Thursday, 30 July 2015

डॉ० कलाम, आप फिर से आओ ना...

डॉ० अवुल पकीर जैनुअब्दिल अब्दुल कलाम। आपने तमिलनाडु के रामेश्वरम के गाँव में बेहद साधारण परिवार में जन्म लिया। देश के अन्य लोगों की भांति आपने भी तमाम मुश्किलों का सामना किया। अख़बार बेचे, बहुत से असफलताओं को बड़ी आसानी से आपने गले लगाया, तमाम कठिनाइयों के साथ चलकर उन्हें मात दी। देश के पहले गैर-राजनीतिक राष्ट्रपति बनकर करोड़ो लोगों के प्रेणास्त्रोत बने। इनसब में आपका बच्चों से प्यार वाकई 'महामानव' का दर्जा देता है। पर, अब हमें सपने कौन दिखायेगा? असफलताओं से न घबराने के लिए कौन कहेगा? भारत को विश्वगुरु बनाने का विश्वास हमें कौन दिलाएगा?
                                                                                    डॉ० कलाम, आप शायद ही देश के लोगों के दिलों से बाहर हो पायेगें। वर्ष 1947 तो स्वतंत्रता का वर्ष था, पर 1998 पूर्ण स्वाधीनता का वर्ष था। पोखरण-2  में आपके अथक, अदम्य साहस और परिश्रम के फलस्वरूप ही आज भारत की गिनती महाशक्तियों में होती है। अंतरिक्ष विज्ञानं से  स्नातक करने के बाद देश की रक्षा तैयारियों का जिम्मा अपने ऊपर ले लेना किसी के बूते की बात नहीं थी। पृथ्वी, अग्नि जैसी मिसाइलो के सूत्रधार का ऋण  शायद ही कभी चुका पाये। लेकिन हाँ, आपके ये कहने के बावजूद भी की 'मेरी मृत्यु के बाद कोई छुट्टी ना मनाई जाए' पूरा देश आपके लिए भावविभोर होकर श्रद्धांजलि  दे रहा है। डॉ० कलाम जैसा सपूत शायद ही इस युग में दुनिया को मिले, ये सभी जानते हैं। पर, आपके जैसा त्यागी-सन्यासी भी तो नहीं मिल सकते। जो राष्ट्रपति बनने के बाद अपनी सारी सम्पति-बचत देश के जरूरतमंदो को दान कर दे, सिर्फ ये जानने पर की राष्ट्रपति की जिंदगी भर के खर्चे सरकार ही वहन करती है। 
                                                                                      जैसा की आपने अपनी आत्मकथा में लिखा है की "मेरे परदादा अवुल दादा पकीर और मेरे पिता जैनुलाअबदीन के बाद मेरे ऊपर उनकी पीढ़ी ख़त्म हो जायेगी,  मैंने कुछ हासिल नहीं किया...मेरे पास कुछ नहीं...ना बेटा, न बेटी न परिवार। यही कथन आज लोगों को रुलाने पर मजबूर कर रही है। सारे भ्रष्टाचारी, अहंकारी नेताओं को उनसे सीख लेनी चाहिए की वास्तव में देश-प्रेम कैसा होता है। आपका ये कोई स्वतंत्रता वाला देश-प्रेम नहीं था, ये कोई वीर-भूमि में इतिहास रचने वाला देश-प्रेम नहीं था, बल्कि अपनी त्याग, तपस्या और मेहनत के बल पर भारत का सिर दुनिया में गर्व से ऊँचा करके भी  साधारण बताने वाले व्यक्ति का देश-प्रेम था। एक शिक्षक के रूप में खुद को मानने वाले अपनी इच्छा के अनुसार ही पढ़ाते-पढ़ाते चले गए, इससे  ज्यादा भगवान का क्या आशीर्वाद हो सकता है?
                                                                                भारत रत्न, मिसाइल मैन डॉ० कलाम को  पूरा देश याद कर रहा है। कलाम साहब, ऐसी विदाई शायद दशकों में पहली बार किसी को मिली हो। फिर भी तो आपके व्यक्तित्व से कम ही है। आप फिर से आओ ना... देखो ये बच्चे कैसे नम आँखों से आपका इन्तजार  कर रहे हैं...
देखो कैसे पूरा देश आपको फिर से आने के लिए कह रहा है... तीनों सेनाएं, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री समेत पूरा देश 7 दिनों का राष्ट्रीय शोक मना रहा है। डॉ० कलाम, आज तक मैं की राजनेता या हस्ती को सॉलूट नहीं किया लेकिन, आपके लिए मेरा यह सॉलूट...Image result for army salute kalam image
लेखक:- अश्वनी कुमार, जो कलाम जैसा बनने की नाकाम कोशिश ही कर सकता है, बन नहीं सकता। 

