Friday, 10 July 2015

एक बार फिर... नीतीश कुमार या मोदी सरकार

नमस्कार! हमारे बिहार में 5 सालों के बाद एक बार फिर चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में तो स्वाभाविक है  की, नेताओं को जनता की याद तो आएगी ही। प्रचार के लिए नेतागण जनता के दरवाजे भी खटखटाएंगे। हाथ जोड़कर राम-राम करेंगे, गली मोहल्लों में रैलीयां निकालेंगें, नुक्कड़ सभाएं करेंगे, बड़ी-बड़ी घोषणायें करेंगे, झूठे वायदे करेंगे। मुंगेरी लाल की तरह हसीन व भी दिखाएंगे, एवं सबसे महत्वपूर्ण की पैसे दारू का लालच देकर वोट खरीदने की कोशिश भी करेंगे। पर इन सब में नया क्या? 5 साल पहले भी तो यही सब कुछ हुआ था। दरअसल उन्हें जनता की नहीं जनता के वोट की कीमत याद आती है, तभी तो जन-जन के दरवाजे तक खीचें चले आते हैं।                                                                                                                 बिहार की वर्तमान राजनितिक परिस्थिति कुछ इसी तरह है। नीतीश कुमार अपने क्षेत्रीय विधायकों, भावी नेताओं के साथ 'हर घर दस्तक' देने को निकल चुके हैं। लोगों से सरकार के कामकाज से सम्बंधित सवाल पूछे जा रहे हैं। पर ये सब चुनाव के ही वक्त क्यों? पहले क्यों नहीं? जनसंवाद जैसे लोकतान्त्रिक तरीकों का चुनाव प्रचार के लिए इस्तेमान करना, क्या सही है? नीतीश ने कितने विधायकों-सांसदों से इन 5 सालों  क्षेत्र में किये कामों का ब्यौरा देखा? उन्होंने कितने लोगों के घर जाकर उनकी परेशानी पूछी? बस, चुनाव आ गए और चल दिए जनता के पैर छुने। पर सच तो ये है की आम दिनों में मुख्यमंत्री के 100-200 मीटर की दुरी तक किसी को प्रवेश भी नहीं करना दिया जाता। जिसका भुक्तभोगी कई बार उनके काफिले के कारण मैं भी रहा हूँ। लेकिन चुनाव के वक्त उनकी सुरक्षा व्यवस्था कहाँ चली जाती है?  हाँ,  ये सही है की नीतीश ने पिछले 10 सालों में बिहार के विकास के लिए काफी काम किये। सड़कों की हालत दरुस्त की। लचर कानून-व्यवस्था में काफी सुधार किये गये। अफसरों की जवाबदेही तय की गयी। तमाम सुशासन सम्बंधित कार्य किया गया। लेकिन क्या सूबे की तस्वीर बदलने वाले व्यक्ति को, सिर्फ राजनितिक लाभ के चलते 'आतंकराज के मसीहा' के गोद में बैठ जाना सही फैसला है? उन्होंने राजनीतिक द्वेष-भाव से प्रेरित होकर एक ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाया, जो कहीं न कहीं अरस्तु और प्लूटो के उस कथन को बुलंद करता है की लोकतंत्र मूर्खों का शासन है। जिसका खामियाजा भी उन्हें भुगतना पड़ा और संभव है की जातिगत समीकरण के कारण चुनाव  में भी भुगतना पड़ेगा।
                                                                            लेकिन विपक्ष में बैठी बीजेपी क्या कर रही है? वही हंगामें, प्रदर्शन, नारे, रैलियां और पोस्टरबाजी। गद्दी पाने की चाहत में भले ही सदन ठप रहे, विकास रुक जाये,  पर जनता के कामों से उन्हें कैसा सरोकार। नेता का पहला और अंतिम काम क्या होता है? सत्ता पर कब्ज़ा करना। बिहार में मुख्य विपक्षी दल बीजेपी को सरकार द्वारा शुरू की गयी अच्छी योजनाओं पर सवाल उठाने, आलोचना करने से पहले लोगों के वास्तविक मुद्दे उठाने चाहिए थे, प्रदर्शन करने चाहिए थे। पर ये सब वो क्यों करें? उन्हें तो बस एक ऐसे व्यक्ति के नाम पर चुनाव लड़ना और लड़कर जीत जाना है, जो रंग-बिरंगी बण्डियां और सूट-बूट पहनकर भाषणो की झड़ी लगा देते है। पर उसका को ठोस नतीजा देने में अबतक उनकी सरकार विफल साबित हुई है।  नेताओं के VIP व्यव्हार, व्यापम घोटाला, सांसदों के वेतन वृद्धि, ललित-सुषमा-वसुंधरा पर मौन, उनके न खाऊंगा और न खाने दूंगा के दावों पर बहुत सारे प्रश्न-चिन्ह खड़ा करते हैं। उन सब में बिहार में भारतीय जनता पार्टी का आंतरिक कलह और जनता का मोदी से मोहभंग, निश्चित रूप से नीतीश को फायदा पहुंचाएगा। बिलकुल स्पष्ट है की जनता उसे अपना वोट क्यों दे, जिसका कोई घोषित नेता ही न हो? चुनाव पूर्व उम्मीदवार घोषित रहने से  मतदाताओं को निर्णय लेने में आसानी रहती है। कही उसका नेता किसी भ्रष्ट्राचार या आपराधिक पृष्टभूमि से तो नहीं जुड़ा है? उसकी छवि कैसी है? क्या वास्तव में वो मतदाताओं की अपेक्षाओं  को पूरा करेगा भी या नहीं?
                                                                                        जो भी हो पर, बिहार की जंग इतनी आसान भी नहीं। चाहे कितनी ही बार दस्तक दें, कितना भी ढोल पीटें या कितनी भी रैलियां करें। जनता उसे ही अपना नेता चुनेगी, जो  उनकी सभी अपेक्षाओं पर खड़ा उतरता हो। शायद इसलिए की चुनाव लोग, छल, चालों, दावों और अहंकार से नहीं जीते जाते, बल्कि बेहतर नेतृत्व देने से जीते जाते हैं।
                       
                    लेखक   अश्वनी कुमार, पटना, गुलज़ारबाग़ जो एक स्वतंत्र टिप्पणीकार बनना चाहता है। शायद इसलिए की  कोई उसकी बात सुनना ही नहीं चाहता। क्योंकि उसकी हैसियत अभी इतनी नहीं की खुलेआम वह अपने विचारों को प्रकट कर सके। प्रकट करेगा भी तो बच्चा समझ कर अनसुना कर दिया जायेगा।

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