Wednesday, 15 July 2015

इफ्तार के बहाने ये कैसी राजनीती ?

बिहार की राजनीती इन दिनों ईद के मौके पर सेकुलरिज्म का मिसाल पेश कर रही है। तमाम नेता इफ्तार की पार्टी के बहाने अपना उल्लु सीधा करने में लगे हैं। चुनाव नजदीक है, ऐसे में तो पक्ष और विपक्ष दोनों के ही सहयोगी दलों में सीटों को लेकर चिंता करना वाजिब है। एक तरफ नीतीश कुमार, लालू की जगह कांग्रेस अध्यक्ष सोनिआ गांधी के इफ्तार पार्टी में शामिल हुए। वहीँ दूसरी तरफ रामविलास के इफ्तार पार्टी में बीजेपी, मांझी सहित तमाम NDA  सहयोगी दल शामिल हुए। पर इफ्तार के बहाने ये नेतागण राजनीती करने से चूक जाएँ, ऐसा हो ही नहीं सकता। हर किसी को सीटों की चिंता है। ऐसे में कुल मिलाकर हालात ये हैं  कोई भी सहयोगी दलों  कटाक्ष की राजनीती करके दवाब बनाने से नहीं चूक रहा। आरोप-प्रत्यारोप का दौर आज  वर्तमान राजनीती का एक पहलु बन चूका है। पर ये सिलसिला चुनावों के वक्त तो बेतरतीब ढंग से चरम पर पहुँच जाता है। क्या ये सफल लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है? 

                                                                                    पिछले दिनों बिहार बिधान परिषद के चुनाव हुए, बीजेपी ने अन्य के मुकाबले अधिक सीटों पर जीत हासिल की। लेकिन ये चुनाव, विधानसभा चुनाव में  जनता का मन टटोलने के लिए काफी नहीं है। इस चुनाव में वोट जनता ने नहीं बल्कि, उनके द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों ने दिया था। सब जानते हैं की अपवाद को छोड़कर लगभग सभी प्रतिनिधियों से 5 वर्ष पुरे होते-होते जनता का मोहभंग हो जाता है। इन परिणामों के आधार पर, ऐसे में न तो बीजेपी अपनी जीत सुनिश्चित मन सकती है, और न ही महागठबंधन अपनी जीत के प्रति आश्वस्त हो सकती है। और होना भी नहीं चाहिए। इस चुनाव परिणाम की सबसे अहम बात रही की 64 प्रतिनिधियों ने नोटा का इस्तेमाल किया। ऐसा क्यों? खुद को पिछड़ों का हितैषी बनाने वाले दलों के पास इन बाहुबलियों, गन्दी छवि वाले उम्मीदवारों के अतिरिक्त कोई और चेहरा था ही नहीं? या उन्हें 'डर की राजनीती' को बढ़ावा देना फायदेमंद दिखता है। तमाम सवाल उठेंगे, जब जनता पर, जनता की पसंद की जगह पार्टीयों की पसंद के उम्मीदवार थोपे जायेंगे। 

                                                                                 हैरानी तब होती है, जब नीतीश और लालू जैसे नेता, जिनका जन्म ही कांग्रेस विरोध के बिसात पर हुआ था, वो आज कहाँ जा रहे है? कांग्रेस के बाँहों में हाथ डालकर चलते दिख रहे हैं। क्या अब कांग्रेस की विचारधारा इन दोनों नेताओं को अच्छी लगने लगी? या सत्ता का मोह इन्हें ऐसा करने पर मजबूर कर रही है। 

जो भी हो, इफ्तार के बहाने ही सही, लेकिन सारे फैसले जनता के हित में लिए जाएँ तो बेहतर होगा। ऐसा क्यूँ होता है की चुनाव के वक्त गरीबी, भुखमरी को मुद्दा बनाकर वोट बैंक की तलाश की जाती है? जबकि पानी के मोटे पाइपों, सुरंगों और फुटपाथों पर गुजर बसर करते लोग तो विकास के आंकड़ों के जीवंत कार्टून हैं। आखिर कार्टून बना किसने रखा है..... हम सब जानते हैं ......

लेखक- अश्वनी कुमार,  पटना गुलज़ारबाग़ ,जो एक स्वतंत्र टिप्पणीकार बनाना चाहता है.… 




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