माहौल, उस परिवेश से आया है जिसमें आज के बच्चे पल रहे हैं| उनके माँ को रसोई से और बचे टाइम में सास-बहु सीरियल के अलावा फुर्सत ही नहीं है, जबकि उनके पिता जिन्दगी के भागदौड़ में अक्सर व्यस्त ही रहते हैं| आजकल के पेरेंट्स बच्चे को अच्छे अंग्रेजी मीडियम स्कूलों में दाखिला दिला देने को परिपूर्ण मान लेते हैं| कितने ऐसे पेरेंट्स हैं जो स्कूल से आने के बाद बच्चे की कॉपी चेक करते हैं? कितने ऐसे पेरेंट्स हैं जो बच्चे की हरकतों पर नज़र रखते हैं की उनका बच्चा क्या खा रहा है, क्या देख रहा है? कहीं वो किसी गलत संगत में तो नहीं पड़ गया? लेकिन इसकी हकीकत बहुत ही निराशाजनक है...

अक्सर देखा जाता है की बच्चे स्कूल से घर आते ही हाथ में रिमोट लेकर कार्टून देखने में लग जाते हैं| आजकल के पेरेंट्स अपने बच्चों की बिगड़ी बातचीत की भाषा से खासे परेशान हैं| वे कार्टून कैरेक्टर्स को पूरी तरह से अपना लेते हैं और बोलचाल में कार्टून चरित्र वाली ही लहजे का इस्तेमाल करते हैं| जिद्द पूरी करने के लिए डोरेमोन, निंजा जैसे बेवकूफाना हथकंडे अपनाते हैं और न मानने पर उन चरित्र जैसा मुंह भी बनाने लगे हैं| कुल मिलाकर ये सारी चीजें बच्चों के बालमन में घुसपैठ करके पूरी तरह हावी हो चुकी है, जो एक गंभीर संकेत है|  ऐसे में बेहतर होगा की अभिभावक इन चीजों पर पाबंदी लगायें और मनोरंजन के तौर पर साथ बैठकर उन्हें वही चीजें देखने को प्रेरित करें जो उनके भविष्य निर्माण के लिए सार्थक हो| अगर ऐसा नहीं होता है तो कहीं न कहीं बच्चों के बिगड़ने का जिम्मेदार उन्हें ही माना जाएगा| दो-तीन साल के बच्चे जो टीवी-सिनेमा की इस आधुनिक दुनिया में रहते-रहते इस कदर आधुनिक हो जाते हैं की अगर उनके सामने गुडिया और खिलौना रिवाल्वर रख दिया जाए तो वो रिवाल्वर को उठाता है|

नतीजा क्या हो रहा है? उनका बालमन बदल रहा है, उनका मानस बदल रहा है, उनकी मासूमियत छीन रही है और उनका व्यवहार भी उनकी उम्र जैसा नहीं रहा| ये इस बात का संकेत है की आनेवाली जो पीढियां हमें मिलने वाली है उसमें हमारे गुण-दोष से कई गुना ज्यादा समाहित होगी| इसलिए चाणक्य ने कहा था की 6 साल तक अपने बच्चे को खूब प्यार करो, 6 से 12 साल तक कठोर अनुशासन सिखाओ, 12 से 15 तक सारे संस्कार बताओ उसके बाद मित्रवत व्यवहार करो... (जो आज काफी हद तक सही भी लगता है...)

लेखक:- अश्वनी कुमार (मैंने इस ब्लॉग में जो भी बातें लिखी है वो मेरी आम धारणा है, जैसा की मैं
अपने आसपास के तथाकथित आधुनिक और कम उम्र के सयाने बच्चों की हरकतें देखता हूँ| .... और मेरा बचपन भी चाणक्य के आदर्शों पर कठोर अनुशासन में गुजरा है इसके लिए मैं अपने अभिभावकों का शुक्रगुजार हूँ जिन्होंने मुझे अन्धी कर देने वाली इस चकाचौंध दुनिया से बचा लिया...)


Sunday, 29 November 2015

ISIS की मंशा क्या?

