Saturday, 5 December 2015

वेतन आयोग से गरीबों को क्या फायदा?

सातवां वेतन आयोग सरकारी कर्मचारियों के वेतन-भत्ते को 24 फीसदी तक बढाने की सिफारिश सरकार से कर चुकी है| इस समय भारत सरकार में लगभग 40 लाख कर्मचारी सेवारत हैं, जबकि 58 लाख पेंशनभोगी बेमतलब सरकार का खजाना खाली कर रहे हैं| यानी अगर आयोग की सिफारिशों को जस का तस लागू कर दिया जाए तो देश पर एक लाख करोड़ रूपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा| लगभग एक करोड़ लोगों की वेतन वृद्धि योजना पर लगता नहीं है की मोदी सरकार उन्हें नाराज करने का जोखिम ले पाएगी| क्योंकि किसी भी सरकार के लिए सबसे जरूरी चीज होती है, सत्ता में बने रहना| मोदी सरकार अपनी घटती लोकप्रियता के धारे में वेतन आयोग नहीं मानने जैसा बवंडर शामिल नहीं कर सकती| यह उसकी मजबूरी है, लेकिन क्या ऐसी सिफारिशें भारत की आर्थिकी में पंख लगा देगी या उसके पर कतर के मंदी को न्योता देगी? जाहिर बात है की देश पर एकाएक एक लाख करोड़ रुपये का बोझ मुद्रास्फीति, मंदी और महंगाई बढाने का कारण बन सकती है|

वेतन वृद्धि का पैमाना परफॉरमेंस के आधार पर बने| प्राइवेट सेक्टर की तरह, जितना काम-उतना पैसा| लेकिन यहाँ काम करने वाले भी और न करने वाले भी दोनों की वेतन में वृद्धि कर दी जाती है| सातवाँ वेतन आयोग बिना किसी शर्त या फेरबदल के लागू कर दी गयी तो सरकारी कर्मचारी, प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले लोगों को मुंह नहीं चिढ़ाएंगे? बेशक, उनकी कुंठा बढेगी, जब किसी को बिना काम किये वेतन मिलेंगे! ऐसे में जनता का पैसा बेवजह कामचोर कर्मचारियों पर खर्च करना मुर्खता ही है|

लेकिन भारत के उन 30 करोड़ गरीबों की चिंता किसे है? उनका क्या होगा, जिनकी 29 रुपये की दैनिक क्रय शक्ति से चुकाए गए उनके टैक्सों से नौकरशाह 2.50 लाख का वेतन पायेंगे? रिटायर होने पर भी कर्मचारियों को भारत में जितनी सुविधाएँ मुहैया कराई जाती है, उतनी दुनिया के किसी देश में नहीं मिलती| क्या अबतक हमारी सरकारों ने गरीबी, महंगाई से लड़ने के लिए बयानों और योजनाओं के अतिरिक्त कुछ किया है? कभी गरीबी उन्मूलन के प्रति सच्ची प्रतिबद्धता नहीं दिखी| उसे वेतन आयोग के जैसे ही किसान आयोग का भी गठन करना देश के लिए फायदेमंद होता| फिर भी जो है उसमें सुधार की गुंजाइश है| देश है, संसद है, क़ानून है और व्यवस्था भी है| लेकिन गरीबों के लिए नहीं! ये बातें वेतन आयोग के सन्दर्भ में लागू भी होती है|

गरीबों की कोई नहीं सुनता! अगर कोई सुनता तो उसे भी खाद्ध सब्सिडी, वृद्धावस्था पेंशन, छात्रवृति जैसी योजनाओं में वृद्धि की भी सिफारिशें होती| फिर हंगामा मचता और आर्थिक बोझ का हवाला देकर सिफारिश रद्द कर दी जाती!  सरकार हर महीने देश के गरीब बुजुर्गों को 400रु० का पेंशन देती है, जब कर्मचारियों के लिए महंगाई बढ़ रही है तो देश के अन्य लोगों के लिए क्यूँ नहीं? मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी क्यूँ नहीं बढती है? अनाज का न्यूनतम समर्थन मूल्य स्थिर करके किसानों को खेती छोड़ने पर मजबूर क्यूँ कर रही है? अक्सर हमारे देश की सरकार राजकोषीय घाटे का रोना रोती है| कहती है, खर्च बढ़ रहे हैं| लेकिन कभी उसने अपने लापरवाह और जिम्मेदार अफसरों की ठाठ-बाट या उसकी फिजूलखर्ची देखी है? सरकारी आयोजनों में 100रु प्रति प्लेट का खाना वो 400 रु/प्लेट खरीद कर लाते हैं, लाखों रूपये किराए वाले एसी होटलों में घंटे भर की मीटिंग कराते हैं उसका क्या? किसी महापुरुष की जयंती पर दिखावटी सम्मान जताने के लिए पूरे देश के सरकारी दफ्तरों में फिजूल खर्चे करके जनता का करोड़ों रुपये यूँ ही फूंक डालते हैं| इनसब पर कभी सोचा है हमारी सरकारों ने? फिर भी सब कुछ देखते हुए भी आँख बंद कर लेना उनकी राजनीतिक मजबूरी है!

मेरे कहने का कतई ये मतलब नहीं है की कर्मचारियों की वेतन में वृद्धि नहीं हो| हो पर परफॉरमेंस के आधार पर, काम के आधार पर, सामाजिक न्याय और समानता की शपथ को याद करते हुए| समानता का मतलब यह नहीं होता की देश में एक व्यक्ति को 2.50 लाख हर महीने मिले तो एक ओर 30 करोड़ की आबादी भूखे रहने को मजबूर हो, खुले में शौच करने को मजबूर हो|  इसलिए मोदी सरकार ये मान कर न चले की उनका हर फैसला उनके 19 करोड़ वोटर सर-आँखों पर लेंगे क्योंकि कांग्रेस के उत्पात से समूचा देश खदबदाया हुआ था| उसी के क्रोध ने मोदी की राजगद्दी पर पर बैठने का योग बनाया| सरकार हर सिफारिशों को आँख-मूंदकर मानने के बजाए उसे अच्छी तरह ठोक-बजाकर राष्ट्रहित सुनिश्चित करे इसी में देश की भलाई है...

लेखक:- अश्वनी कुमार, पटना जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता
है’(ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... आते रहिएगा...




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