Thursday, 25 June 2015

आपातकाल की आशंका...

26 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी द्वारा देश पर थोपे गए इमरजेंसी के 40 वर्ष होने को है। भारत के लोकतंत्र में तानाशाही का ये काला धब्बा, आज भी उस जमाने के लोगों के जेहन में अब भी जिन्दा है। आपातकाल की कहानी तब शुरू होती है, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट में राजनारायण की ओर से इंदिरा की रायबरेली चुनाव को अवैध घोषित करने वाली याचिका डाली गई। जिसे बाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सही पाते हुए उनकी संसद सदस्यता रद्द करके 6 साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगा दिया था। नतीजन, सत्ता छुटते देख इंदिरा ने देश में आपातकाल घोषित कर दिया। सभी नागरिकों के मौलिक अधिकार छीन लिए गए, प्रेस की स्वतंत्रता छीन ली गई और देश में एक तानाशाही शासन लागू हो गया। संपूर्ण क्रांति का आह्वान करने वाले जयप्रकाश नारायण की एक बड़ी भूमिका आपातकाल लगने में मानी गई। इससे पहले जेपी कांग्रेस की अव्यवस्था के विरुद्ध अक्सर आवाज उठाया करते थे, रैलियाँ करते थे। फलस्वरूप, देश में कांग्रेस विरोधी माहौल तैयार हो रही थी, जिसे इंदिरा खुद के लिए बड़े खतरे के रूप में देख रही थी। जेपी का कवि रामधारी सिंह दिनकर द्वारा लिखा नारा पूरे देश में गूँज रहा था की '' सदियों से ठंडी बुझी राख सुगबुगा उठी, मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है, दो राह समय के रथ का घर्घर नाद सुनो, सिंहासन खाली करो की जनता आती है।'' जेपी आंदोलन व आपातकाल का सहारा लेकर कई प्रमुख नेता आज किस ओर जा रहे हैं, इस पर हमें चर्चा करने की कोई जरूरत नहीं। लालू, नीतिश जैसे नेता, जिनका जन्म ही कांग्रेस विरोध की बिसात पर हुआ था, आज वही कांग्रेस के बाँहों में हाथ डालकर चलते देखे जा सकते हैं। क्या ये राजनीति का स्वार्थ नहीं? आज वो नेता कहाँ गुम हो गये, जो कभी खुद को जेपी-लोहिया का अनुयायी मानते थे? या सत्ता के अँधेरे में गुमनाम हो गए? तमाम सवाल हैं, पर इसका जवाब शायद वो कभी निष्पक्षता से नहीं देना चाहेंगे। आज देश में इमरजेंसी लगे 40 वर्ष हो गये पर, कोई क्यों नहीं जनता को अबतक विश्वास दिला सका की अब ऐसे हालात पैदा नहीं होंगे? संविधान में उसके बाद इस हालात से निपटने के लिए कौन-कौन से प्रावधान किए गए? सत्ता का मोह किसे नहीं है? चाहे बात कांग्रेस की हो या बीजेपी की। उस वक्त इमरजेंसी पर मुहर फखरुद्दीन अली अहमद ने लगाई थी पर, चिंता ये है की आज भी उस पद पर एक ऐसा व्यक्ति बैठा है जो आपातकाल का प्रशंसक रहा है। पर हमें ये नहीं भूलना चाहिए की ये 1975 नहीं 2015 है। आज जो लोग सत्ता चला रहे हैं, उनमें से बहुत सारे लोग आपातकाल के भुक्तभोगी रहे हैं। दूसरी तरफ देश में उस वक्त इंदिरा के लिए इमरजेंसी लगानी आसान थी, क्योंकि ज्यादातर राज्यों में कांग्रेस का शासन था। जिसकी कीमत उन्हें 1977 के चुनावों में करारी हार के साथ चुकानी पड़ी थी। पर अब इसकी हकीकत बिल्कुल अलग है। ऐसी संभावनाओं का ख्याल मन में आना और भी प्रबल हो जाता है, जब लोगों का सत्ता से मोहभंग काफी तेजी से होने लगा है। रंग-बिरंगी बंडियाँ और सूट-बूट पहनकर भाषणों की झडी लगा दी जाती है, पर उसका कोई ठोस नतीजा देने में ये 56 इंच सीने वाली सरकार विफल साबित हुई है। जनता से नेहरू का मोहभंग होने मे 15 साल लगे थे, इंदिरा से 10 साल, राजीव से करीब 3 साल और मनमोहन से 6-7 साल लगे थे। पर इस सरकार से एक वर्ष में ही मोहभंग होने के कगार पर है। इस बीच न तो मोदी सरकार को चीन युद्ध, इमरजेंसी, बोफोर्स घोटाले, कोय़ले घोटाले का दंश झेलना पड़ा, फिर भी ऐसी स्थिति क्यों? जो भी हो, लेकिन आपातकाल की आशंका उतनी सही नहीं, क्योंकि तब के और आज के हालातों में काफी अंतर है। फिर भी तो अच्छे दिनों के स्वप्न धूमिल होते जा रहे हैं, इसका क्या? ........... लेखक - अश्विनी कुमार, जो एक स्वतंत्र टिप्पणीकार बनना चाहता है।