पेरिस में जो कुछ हुआ उसने पूरे संसार को झकझोर दिया| ऐसा नहीं है की फ्रांस की कोई बड़ी आबादी हताहत हुई| उससे कई गुना ज्यादा मौतें विभिन्न आतंकवादी हमलों में हमारे देश में हो जाती है| लेकिन कोई हल्ला नहीं मचता, क्योंकि हमारी ख़ुफ़िया व रक्षा प्रणाली पश्चिमी देशों की तुलना में काफी कमतर है| यूरोपीय ख़ुफ़िया एजेंसी की साख पर सवाल उठने लगे हैं| फ़्रांस दुनिया का सबसे सहिष्णु राष्ट्र माना जाता है| उसने बड़ी तादाद में सीरिया व तुर्की से आये शरणार्थियों को पनाह दी, उदारता दिखाई लेकिन उसका यह परिणाम? वाकई झकझोर देता है!  इस्लाम का इतिहास रहा है की वे जहाँ रहते हैं, उसके आसपास के माहौल को अपने जैसा थोपने की जुर्रत करते हैं| फ़्रांस में बुर्के पर पाबंदी है, पर वे चाहते हैं की सारे लोग बुर्के पहन कर घूमें, लोग ईद मनाएं, कुरान से चलें, शरियत को मानें| ऐसा नहीं होता! ISIS का जन्म अमेरिकी-इराक नीतियों से हुआ है| दुनिया भर में अपनी युद्ध अर्थव्यवस्था को फलने-फूलने के लिए अमेरिका ने ही अलकायदा को पनपने दिया, ISIS को खूंखार होने दिया| अब क्यों डर रहे हो? जाओ किसी और देश की राजनीतिक, आर्थिक आजादी ख़त्म करके एक और आतंकी संगठन को जन्म दो!


अमेरिका के जवान हवाई जवान हैं| वह अपने सैनिकों को जमीन पर उतारने से घबराता है| ड्रोन,Image result for missile image मिसाइल, लड़ाकू विमानों से बमबारी करके ISIS को ख़त्म नहीं किया जा सकता| चूँकि सीरिया व इराक के जिन रिहाइशी ठिकानों पर इस्लामिक स्टेट का कब्ज़ा है वह जगह बेहद संकीर्ण है, पेड़-पौधों व जंगलों से भरे पड़े हैं| उनके लड़ाके जेहादी गतिविधियों में कितने परिपूर्ण हैं ये पेरिस की घटना से पता चलता है| अमेरिका, रूस और फ़्रांस तीनों को इस्लामिक आतंक का डर 9/11 के बाद फिर से एहसास होने लगा है, उनकी घबराहट बढ़ी है और बेचैनी में उनके ठिकानों पर ताबड़तोड़ हवाई हमले कर रहे हैं| ये बेचैनी अब क्यों? 26/11 के वक्त कहाँ थे? क्यों नहीं तब पाकिस्तानी आतंकवादी ठिकानों को नष्ट करके आतंकवाद को कमजोर करने का प्रयास किया? पेरिस में तो 129 मरे, लेकिन भारत में अबतक 80 हज़ार से ज्यादा मौतें आतंकी हमलों में हुई है, क्या अमेरिका को यह नहीं पता की इनसब का सूत्रधार कौन है?


अभी हाल तक अमेरिका की विभिन्न देशों की धार्मिक आजादी पर नज़र रखने वाली एजेंसी कह रही थी की ‘भारत में असहिष्णुता बढ़ रही है’| ओबामा ने भी सौहार्द की अपील की थी| पर अब क्यों कह रहें है की इस्लाम आतंकवाद का पर्याय है| (इससे ओबामा भी हमारे सेक्युलर नेताओं की नज़रों में सांप्रदायिक हो ही गए होंगे)इस्लामिक स्टेट जिहाद के नाम पर अपने कट्टर लड़कों के साथ दुनिया भर में इस्लामी राज्य का डंका बजा रहा है| काले झंडे लेकर इस्लाम के बन्दों का नेतृत्व कर रहा बगदादी किस्म-किस्म के सेनानियों के साथ समूचे विश्व का इस्लामीकरण कर देने का सपने को लेकर आगे बढ़ रहा है|  ISIS की इस बर्बर मानसिकता का खामियाजा किसे भुगतना होगा? इस्लाम को ही!  क्योंकि फ़्रांस एक बार फिर मुसलमानों को पनाह देना बंद कर देगा| उसकी ऐसी हरकतों का खामियाजा दुनिया भर के मुसलमानों को भुगतना पड़ेगा| तमाम देश मुस्लिमों को आने की अनुमति नहीं देंगे, मदरसों को बंद कर दिया जाएगा, मस्जिदों में तक पाबंदी लगाई जा सकती है| अगर इसके बाद भी हालात बेहतर नहीं हुए तो संभव है की पश्चिमी देश मुसलमानों को देश से भगा देने को बाध्य हो जाएँ! और इसका अनुसरण बहुत सारे देश कर सकते हैं|