HOPLESS PEOPLE OF BIHAR

Now, After a long days, I have come to express our conception in witch language ‘English’. So, I am talking about current political stability of Bihar State today. Therefore, presently flowing here the storm of election. So, Naturally there have arrived a lot of politicians to strengthen their ground. Many would be politicians rounding the office of parties to ensure his ticket in election. Allegation-Reallegation is at the zenith in state. One side BJP along with his colleague attack on their rivals with a lot of union ministers including prime Minister. BJP says ‘kya chalegi bharasta, apradhion our ahankarion ki sarkar, so abki baar bhajpa sarkar’. Another side, Nitish also attacks with his dubious friend lalu on BJP, and they want to prove wrong the reign of BJP in central government yet. Nitish launched a propaganda in the form of ‘Har-Ghar dastak’. All corners of the city exist with a big hording of Nitish quoted ‘Yun hi badhata rahe bihar, ek baar phhir nitish kumar’.
                                               But, The main question, who is best for people, which is the most beneficent for common man? Many question rises in the sense of good governance, development and humanitarian MLAs, but No one want to answered there question. Prime Minister Narendra Modi comes to Bihar and what is doing? Repeated same promises, sharply attacks on existence government. Probably, Modi would be forgotten their promises of good days. Just same as ‘Contrary thief scolded police(ulta chor kotwal ko daante). Narendra Modi  had also promised for the ‘special status of Bihar’, However Now he saying for only financial help. Nitish and Lalu come from J.P. Movement but both of ideology are different. Both are concentrate on their political benefit. Most hilarious part of their friendship is critising with couplet on one-another. Because, JDU & RJD find their odds of benefit in sit-sharing coalition. Hence, What can we expect by these politician to ensure the safety, law control, poorness & even development. That answer would be future.

Writer:- Ashwani kumar, who ever want to become an ‘Independent remarker’.

Saturday, 25 July 2015

हमारा MLA कैसा हो?

