Wednesday, 8 July 2015

राम मंदिर पर सेक्युलर बनती भाजपा


 भारतीय जनता पार्टी पर चढ़ती सेकुलरिज्म का बुखार सबके लिए हैरानी भरा है। वो भारतीय जनता पार्टी जिसे 1998 तक हिन्दू राष्ट्रवादी पार्टी कहा जाता था, वो पार्टी जिसे 2 सीटों से 272 सीटों तक पहुचाने में उसके हिंदूवादी चेहरे का बड़ा योगदान रहा है। अगर वैसी पार्टी अपनी विचारधारा ही बदल डाले तो हैरानी होना स्वाभाविक है। भाजपा के युगपुरुष अटल बिहारी वाजपेयी तथा अब हाशिये पर डाल दिए गए 'लाल कृष्ण आडवाणी  का भी एक समय था, जो कभी खुद को रामभक्त बताकर किसी भी कीमत पर राम मंदिर बनवाने की बात  करते थे, उनके ही पार्टी की सरकार मंत्री राजनाथ सिंह इसे अदालती मामला बताते फिर रहे हैं। ये सच है की 1992 में आडवाणी  की सोमनाथ से अयोध्या तक की रथ यात्रा ने राम भक्तों के बीच अपनी अच्छी पैठ बना ली थी, जिसका फायदा उन्हें चुनावों में भी मिला। वर्ष 1998 में बनी वाजपेयी सरकार ने अपनी हिन्दुत्वादी छवि होने के वाबजूद भी उन्होंने विकास के एजेंडे पर काम किया, लेकिन राम-मंदिर मुद्दे का परित्याग नहीं किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जिन्हे 2002 गुजरात दंगे का मास्टरमाइंड बताया गया, एक हद से ज्यादा उन्हें कट्टर हिंदूवादी चेहरे के रूप में देश के सामने लाया गया,  जिसके परिणामस्वरूप 16वीं लोकसभा चुनावों में वोटों का ध्रुवीकरण उनकी छवि के आधार पर हुआ। नतीजन, पार्टी पूर्ण बहुमत से सत्ता पर काबिज हो गयी वजानते हैं  अपने कट्टरवादी चेहरे को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठा दिया।                                                                                                                                                        संघ  विभिन्न हिंदूवादी संगठनों में प्रमुख रूप से विश्व हिन्दू परिषद राम मंदिर पर मोदी से आशान्वित थी। लेकिन सरकार का हिंदूवादी एजेंडे से डरकर भागना कायर सिद्ध नहीं करता? जिस पार्टी का जन्म से लेकर अब तक का इतिहास राम जन्मभूमि, धारा 370, यूनिफार्म सिविल कोड के इर्द-गिर्द घूमता है वो पार्टी  अब सत्ता में होने के बावजूद भी सदन में चर्चा कराने से भी घबरा रहा है। अगर सबकुछ अदालतों पर ही छोड़ दिया जाना था तो बाबरी बिध्वन्स की क्या जरूरत थी? रथ-यात्रा करने व उसके कारण जेल जाने की नौटंकी क्या किसी स्वार्थ की ओर इशारा नहीं करती?                                                                                                                            सब जानते हैं की भारतीय अदालतों की गति का दुनिया में कोई जोड़ नहीं, अदालत भी जानती है की राम लला रामजन्मभूमि है। और कितने प्रमाण चाहिए इन मौलाना सेक्युरलिस्ट नेताओं को। खुदाई में मिली 'ओम नमः शिवाय' लिखी ईंटें  तब की है जब शायद बाबर की औलादों के परदादाओं के भी परदादा का जन्म नहीं हुआ होगा। लेकिन कोर्ट को इनसे कोई सरोकार नहीं, क्योंकि कानून अँधा है। पर इनकी आँखे तब होती है जब बात सेकुलरिज्म से सम्बंधित हो। दूसरी तरफ बीजेपी की नज़र अगले साल होने वाले यूपी चुनावों पर है, जहाँ सम्भव है की एक बार फिर राम नाम का शगूफा छोड़ा जा सकता है। लेकिन  अब इतना आसान  भी नहीं, राम नाम का राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करने वालों के लिए कोई गुंजाईश नहीं बची है। जरूरत है सच्चाई का  साथ देने की, सच पर सदन में बहस कराने की।                                                                                                                                            बड़ा दुख होता है की हम हिन्दू अपने भगवान के प्रत्यक्ष जन्म स्थल के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन जेरुसलम में ऐसा क्यों नहीं होता? काबा में ऐसा क्यों नहीं होता? अक्सर हम हिन्दू ही क्यों दबे कुचले जाते हैं? सोचिएगा ........                  writer:-    ashwani kumar,  who always want to become a independent remark...  and this column is written by my heart touching opinion about plight of hindu dharma...                                                                                                                                                                                                                         
    

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