Wednesday, 24 June 2015

The Condition of old in Society

Truely, The condition of old is not well in our respected Indian society. There was an era, when children were relaxed in the lap of grand Mother and disappear to the blitzing world of angles' story. Now, There aren't enough interesting story of grand mother. Today's modernization made it loom in the society, or send to the old home whether, their parents don't want to appear his child to them. What happen with those parents in future? Will their son not treat same as which they are doing? Would those not go through old age? There all answer wouldn't satisfy anyone. Why? because 'tit for tat'.

 Present condition for old age in all class of society is not so good. often, The Harassment of old like Father, Mother, Grandfather has become the symbol of irretative, which completely uncultured. Whether, let us talking about well educated senior citizen like Ex. Government servant or, Middle & low class. All over in the country echoing that type of problems. What is the solution for it? Government have to try an ordinace for the safety of senior citizen and it is also enacted. But, else they have fail to provide facilities from their child. Everyone has become selfish. First, they would try to capture the right upon patrimonial heritage. After which, Start mental harassments of olds. Where are leaking to cause this? Has education not better than 5 decade ago? Or, should moral education neccesiate in the present syllabus? Now, we come at today's children. Today his childmind is changing, his innocent face has reducing and his sociological environment has profane. so, we can said that When , society didn't exist as previous decade, People are changing then vehemently, children, their gesture also will be rejuvenate. That also surviving our adult at present. 


 Writer : - ashwani kumar, who ever want to become a Independent Remarker.....

Tuesday, 23 June 2015

लोकतंत्र पार्टियों का खेल है...