देश का मौजूदा राजनीतिक संकट अपूर्व है। राजनीति आज ऐसे मुकाम पर पहुंच चुकी  है, जिसके पास नेतृत्व की प्रेरणा लेने के लिए महज एक गौरवशाली अतीत है। वर्तमान राजनीतिक पटल पर कोई ऐसी शख्सियत नही दिखाई देती, जिसमे भविष्य की तस्वीर नज़र आये। जिसमे गांधी जैसे संकल्प हो, नेहरू जैसे सपने हो, आंबेडकर जैसी दृष्टि हो, इंदिरा गांधी जैसी निर्णय लेने की क्षमता हो, सरदार पटेल जैसी अडिगता हो व जेपी जैसा हठ हो। लेकिन हाँ, त्रिशूल-तलवार चमकते व लाठी भांजते नेताओं की जमात जरूर नज़र आती है। ऐसे में न तो  गांधी, नेहरू जैसे अपने पीछे लोगों को चलने के लिए प्रेरित कर सकते है, और न ही उंनके हृदय-सम्राट बनने का स्वप्न देख सकते हैं।
                                                                  कमोबेश, आगामी कुछ महीनों में बिहार विधान सभा के चुनाव होने वाले हैं। इस मौके पर दैनिक समाचार पत्र 'हिंदुस्तान' द्वारा 'हमारा MLA कैसा हो' लेखन प्रतियोगिता काफी सराहनीय है। लोकतान्त्रिक व्यवस्था में छात्रों की रूचि हेतु समय-समय पर ऐसा आयोजन जरूरी है। अक्सर चुनावों के बाद आम लोगों को अपनी नेताओं के व्यव्हार व उनके तौर-तरीको से शिकायत हो जाती है। चुनाव पूर्व खुद को 'आम'  कहने वाला व्यक्ति 'ख़ास' बन जाता है। आखिर नेताओं में वो कौन-कौन से गुण होने चाहिए, जिससे हमारा नेता, मतदाताओं के दिलों में जगह बना सके! उनके भरोसे पर खड़ा उतर सके।                                                                                         हमेशा कहा जाता है की, हमारा नेता(MLA) जनता के प्रति उत्तरदायी हो। लोगों के सुख-दुख में हमेश साथ खड़ा रहे। अपने क्षेत्र के जरूरमंदों का ख्याल रखे। अपने  तमाम समस्याओं को मजबूती  उठाये व उसपर क्रियान्वयन करे। ये सब बातें तो चुनाव जितने के बाद जनता की अपेक्षाओं की है, पर उससे पहले विधानसभा क्षेत्र में  उम्मीदवारों को जनता की कुछ सवालों का जवाब  उन्हें संतुष्ट करना होगी की क्या वास्तव में वास्तव में  अपेक्षाओं पर खड़ा उतरेंगे भी या नहीं। जब समय बदल है, समाज बदल रहा है और लोग भी बदल रहें है , ऐसे में तो स्वाभाविक है की नेताओं को उनका स्वाभाव, उनका व्यव्हार बदलना ही होगा। जबावदेह बनने की आदत डालनी ही होगी। जनता को उनसे पूछना चाहिए की वो इस देश की महिलाओं, दलितों और आदिवासियों के बारे में क्या है? भय से मुक्ति, जातिवाद, धर्म और साम्प्रदायिकता, रोटी और काम का अधिकार, सुचना का अधिकार और पारदर्शिता, भ्रष्टाचार, राजनीति  अपराधीकरण, विदेशी कंपनीयों का भारत में दखल एवं वैश्वीकरण आदि के बारे में उम्मीदवारों व नेताओं की अपनी समझ तथा आचरण क्या है? साथ ही उनकी राजनितिक पार्टी की विचारधारा क्या है? जनता राजनीतिक दलोँ व उम्मीदवारों से सवाल पूछे की इस देश, समाज और आम आदमी की भलाई के बारे में वे क्या करेंगे? उनका अपने चुनाव क्षेत्र के लिए क्या कार्यक्रम है?                                                                                                                                                                                                             जनता ये सोचे की जिस उम्मीदवार को वह चुन रही है, क्या वास्तव में वह अगले 5 साल तक जवाबदेह रह पायेगा! जनता को चाहिए की वह उम्मीदवारों के शपथ पत्रों की जांच करे की कहीं आपका उम्मीदवार भ्रष्टाचार या आपराधिक पृष्ठभूमि से तो नहीं जुड़ा है। हमें यह याद रखना होगा की यह मौका 5 साल बाद मिला है। अतः हमारा एक गलत फैसला, 5 साल बाद आये इस सुनहरे अवसर को खो देगा। शायद इसलिए की चुनाव  लोभ, छल, चालों, दावों और अहंकार से नहीं जीते  जाते, बल्कि बेहतर नेतृत्व देने से जीते जाते हैं.. .
 लेखक - अश्वनी कुमार, पटना जो एक स्वतंत्र टिप्पणीकार बनना चाहता है।



                        