ISIS भारत में इस्लामी राज्य कायम करने की इच्छा जता चूका है| और बगदादी के लिए तो भारत बेहद सॉफ्ट टारगेट है| यूँ सैकड़ों को लाइन में खड़ा करके गोली मार देना... शरीर में बम बांधकर उड़ा देना, सरेआम गला रेत देना... सोंचकर काँप जाता हूँ!  भारत में आसान भी है, उनकी मदद के लिए है ना हमारी सरकारी की चुनावपरस्त नीतियाँ, निकम्मे अफसर और राजनेताओं की सेक्युलर विचारधारा!  बेशक, हम तो काफी पहले से ही कश्मीर के नाम पर आतंक झेल रहे हैं| बस कमी है तो बगदादी का भारत आकर इस्लामी राज की डुगडुगी बजाने की... क्योंकि जबतक दुश्मन दरवाजे तक नहीं आ जाता, हमें विश्वास ही नहीं होता की खतरा सही में है... यही दिल्ली का इतिहास रहा है... 

लेखक:- अश्वनी कुमार, पटना जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’(ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... आते रहिएगा...


Tuesday, 24 November 2015

लालू के ‘लाल’ करेंगे विकास!

चुनाव के नतीजे आये और सबको पता चला की लालू के दोनों लाल मंत्री बनेंगे, एक तो उपमुख्यमंत्री! पता है, क्या गुज़र रही थी उन लाखों युवाओं के दिल पर जिसने जी-तोड़ मेहनत करके तमाम डिग्रियां हासिल की है, एक सरकारी नौकरी के लिए योग्यता के बावजूद भी कितनी भाग-दौड़ करनी पड़ रही है? सभी आहें भर रहे थे, काश मेरा भी बाप ‘लालू प्रसाद यादव’ होता!

                     
यही होता है लोकतांत्रिक राजनीति में जब मतदाता अपना मत वंशवाद, जातिवाद के नाम पर देकर लोकतंत्र की हत्या कर देता है| बिहार की जनता को अब संभलना होगा, जागना होगा लेकिन मौका तो 5 साल बाद ही आएगा| जनता जानती थी उसके फैसले के बाद कौन है जो उनपर राज करेगा? कौन आईएस, आईपीएस जैसे अधिकारियों से अपनी सलामी ठुकवायेगा, फिर भी हद है!  बिलकुल साफ़ है की नेताओं वाली मौकापरस्ती के गुण जनता में भी आ गए है| वो आलसी हो गयी है| सच जानने के लिए मीडिया पर आधारित हो गयी है| उसे अपनी जागरूकता का अहंकार हो गया, नहीं तो उसके फैसले से इतने ख़राब-ख़राब नेता कैसे चुन लिए गए?  इसलिए की, उम्मीदवार के तौर पर तो नेता मतदाताओं के सामने सर तो झुका लेता है| लेकिन लोकतंत्र में जनता राजा है, फिर वो क्षेत्र में नेताओं के आने पर सख्त सवाल करने के बजाए उसके सामने पूरे 5 साल सर क्यों झुकाती है? उसके पीछे-पीछे चाटुकारों की तरह झंडे लेकर नारेबाजी करने वाला लोकतंत्र का एक जीता-जागता गुंडा है जिसे पोषित करने वाले भी वही नेता हैं, जो कैमरे पर लोकतंत्र की तोता-रटंत जुमले सुनाता है|

