Tuesday, 27 October 2015

अपना वोट किसे दूँ?

शोर-शराबे का सिलसिला अब थम चूका है, चुनाव अपने अंतिम दौर में सरपट भागा चला जा रहा है। हर उम्मीदवार, हर राजनीतिक दल सत्ता का सुख पाने के लिए बेचैन है। पर उनकी तरह मैं भी असमंजस में पड़ा हूँ की अपना वोट आखिर किसे दूँ? मेरे क्षेत्र में जितने भी उम्मीदवार मैदान में खड़े हैं, चाहे वो बीजेपी का हो, जदयू का हो या फिर निर्दलीय हो, सारे उम्मीदवारों तथा मौजूदा विधायक को पिछले 5 सालों के दौरान न तो उन्हें जनता की समस्याओं से रूबरू होते देखा है और न ही क्षेत्र के लिए जनसेवा करते। यहाँ तक की अधिकतर उम्मीदवार को क्षेत्र में कोई जानता भी नहीं, बस पार्टी ने टिकट दे दी और चले आये चुनाव लड़ने!


मेरे लिए राजनीतिक दल के आधार पर वोट देना उलझन भरा है। कुत्ते-बिल्ली जैसी लड़ रही BJP-JDU-RJD तीनों ही गाली-गलौज और लोकलुभावन वादों के अलावा जनता के समस्याओं के मुद्दे पर चुनाव लड़ने की जगह एक-दूसरे की कमियां गिनाने में लगे हैं। नीतीश की विचारधारा सेकुलरिज्म का तथाकथित मिसाल है, जो इस भय में जी रहे है की भारत में उनका राज तभी तक सुरक्षित रहेगा जबतक इस्लाम की तलवार उसकी म्यान में हो, उन्हें मना कर चलेंगे तभी उनपर राज कर सकेंगे। उनका डर स्वाभाविक है की सत्ता पर संघ परिवार काबिज है और दूसरा की युवा नौजवान फक्र से कहने लगा है की 'गर्व से कहो, हम हिन्दू हैं' दूसरा उनका अहंकार व सत्ता में बने रहने  लालच उनकी सिर्फ सड़क-पुल बना देने की विकासगाथा को लालू के लिए भुला देने को तैयार हैं।  लालू का कथित जातिवाद राजनीतिक बेवकूफी का एक उदहारण है। संसद में अल्हड़पन, बुड़बकपन लाने का श्रेय लालू को ही जाता है। मंडल के सहारे राजनीतिक जमीन तलाशकर खुद को यादवों का नेता घोषित करके 15 साल में बिहार में शासन किया। इस दौरान उन्होंने यादवों-पिछड़ों का कितना विकास किया ये समूचा राज्य जानता है।  पर हाँ, भले ही गरीब अपना विकास न कर पाया हो, लेकिन इस दौरान लाठी, बन्दुक की नली के सहारे गरीबों का शोषण भी हुआ और भ्रष्टाचार-अपराध का तेज़ गति से फला-फुला भी। सेक्युलर जमात में शामिल लालू को भी इस्लाम के नेक और अनेक बन्दों को लेकर उतनी ही चिंता है जितना की नितीश को।

चुनाव आयोग अपनी जिम्मेवारी बखूबी निभा रहा है, लेकिन उसे राजनीतिक वंशवाद, अवैध खर्चों तथा बेलगाम जुबानों पर प्रतिबन्ध लगाना होगा। हर कोई अपने बेटे-पोते को जबरदस्ती जनता पर थोप रहा है, जिसे दस लोगों के बीच सही से बोलना नहीं आता उसे लाखों लोगों का प्रतिनिधि बनाया जा रहा है। चुनावों में टिकट उसे ही दिया जाता है जो करोड़पति हो चाहे उस क्षेत्र का न हो पर, पार्टी को चंदा देने पर सब छिप जाता है। इसलिए, कोई दूध का धुला नहीं है। सभी मक्खियाँ लिपटी है, जरुरत है सत्ता का शहद चूसने से रोकने की। चुनाव सुधार की बात करने की, राईट टू रिकॉल क़ानून लाने की, जल्द न्याय दिलाने की तथा गंवार नेताओं को राजनीति को अपना विरासत समझने से रोकने की। तभी उसके प्रति मेरा सच्चा समर्थन होगा ....भारतीय जनता पार्टी भी खुद को पिछड़ों का हितैषी बताकर वो सबकुछ करने लगी है जो हर किसी को सत्ता का सुख कराती है। गरीब, पिछड़े, कुपोषित, निर्धन जैसे शब्द रैलियों में या कागजों पर ही अच्छी लगती है। वास्तविक हकीकत तभी पता चलेगी तब हेलीकॉप्टरों या लक्ज़री गाड़ियों से उतरकर खेतों में चलें, निर्धन बस्तियों से गुज़रें। सारे दलों ने प्रचार में जिस तरह से पैसे बहाय हैं, अगर वे पैसे गरीबों की बेहतरी पर खर्च कर दिया जाता तो भला हो जाता। लेकिन वे ऐसा क्यों करेंगे? देश की गरीबी मिट जायेगी या सारे अनपढ़ शिक्षित हो जाएंगे तो उनके झंडे कौन ढोएगा, रैलियों में तालियां कौन ठोकेगा? और फिर उनके जल्लाद, शैतान, कनफुँकवा कहने का मतलब ही क्या रह जाएगा?

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