पोस्टर-बैनर की बेतरतीब राजनीति

आगामी कुछ महीनों में बिहार विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में तो स्वाभाविक है की, राजनीतिक दल मतदाताओं के ह्रदय-सम्राट बनने की पुरजोर कोशिश करेंगें। संभव है की शहर को पोस्टरों, बैनरों से पाट दिया जाएगा। चौक-चौराहों पर भोंपू लगे वाहन तमाम ध्वनि प्रदुषण की नियमों की धज्जियाँ उड़ाकर, अपने नेता को सर्वश्रेष्ठ घोषित करने में लग जायेंगें। लेकिन कभी कोई समाजवाद के नुमाइन्दे, इसकी जरूरतों के बारे में जनता से क्यूँ नहीं पूछते? चुनाव आयोग के तमाम कोशिशों के बावजूद भी पोस्टर-बैनर पर रोक नहीं लगाई जा सकी है। ऐसा क्यों? दूसरे दलों से बेहतर चुनाव प्रचार की प्रतिस्पर्धा, जनता की सुविधा-असुविधा से मीलों दूर निकल जाती है। राजनीतिक दलों के प्रचार के बेतरतीब तौर-तरीकों से कुछ हासिल नहीं होने वाला। ये सभी जानते हैं.. पर एक करे और दूसरा बैठा रहे, ये भी नहीं हो सकता। आरोप-प्रत्यारोप तो राजनीति का एक पहलु तो है ही, लेकिन इस तरीके के व्यव्हार से निश्चित तौर पर लोकतंत्र की सुंदरता घटेगी।
                                                                     हालात ये हैं की अभी से ही शहर के तमाम स्ट्रीट लाइटों, बिजली के खम्भों पर राजनीतिक दलों के झंडे-पताके लहरने शुरू हो चुके हैं। हद तो ये है की अगमकुआं, कुम्हरार, बहादुरपुर आदि ओवरब्रिजों की दीवारों को एक ही नारे से सारे जगह रंगकर भर दिए गए है। क्या ऐसा करने से वो जनता को आकर्षित कर लेंगे? बिलकुल नहीं। अगर चुनाव पोस्टर-बैनरों और नारों से ही जीते जाते तो मतदाताओं का महत्त्व ही क्या रह जाता? लोकसभा चुनावों में जिस तरीके से पैसे बर्बाद किये गए, क्या वो एक चेतावनी नहीं है? जितने पैसे प्रचार में खर्च किये जाते हैं, क्या सारे दल मिलकर ये नियम नहीं बना सकते की इनसब पैसों का झुग्गी-झोपडी या रेहरीवाले जरूरतमंद गरीबों के उत्थान में खर्च किया जा सके। मात्र उनलोगों के ऐसा करने से ही, जनता के बीच कितना अच्छा सन्देश जाता। साथ ही लोगों का विश्वास और भी दॄढ़ होता, की चाहे जो भी जीते, वो निश्चित उनकी भलाई के लिए तत्त्पर रहेगा।
                                                                                            बकायदा, सारे राजनीतिक दलों को पोस्टर-बैनर राजनीति पर गौर से विचार-विमर्श करके, जरूरी कदम उठाये जाना चाहिए ताकि हमारा लोकतंत्र, सफल लोकतंत्र की दिशा में और भी मजबूती के साथ आगे बढ़ता रहे. . . .

      लेखक - अश्वनी कुमार, पटना , जो एक स्वतंत्र टिप्पणीकार बनना चाहता है. .