हम सब के चेहते पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी संसद में चर्चा करते हुए अक्सर कहा करते थे की 'लोकतंत्र संख्या का खेल है'। लेकिन जिस अंधाधुँध तरीके से राजनीतिक पार्टियों की संख्या बढ़ रही है उससे तो लोकतंत्र पार्टियों का खेल लगती दिख रही है। चुनाव आयोग के आँकड़ों के अनुसार अकेले देश में 1761 निबंधित पार्टियाँ है, जबकि खुदरा दुकानों जैसी अनिबंधित पार्टियों की कुल संख्या 1706 है। हमारे संविधान निर्माताओं ने भारत को बहुदलीय प्रणाली वाला लोकतंत्र तो बना दिया, पर इस कुकरमुते जैसी फलने-फुलने वाली दलों पर लगाम लगाने की कोई व्यवस्था नहीं की। नतीजा... आज हालात ये हैं की आयकर विभाग की नजरों से बचने के लिए कई लोग दुकान सजाकर बैठ जाते हैं, तो कई अपना स्वार्थ सिद्ध करने को देश के लिए चिंतन में लगे रहते हैं। उन्हें उनके भोपुओं से होने वाली आम-जनता कि परेशानी से कोई मतलब नहीं, इलाके में अपनी बेहतर छवि के लिए वे कितना ही धन लुटाने को तैयार होते हैं। फिलहाल, कुछ इसी तरीके से हमारे इलाके में भी एक नई पार्टी खुली है 'राष्ट्रीय सदाबहार पार्टी' । ठेले, चाय, फुटपाथीयों, सब्जीवालों की पार्टी 'राष्ट्रीय सदाबहार पार्टी'। अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे इस दल के घोषणापत्र को पढ़कर मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ। वही रटी-रटाई बातें, लोकलुभावन वादे व उन सब में छिपी अपनी सरकार बनाने के ख्वाब। पर इन सब में नया क्या? हमें पिछले 63 सालों से गरीबी मुक्त, सुख-सुविधा युक्त भारत के सपने दिखाए जा रहे हैं, लेकिन इसे हकीकत बनाने का सपना हमें कौन दिखायेगा? बिहार की वास्तविक हकीकत से हम सभी भलीभाँति परिचित हैं। सदाबहार पार्टी कहती है, हम 24 घंटे बिजली देंगे, महिलाओं के लिए 50 फीसदी आरक्षण का प्रावधान करेंगे, हम बिहार से भ्रष्टाचार हटा देंगे, हम फल, सब्जी, पानवाले, फुटपाथीयों के लिए दुकान का इंतजाम कर देंगे। लेकिन करेंगे कहाँ से? ये वादा तो हर राजनीतिक पार्टी करती है। दिल्ली में केजरीवाल ऐसे रटे-रटाये मुद्दों से सत्ता में नहीं पहुँचे! चुनाव लड़ने से पहले अन्ना आंदोलन से जुड़े, उन्होंने कितनी ही बार जेल की सैर की। भ्रष्टाचार, बिजली, पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं के ऊपर विश्वसनीय वायदा करके उन्होंने दिल्ली की जनता के बीच अपनी अच्छी पैठ बना ली थी। नतीजा? आज वो सत्ता तक पहुँच चुके हैं। लेकिन, अगर हम 'सदाबहार पार्टी' को देखें तो नाम के अतिरिक्त इनमें कोई ऐसी बात नहीं, जिससे ये जनता में लोकप्रिय हो सकें। इस पार्टी राष्ट्रीय अध्यक्ष उस क्षेत्र से चुनाव लड़ने वाले हैं, जहाँ बिहार-विधान सभा में विपक्ष के नेता 'नंदकिशोर यादव' की लोकप्रियता जनता के बीच चरम पर है। वे 1995 से अबतक अजेय हैं। दूसरी तरफ ओमप्रकाश यादव की शख्सियत उस ऊँचाई पर भी नहीं है, जो किसी पार्टी के अध्यक्ष में होनी चाहिए। न तो उन्होंने क्षेत्र के लिए कोई जनसेवा की है और ना ही कोई ऐसा काम कराया, जिससे मतदाता अपने नेता की छवि उनमें देख सके। हर राजनीतिक दल के अध्यक्ष, महासचिव खुद को क्रांतिकारी मानकर मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री के गुण खुद में देखने लगते हैं। ऐसे कुल मिलाकर देखा जाए तो, ये बहुत अच्छी बात है की हमारे इलाके से भी एक नेता उठ खड़ा हुआ है जो संभव है की हमारे अधिकारों के लिए लडेगा। इनकी पार्टी अगर अन्य दलों से कुछ अलग करती जैसे :- घोषणापत्र के स्त्रोतों का पता बताता, चुनाव सुधार, राईट टू रिकाल जैसी ज्वलंत मुद्दों पर अपनी मजबूत इच्छाशक्ति को जनता के बीच ले जाता तो ज्यादा बेहतर होता। ऐसा क्यों होता है की चुनाव के वक्त गरीबी, भुखमरी, जातिवाद को मुद्दा बनाकर वोट बैंक की तलाश की जाती है? जबकि पानी के मोटे पाइपों, सुरंगों और फुटपाथों पर तो गुजर-बसर करते लोग विकास के आँकड़ों के जीवंत कार्टून हैं। आखिर कार्टून बना किसने रखा है... हम सब जानते हैं..... लेखक - अश्विनी कुमार, जो एक स्वतंत्र टिप्पणीकार बनना चाहता है... लेकिन अभी उसकी इतनी हैसियत नहीं की वह अपने विचारों को खुलेआम प्रकट कर सके। शायद इसीलिए हमें यह ब्लाग बनाना पड़ा.....

