Sunday, 9 August 2015

पोर्न साइट्स: आखिर भारत भी युवा है!

एक NGO ने उच्चतम न्यायालय में चाइल्ड पोर्नोग्राफी से संबंधित याचिका दायर कर 857 वेबसाइटो पर बैन लगाने की मांग की। कोर्ट ने सरकार को फटकार क्या लगाई, सरकार ने सारे 857 वेबसाइटो को आनन-फानन में बंद कर दिया। फिर क्या था, दशकों से जाती-धर्म-संप्रदाय के नाम पर आपस में लड़ रहे लोग, एक मंच पर आ खड़े हुए और इतनी आलोचना की, कि सरकार की चूजें हिल गई और उन्हें 24 घंटे में ही बैन वापस लेना पड़ा। इससे क्या साबित होता है? की देश की जनता को आपस में कितनी भी मतभेदें रहे, लेकिन जब बात उनके निजता तक पहुंचेगी तो वो चुप नहीं बैठनेवाले। आखिर उनकी भी इच्छाएं हैं, उनका भी अपना मान-सम्मान है। जब देश की संसद और विधानसभा के सदस्य सदन के अंदर कुछ भी कर सकते हैं, तो एक आम-आदमी बंद कमरे में वही चीज क्यों न करे? एक पन्ने पर जहाँ सुप्रीम कोर्ट इन सामग्रियों को हटाने का आदेश देती है, वहीँ उसी पृष्ठ के दूसरे पन्ने  स्वतंत्रता का अधिकार के अंतर्गत निजता का हनन पर अपनी विचार प्रकट करती है।  
                                                                                       चुनाव आते ही टीवी चैनलों पर मुर्गा-लड़ाई शुरू हो जाती है। जब कोई संवाददाता किसी बेरोज़गार युवा से सवाल करता है तो वो कहता है-  देखिये मुझे इनसब में कोई दिलचस्पी नहीं, मुझे तो केवल नौकरी चाहिए, ताकि देश का विकास हो। लेकिन उसी टीवी चैनल पर हमें ये भी सुनने को मिलता है की, वर्ष 2014 में सनी लियोनी लगातार दूसरे साल गूगल पर सबसे ज्यादा सर्च की गई। कौन करता है इसे सर्च?  आप कह सकते है- "बंद कमरे में कोई क्या करता है यह उसका अपना अधिकार है"। लेकिन कैसे? दिल्ली दामिनी कांड अभी भी हमारी जेहन में ताजा है, उस वक्त हम सभी ने देखा की कैसे छोटे-छोटे स्कर्टों में लड़कियां कैंडल लेकर,लड़कों के साथ संवेदना प्रकट कर रही थी। मेरा मकसद उन्हें गलत कहना कतई नहीं है, बल्कि जो लोग लड़कियों के प्रति बढ़ते अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाते हैं, वही लोग साइट्स पर लगी पाबंदी पर चीख-चिल्ला रहे थे। उन्ही लोगों की वजह से गूगल पर सनी लियोनी सबसे ज्यादा सर्च होने वाली सेलिब्रिटी बनती है और उसे स्टार का तगमा हासिल होता है। नतीज़न सनी लियोन बनने की चाहत देश की लड़कियों में देखने को मिल रही है। नारी सशक्तिकरण के हिमायती लोग अक्सर लड़कियों के पहनावे पर सवाल उठाये जाने पर उग्र हो जाते हैं। कहते है:- लड़कियां कुछ भी पहने इससे लड़कों का क्या?  नतीजा? आज कपडे ऐसे पहने जाते हैं की जितना छिपे उससे अधिक दिखे। लेकिन हमारी सभ्यता, संस्कृति इसकी अनुमति तो नहीं देता। हमारी सभ्यता पश्चिम की नग्नता से तो बेहतर है ना!
                                                                        बेशक, अगर सरकार सचमुच इन समस्याओं के प्रति गंभीर है तो उसे इस तरीके के प्रदर्शनों से कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। सबसे पहले तो उन सारे वेबसाइटो को बंद किया जाए, जो भारत सरकार के नियमों की अवहेलना करते हैं। सरकार उन वेबसाइटो के सर्वर भारत में स्थापित करने का आदेश जारी करे ताकि उनपर बारीकी से नज़र रखा जा सके । सेंसर बोर्ड नग्ण्ता का प्रदर्शन करने वाले अभिनेत्रियों को बैन करे, जिसे समाज को दूषित करने का एक हद तक श्रेय जाता है। तमाम रिसर्च ये मानते हैं की इन कंटेंट से व्यक्ति के मस्तिष्क पर कुछ तो असर अवश्य होता है। दुनिया में पोर्न देखने के मामले में हमारा देश तो अभी तीसरे स्थान पर हैं, लेकिन संभव है की एक-दो वर्षों में उसमे भी अव्वल हो जाएगा। अब तो 8  साल के बच्चे भी संक्रमित हो चुके हैं, देखिये आगे क्या-क्या होता है? जानकार कहते हैं:- "भले ही पूजा-पाठ के माध्यम अलग अलग हो लेकिन हर कोई ईश्वर की खोज में लगा है..... ईश्वर की। हंसो मत!

लेखक:- अश्वनी कुमार, जिसकी राय से कई लोग सहमत भी हो सकते हैं, और कई असहमत भी। फिर भी जो असहमत होंगे, उसका तो कुछ नहीं किया जा सकता। वही देश के भविष्य भी  हो सकते हैं... 

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