Wednesday, 19 August 2015

मोदी की इस्लामिक राष्ट्रों से नजदीकी कितना जरूरी

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी छवि के विपरीत अरब देशों की यात्रा की। वहां उन्होंने संयुक्त अरब अमीरात के साथ वैश्विक, आर्थिक व् आतंकवाद के मुद्दे पर उसका समर्थन हासिल किया और इस दौरान पाकिस्तान को घेरने की कोई कसर नहीं छोड़ी। मोदी का एकाएक अरब दौरे को लेकर विश्लेषकों की भौं तन गयी थी क्योंकि मोदी की छवि एक कट्टर हिन्दू हृदय सम्राट की भांति है। मुस्लिम टोपी को पहनने से इंकार करना,  किसी भी मस्जिद में न जाना, मुसलमानों को चुनाव में टिकट न देना समय की मांग हो सकती है। यहाँ तक की प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने राष्ट्रपति के इफ्तार दावत से भी दुरी बनाई। क्योकि मोदी जानते हैं की गुजरात में मिली लगातार 3 जीत उनके विकास के दावे से ज्यादा  ध्रुवीकरण अहमियत रखती है। चूँकि गुजरात में विपक्षी कांग्रेस की छवि 2001 दंगों के बाद से हिन्दू-विरोधी सी हो गयी है। इसलिए सारे हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण कोई मजबूत विपक्ष न होने से बीजेपी की तरफ हो जाती है। ऐसे में अरब देश की यात्रा पर उनका मस्जिद में जान कूटनीति का एक अहम हिस्सा हो सकता है। चूँकि भारत अरब देशों समेत तमाम पश्चिमी एशियाई देशों से अपने मधुर संबंध बनाये रखना चाहता है। भारत अपनी जरूरत का अधिकतर कच्चा तेल इन्हीं देशों से खरीदता है और उनसे मित्रता रखना भारत के लिए काफी फायदेमंद रहा है। संभव है, भविष्य में आपसी सहयोग का दायरा और भी बड़ा होगा। 

यमन के मामले में हाल के दिनों में सऊदी अरब और ईरान के रिश्ते में कड़वाहट काफी बढ़ गयी है। यमन के अंदर शिया और सुन्नी के बीच चल रही गृह-युद्ध सऊदी अरब परोक्ष रूप से वहां के सुन्निओं का सहयोग कर है और उसने पाकिस्तान से मदद भी मांगी। ऐसे में ईरान ने कहा है की अगर पाकिस्तान युद्ध में सम्मलित होता है तो ईरान भी देर-सवेर इसमें कूदेगा और इससे स्थिति और भी बदतर हो जायेगी। इसके प्रभाव से भारत भी अछूता नहीं होगा। सीरिया और इराक में चरमपंथी ISIS के खिलाफ कार्रवाई के लिए अमेरिका के आग्रह के बावजूद भी भारत अपनी चुप्पी साधे हुए है। ISIS  आतंकवादी इराक के कई तेल कुओं पर कब्ज़ा जमाकर तेल की कीमतों में गिरावट की स्थिति बना दी है, क्योकि वह तेलों को बाज़ार भाव से काफी कम कीमत पर बेच देता है। 

Image result for modi visit in masjid imageसवाल है, दुनिया के सभी देश अपने फायदे के लिए कूटनीति को बढ़ावा दे रहे है, ऐसे में भारत इसका फायदा क्यों न उठाये? मोदी की अरब यात्रा पाकिस्तान के लिहाज से भी काफी संवेदनशील है। पाकिस्तान का ईरान और सऊदी अरब से संबंध वैसे ही है, जैसे भारत का रूस और इजराइल से। ऐसा नहीं है की पाकिस्तान उनसे हथियार खरीदता या बेचता है, लेकिन किसी मुद्दे के प्रति पाकिस्तान की विश्वसनीयता इन देशों के सामने बनी है। नतीजन, भारत ने भी पाकिस्तान को घेरने की समझदारी भरी चाल चली है। सीमा पर गोलीबारी के बावजूद भी भारत पाकिस्तान पर अपना आक्रामक रुख इसलिए नहीं अख्तियार कर सकता की युद्ध होने की स्थिति में अरब लीग व OPEC संगठन इस्लामिक होने के नाते पाकिस्तान का साथ दे सकते है। ऐसे में भारत संकटों से घिर जाएगा और अमेरिका साथ देने के बजाये शर्तें मनवायेगा, जैसा की उसकी फितरत रही है। कश्मीर पर भारत परस्त देशों की नज़रें पहले से ही ज़मी है। 

नरेंद्र मोदी चाहे कितने भी कट्टर  छवि रखते हों, चुनावों जितनी भी पाकिस्तान के प्रति सलाह दे डाली हो पर, वास्तविक वैश्विक, सामरिक कूटनीति के हालत बिलकुल अलग है। उन्हें वे सारे काम करने पड़ सकते हैं, वे सारे फैसले लेने पड़ सकते हैं, जो उन्होंने नहीं करने की सोची हो। यहाँ कदम-कदम पर कांटे हैं और उस काँटों से बचाकर देश को आगे बढ़ते रहना ही उन्हें एक अच्छे प्रधानमंत्री का तगमा दिलाएगा। 

लेखक:- अश्वनी कुमार, विदेशी मामलों की जितनी जानकारी रखता है उतना आपलोगों से बाटतें रहेंगे। 



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