लालू के एक लाल नीतीश जैसे तेजतर्रार नेता को बिहार की आर्थिक, सामजिक हर फैसले में उन्हें अपनी सलाह देंगे| वाकई, एक नौवीं पास युवा उपमुख्यमंत्री क्यों नहीं बन सकता? तेजस्वी या तेजप्रताप तो ये भी नहीं कह सकते की उन्होंने गरीबी देखी है इसलिए वे गरीबों का दर्द समझते हैं!  आखिर जनता ने उन्हें चुना है, जनता ने उनकी समझदारी, योग्यता में कुछ तो ऐसा जरूर देखा होगा!  क्योंकि अरस्तु ने पहले ही कहा था की लोकतंत्र मूर्खों का शासन है और मुर्ख भी उसमें सता के सर्वोच्य शिखर तक पहुँच सकता है| पहले मांझी और अब लालू के दोनों लाल ने उनकी बात को बल जरूर दिया है|  लालू के दुसरे बेटे तेजप्रताप को स्वास्थ-पर्यावरण मंत्रालय मिला है| क्या भाग्य है उनके डिपार्टमेंट के आला अफसरों की! यही मौका है, कर डालो सारे फायदेमंद फैसले, बेच डालो पेड़-पौधे और लकड़ियाँ! डर किस बात का, फैसले अंग्रेजी में लिखकर दो और हस्ताक्षर करा लो, उन्हें कौन सा हिंदी पढने आता है जो इंग्लिश समझेंगे!

Image result for vanshvaad imageराजनीति में वंशवाद जनता के लिए अभिशाप है तो नेताओं के लिए वरदान| बिहार की जनता देश में सबसे जागरूक मतदाता का स्थान रखती है, लेकिन उसकी ये छवि जातिवाद के चुंगल में फंसकर धूमिल होती जा रही है| बेटे-पोतों को सता दिलाने का इतिहास इन 66 सालों में काफी पुराना रहा है, पर इस चुनाव में जिस तरीके से जनता ने नीतीश को चुना, उनपर भरोसा दिखाया अगर इस दौरान राजद की तरफ से कोई भी ऐसी-वैसी बात हुई तो वो नीतीश पर कायम विश्वास को ले डूबेगी| बिहार ने 15 साल लालटेन के सहारे गुजारे, गुंडागर्दी झेली, अत्याचार सहा फिर भी उन्हें 10 साल जनता का विश्वास हासिल करने में लग गए| सवाल है, क्या नीतीश की बेदाग़ छवि उनकी सता वापसी करने में मदद दे गयी या बीजेपी का मोदी-शाह पर से जनता का उठता भरोसा?  बहुत सारे राजनीतिक विश्लेषण किये गए है, पर मेरा मानना है की बीजेपी की घटती लोकप्रियता का एक बड़ा हाथ नीतीश को जीत दिलाने में रहा है| क्योंकि लोकसभा चुनावों में बीजेपी तमाम जातिवादी आंकड़ों को दरकिनार करते हुए 180 सीटों पर आगे थी|

मोदी-शाह की घटती लोकप्रियता के अन्दर उनका अहंकार और हाईकमान प्रणाली है| जमीनी कार्यकर्ताओं से संपर्क टुटा है क्योंकि बीजेपी मिस कॉल से कार्यकर्ता जो बनाने लगी है... मोदी ये मान रहे थे की उनकी जीत गुजरात के विकास गाथाओं के नाम पर हुई है, लेकिन सच ये है की जनता कांग्रेस की कारनामों से खासी परेशान थी और मंहगाई जले पर नमक छिड़क रही थी| वैसे में पुरा देश खदबदाया हुआ था| मोदी की जगह कोई भी होता तो वो जीत जाता पर 282 सीट नहीं|  पूर्ण बहुमत हासिल करने के पीछे मोदी की हिन्दू-मर्द नेता की छवि का बड़ा योगदान रहा| बिहार में आकर घोषणाएं कर रहे थे, बोली लगा रहे थे, अमेरिकी यात्रा की कहानियां सुना रहे थे और व्यापार आसान बनाने की कोशिश कर रहे थे| जबकि लोगों को दाल चाहिए, टमाटर चाहिए, व्यापार नहीं जिन्दगी आसान चाहिए| मोदी को ये याद रखना होगा की 2019 में पुतिन, ओबामा या नेतान्याहू नहीं जिताने आयेंगे, बल्कि देश की जनता जिताएगी|

और... बिहार में महागठबंधन की सरकार चल रही है, स्वछन्द उड़ रहे नीतीश के पैरों में बेड़ियाँ लग चुकी है| जिसमें साइकिल चलाने की योग्यता वालों को विमान उड़ाने के लिए दे दिये गए है और सरकार में राहुल गांधी जैसे तेजतर्रार, ओजस्वी नेता के नुमाइंदे भी है... आगे क्या होगा, राम जाने...


लेखक:- अश्वनी कुमार, पटना जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’(ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... आते रहिएगा...