Monday, 22 June 2015

Mentality of Bollywood's Director

Good Morning with delight... There is a burning issue of our respective society is one the censor of Bollywood. The indication of film industry is clearly revealed to move towards Nudity or, we can said that it has reached the zenith of vulgerization also, vulgarised. There was an era, where on time, Actress Nargis hadn't get into her scraf, Resulting Censor Board refused to give certificate. But Today, for the name of modernisation, competition to get more crores, and even to show partisan of youth, They want to raze the fame of indian culture & its civilization. De facto, There is no doubt, Nudity of Film industry attracts teenager even youth, Inferior dress of actress like Sunny Leone, Rakhi Sanvant provide them some-time spree but, After that How much effect on their mind, their conscience? Many research found, merely the exhibition of half naked body, They strongly attract towards genetics implementation, Rise question Why, How, When? Specially for teenager, who also seeks to know by their parents, You can't imagine that How do those parents manage situation? Indeed, whose apathy creating that type of consequence? People loudly blame Government, said, that is compeltely irksome, even the result of insensitivity of censor Board. However, If we consider deeply throughout top to bottom, found 'not one of them is guilty' but top most officer of censor board don't seem to be accountable for their duty to save Name & Fame of indian society. Few months ago, reveal the cause of insentivness in bribery scam. Government has responsibility to save the voilence of constitution, so They would take strong action against irresponsible officers. Directors who try to enhance pornography, also lodged FIR and send to jail anyone who try to manage the dignity of India. I hope like as 'good days of modi' and said same "Achche Filmo ke bhi, achche din aayenge." Writer :- ASHWANI KUMAR, who ever want to become a well-known columnist...

Sunday, 21 June 2015

सब पढ़ें- सब बढ़ें, मगर कैसे?

बिलकुल, आज हम सभी भारत की शिक्षा व्यवस्था से भलीभाँति परिचित हैं। लेकिन ये व्यवस्था कितने बेतरतीब ढंग से खतरनाक और नकारात्मक दिशा की ओर अग्रसर है, जिनका अनुमान भी लगा पाना नाइंसाफी होगी। नाइंसाफी उन बच्चों की होगी, जिन्हें स्कूल में पढ़ाने के लिए नहीं बल्कि, खिचड़ी खिलाने के लिए लाया जाता है। जब देश आजाद हुआ था तब उस समय हमारी साक्षरता दर मात्र 16 फीसदी के आसपास थी, लेकिन वर्ष 2011 के अनुसार यह बढ़कर 74.14 ./. तक पहुंच गई। जबकि केरल, तमिलनाडु आदि राज्यों में तो यह आँकड़ा 90 से 100 फीसदी तक का है। इसके अतिरिक्त, आजादी के बाद साक्षरता दर से कहीं ज्यादा विकास जनसंख्या दर का हुआ। नतीजा... आज हमने पढ़े-लिखे बेरोजगारों की एक बहुत बड़ी फौज तैयार कर ली है, जिसका सारा श्रेय सरकार की गुणवत्तापूर्ण रहित शिक्षा प्रणाली को जाता है।
                                           हालात ये हैं की वर्तमान शिक्षा व्यवस्था दो भागों में बाँट दी गई है - पहला, सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले गरीबों की तथा दूसरा, निजी स्कूलों में पढ़ने वाले अमीरों की। निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे बेहतर मार्गदर्शन व रणनीति के कारण परीक्षा में अच्छे अंक लाकर, अच्छे कॉलेजों में दाखिला तो ले लेते हैं। पर, इन खिचड़ी खाने वाले गरीबों का क्या? सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की क्या इतनी हैसियत भी होगी, जो परीक्षा में उनकी बराबरी भी कर सकें? शायद सही कहा जाता है की इन गरीबों का कोई माँ-बाप नहीं। बस इनका काम कमाना, खाना और सो जाना है। लेकिन जब किसी गरीब का बेटा सफलता हासिल करता है तो ये बिलकुल उन लोगों के लिए चाँटे के समान होता है, जिनकी दोहरी नीतियों के कारण ये गरीब हमेशा उनके दोगलेपन का शिकार होते हैं। कुल मिलाकर आज हालात ये हैं की हमारी शिक्षा प्रणाली पूरी तरीके से अंकों पर आधारित हो गई है। कई बच्चे 96 ./. अंक लाने के बावजूद भी खुश नहीं हो होते, क्योंकि उन्हें दिल्ली यूनिवर्सिटी में दाखिला नहीं मिलेगा। सोचकर डर लगता है की उन बच्चों पर क्या गुजरती होगी, जिनके 50-60 ./. अंक आते हैं। वो दिल्ली यूनिवर्सिटी तो क्या शहर के अच्छे कॉलेज में भी नहीं पढ़ सकता। आखिर इसका दोषी कौन है? क्यों हमारी शिक्षा अच्छे-बुरे कॉलेजों के बीच फँसी है? वैसे कॉलेज हैं ही क्यों, जो अच्छे नहीं हैं? अगर सरकार सभी कॉलेजों को DU, JNU, BHU जैसी नहीं बना सकती तो कॉलेज खोल ही क्यों रखा है? क्या उसे सचमुच अच्छा नहीं बनाया जा सकता? इन सवालों के जवाब कोई ढुँढता नहीं दिखता! क्योंकि हमारी इतनी हैसियत नहीं की हम DU, JNU में पढ़ सकें। हम खिचड़ी वाले स्कूलों के विधार्थी रहे हैं, हमारी इतनी हैसियत भी नहीं की पिज्जा बर्गर खाने वालों की बराबरी कर सकें।
                                                अकेले देश में हर साल 15 लाख इंजीनियर बनते हैं, जिनमें से मात्र 4 लाख को ही नौकरियाँ मिलती है। 50 लाख ग्रेजुएट बेरोजगार हर साल बाजार में उतरते हैं, पर उनमें से 30 ./. से भी कम नौकरी के लायक होते हैं। ऐसा क्यों? सरकार कहती है, सब पढ़ें-सब बढ़े, लेकिन कैसे? सरकारी स्कूलों में शिक्षक ही नहीं है, हैं भी तो खिचड़ी खिलाने से फुर्सत नहीं मिलती। दूसरी तरफ हमारी सरकार के पास भी इतना समय नहीं की वो राजनीति छोड़कर इन फालतु चीजों पर ध्यान दे। निजी स्कूलों के माफियाओं का जंजाल इतना बड़ा हो चुका है की किसी को छूने तक की हिम्मत भी नहीं। बेशक, गरीब-गरीब बनता रहे, बेरोजगार बनता रहे, अशिक्षित रहता रहे... क्योंकि अगर सभी शिक्षित हो जाएंगे तो उनके झंडे कौन ढोयेगा? रैलियों में तालियाँ कौन ठोकेगा? एवं सबसे महत्वपूर्ण, पैसे लेकर वोट कौन देगा?.....
 लेखक - अश्विनी कुमार..... जो एक स्वतंत्र टिप्पणीकार बनना चाहता है।

