Sunday, 21 June 2015

सब पढ़ें- सब बढ़ें, मगर कैसे?

बिलकुल, आज हम सभी भारत की शिक्षा व्यवस्था से भलीभाँति परिचित हैं। लेकिन ये व्यवस्था कितने बेतरतीब ढंग से खतरनाक और नकारात्मक दिशा की ओर अग्रसर है, जिनका अनुमान भी लगा पाना नाइंसाफी होगी। नाइंसाफी उन बच्चों की होगी, जिन्हें स्कूल में पढ़ाने के लिए नहीं बल्कि, खिचड़ी खिलाने के लिए लाया जाता है। जब देश आजाद हुआ था तब उस समय हमारी साक्षरता दर मात्र 16 फीसदी के आसपास थी, लेकिन वर्ष 2011 के अनुसार यह बढ़कर 74.14 ./. तक पहुंच गई। जबकि केरल, तमिलनाडु आदि राज्यों में तो यह आँकड़ा 90 से 100 फीसदी तक का है। इसके अतिरिक्त, आजादी के बाद साक्षरता दर से कहीं ज्यादा विकास जनसंख्या दर का हुआ। नतीजा... आज हमने पढ़े-लिखे बेरोजगारों की एक बहुत बड़ी फौज तैयार कर ली है, जिसका सारा श्रेय सरकार की गुणवत्तापूर्ण रहित शिक्षा प्रणाली को जाता है।
                                           हालात ये हैं की वर्तमान शिक्षा व्यवस्था दो भागों में बाँट दी गई है - पहला, सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले गरीबों की तथा दूसरा, निजी स्कूलों में पढ़ने वाले अमीरों की। निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे बेहतर मार्गदर्शन व रणनीति के कारण परीक्षा में अच्छे अंक लाकर, अच्छे कॉलेजों में दाखिला तो ले लेते हैं। पर, इन खिचड़ी खाने वाले गरीबों का क्या? सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की क्या इतनी हैसियत भी होगी, जो परीक्षा में उनकी बराबरी भी कर सकें? शायद सही कहा जाता है की इन गरीबों का कोई माँ-बाप नहीं। बस इनका काम कमाना, खाना और सो जाना है। लेकिन जब किसी गरीब का बेटा सफलता हासिल करता है तो ये बिलकुल उन लोगों के लिए चाँटे के समान होता है, जिनकी दोहरी नीतियों के कारण ये गरीब हमेशा उनके दोगलेपन का शिकार होते हैं। कुल मिलाकर आज हालात ये हैं की हमारी शिक्षा प्रणाली पूरी तरीके से अंकों पर आधारित हो गई है। कई बच्चे 96 ./. अंक लाने के बावजूद भी खुश नहीं हो होते, क्योंकि उन्हें दिल्ली यूनिवर्सिटी में दाखिला नहीं मिलेगा। सोचकर डर लगता है की उन बच्चों पर क्या गुजरती होगी, जिनके 50-60 ./. अंक आते हैं। वो दिल्ली यूनिवर्सिटी तो क्या शहर के अच्छे कॉलेज में भी नहीं पढ़ सकता। आखिर इसका दोषी कौन है? क्यों हमारी शिक्षा अच्छे-बुरे कॉलेजों के बीच फँसी है? वैसे कॉलेज हैं ही क्यों, जो अच्छे नहीं हैं? अगर सरकार सभी कॉलेजों को DU, JNU, BHU जैसी नहीं बना सकती तो कॉलेज खोल ही क्यों रखा है? क्या उसे सचमुच अच्छा नहीं बनाया जा सकता? इन सवालों के जवाब कोई ढुँढता नहीं दिखता! क्योंकि हमारी इतनी हैसियत नहीं की हम DU, JNU में पढ़ सकें। हम खिचड़ी वाले स्कूलों के विधार्थी रहे हैं, हमारी इतनी हैसियत भी नहीं की पिज्जा बर्गर खाने वालों की बराबरी कर सकें।
                                                अकेले देश में हर साल 15 लाख इंजीनियर बनते हैं, जिनमें से मात्र 4 लाख को ही नौकरियाँ मिलती है। 50 लाख ग्रेजुएट बेरोजगार हर साल बाजार में उतरते हैं, पर उनमें से 30 ./. से भी कम नौकरी के लायक होते हैं। ऐसा क्यों? सरकार कहती है, सब पढ़ें-सब बढ़े, लेकिन कैसे? सरकारी स्कूलों में शिक्षक ही नहीं है, हैं भी तो खिचड़ी खिलाने से फुर्सत नहीं मिलती। दूसरी तरफ हमारी सरकार के पास भी इतना समय नहीं की वो राजनीति छोड़कर इन फालतु चीजों पर ध्यान दे। निजी स्कूलों के माफियाओं का जंजाल इतना बड़ा हो चुका है की किसी को छूने तक की हिम्मत भी नहीं। बेशक, गरीब-गरीब बनता रहे, बेरोजगार बनता रहे, अशिक्षित रहता रहे... क्योंकि अगर सभी शिक्षित हो जाएंगे तो उनके झंडे कौन ढोयेगा? रैलियों में तालियाँ कौन ठोकेगा? एवं सबसे महत्वपूर्ण, पैसे लेकर वोट कौन देगा?.....
 लेखक - अश्विनी कुमार..... जो एक स्वतंत्र टिप्पणीकार बनना चाहता है।

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