Saturday, 20 June 2015

मेरा परिचय.....

मैं अश्वनी कुमार पटना जिले के ग्रामीण इलाके 'जैतिया' गाँव से आता हूँ। पर वर्तमान में पटना, गुलजारबाग में रहता हूँ, जहाँ से मेरी लेखन के प्रति रुचि जगी। शायद देश की राजनीति के दोहरे चरित्र का बहुत बड़ा योगदान, मुझे यहाँ तक खींच कर लाने में है। जब छोटा था, तब एक सवाल मुझे अक्सर परेशान करता था की, वोट देने से क्या फायदा? पैसे से खरीदकर हर जरूरत का सामान ले आएँगे, ये कौन होते हैं नीतियाँ बनाने वाले? अब हँसी छूटती है जब कोई और बच्चा ऐसा तर्क देता है। मन करता है..... भले ही ले लो ये नेता, उसका संविधान या उसकी नीतियाँ पर, फिर से लौटा दो वही बचपन वाली मासूमियत..... है ना! पेज पर आते रहियेगा.....
मै वही लिखता हूँ, जो हम और हमारे आसपास के लोग देश और दुनिया की घटनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं। लिखना जोखिम भरा हो सकता है, लेकिन अबतक कोई ऐसा पैदा नहीं हुआ, जो किसी के अंदर के विचारों को मार दे। लिखना शुरू से ही मेरा शौक रहा है, जो संभव है की आगे हमारे पेट-पालने का एक जरिया भी बनेगा..... आते रहिऐगा.....

आडवाणी का अनुमान कितना सही...

आडवाणी का अनुमान कितना सही....

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                  By:   ashwani patna city, gulzarbagh