 my blog add:- ashwani4u.blogspot.in


Tuesday, 21 July 2015

कितना डिजीटल हो पायेगा हमारा भारत

 हमारे प्रधानमंत्री जी ने पिछले दिनों काफी जोशो-खरोश से डिजीटल इंडिया कैंपेन का शुभारंभ किया। भारत को डिजीटल करके उसे 'इंडिया' बना देने के तमाम छोटे-बड़े सपने देश को दिखा डाले गए। देश की हर आबादी  को इंटरनेट सेे जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। जगह-जगह मुफ्त वाई फाई लगाई जाएगी। बच्चों के लिए आधुनिक बस्ता, ऑनलाइन पढाई, नौजवानों को घर बैठे रोजगार एवं एक क्लिक पर लाकर में रखे सारे डॉक्यूमेंट कौन नहीं देखना चाहता? कौन नहीं चाहता की दफ्तरों में लम्बी लाइन लगने के बजाय उसका काम बस मिनटों में हो जाए। पर कैसे?                                  
                     जब देश में 62 करोड़ लोग ऐसे हैं, जो खुले में शौच जाते हैं। संभव हैं, भविष्य में सरकार डिजिटल इंडिया की तर्ज पर 'डिजिटल टॉयलेट' भी लाये ताकि लोग डिजिटल हो सकें। दुनिया के कुल भूखे और निर्धन लोगों का 35% भूखे हमारे यहाँ रहते हैं। क्या इनके लिए भी सरकार 'डिजिटल रोटी' की व्यवस्था करेगी? दुनिया में भूखे रहने वालों की तादाद में हमारा देश सबसे ऊपर है। दुनिया के सवार्धिक कुपोषित बच्चे हमारे यहाँ है। 70% आबादी अभी भी शहर  की चकाचौंध से दूर गाँवों में रहती है। पर वे इन सब के बारे में क्यों सोचे? हालात ये हैं की डिजिटल इंडिया का नारा देने वाली सरकार के पैतरें प्रतिदिन बदलते जा रहे हैं। 60 साल बनाम 5 साल का नारा, 60 साल बनाम 25 साल में बदलता जा रहा है। सरकार ने डिजिटल इंडिया का सपना तो बड़ी आसानी से दिखा दिया। पर कैसे? जिन BPL परिवारों की महीने में हज़ार रुपये भी कमाने की औकात नहीं, वो 150 रू० का नेट रिचार्ज कहाँ से कराये? अगर मान लिया की सरकार ने इन्हें फ्री वाई-फाई मुहैया करा भी दिया तो, इन लगभग 45 करोड़ गरीबों के पास 8-10 हजार का WI-FI युक्त फ़ोन कहाँ से आएगा? जिससे ये भारतीय, इंडियन बन सकें। जबकि सच ये है की मानव विकास सूचकांक में पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश जैसे देश  भी हमसे ऊपर है, जिन्हे हम 'जाहिल' समझते हैं। 21 वीं सदी का नारा राजीव गांधी नें दिया था, और भारत 21 वीं सदी में भी पहुँच गया। पर दो-तिहाई पढ़े-लिखे बेरोजगारों के साथ, जो डिजीटल भी हैं। यानी, पढ़े-लिखे और डिजिटल बेरोज़गारों की एक बड़ी फ़ौज।                                                                 
        सरकार सभी काम पेपर-लेस कराना चाहती है, जनता को सहूलियत देना चाहती है, यह बिलकुल सही कदम है। पर, सबकुछ भविष्य की सुरक्षा को दांव पर लगाकर। जिनकी भी इंटरनेट सर्वरें हैं, वो भारत के बाहर पश्चमी देशों में स्थापित है। मतलब, उनकी भारत के प्रति कोई कानूनी जवाबदेही नहीं बनती। ये सही है, की हम डिजिटल तो हो जाएंगे पर हमारी डोर पश्चमी देशों के हाथों में रहेगी। यानी हम उनकी कठपुतली बनकर रह जाएंगे। आज सरकार को सिर्फ मुनाफा चाहिए। उनके लिए कृषि का विकास, गरीबी उन्मूलन, अशिक्षा व भुखमरी जैसे मुद्दे कोई अहमियत नहीं रखते। इससे मुनाफा तो नहीं कमाया जा सकता पर हाँ, इससे पेट-पूजा का बेशक इंतजाम हो जाएगा। डिजीटल इंडिया दूसरा नाम कॉर्पोरेट इंडिया है। जिससे ये 20 करोड़ भारतीय इंटरनेट उपभोक्ताओं से मुनाफा वसूली करेगी। ये कितने लोगों को रोज़गार देगी? फेसबुक,ट्विटर, यूटुब भारत में कितने लोगों को रोज़गार मुहैया कराती है? नगण्य मात्र में। मुनाफा तो FDI से भी होती, इससे कहीं ज्यादा रोजगार मिलती, पर ऐसा क्यों नहीं? क्योकि कहते हैं, देश गुलाम हो जायेगा। फ्लिपकार्ट, स्नैपडील जैसी विदेशी कंपनियां जो 20 करोड़ यूजर से व्यापार करके सरकार का 50 हज़ार करोड़ का टैक्स चोरी कर रही है। ये तो बस शुरुआत है, बना डालिये भारत को डिजिटल ! संभव है की सरकार इन खामियों का कोइ डिजीटल सलूशन भी निकाल ले।  फ्री वाई-फाई का वादा भी जुमला ही दिखने लगा है। इसका न तो हम इस्तेमाल सोशल साइट्स के लिए कर सकेंगे और न ही अन्य जरूरी चीजों के लिए। हमें तो बस इसकी अनुमति सरकार द्वारा किये गए अच्छे दिन लाने के प्रयासों को देखने के लिए मिलेगी, तथा उन्हें सुझाव देने के लिए। लगता तो ऐसा ही है। अभी तो नेट का दाम 75 से 175 ही हुआ है, देखते हैं आगे क्या-क्या होता है।                                                         
   जिस तरीके शायनिंग इंडिया का नारा, नारा ही बनकर गया। स्वच्छ भारत अभियान से भारत स्वच्छ हो गया, नमामि गंगे से गंगा शुध्द हो गयी, उसी तरह शायद हमारा भारत सरकार की अति-आत्मविश्वास से डिजीटल होकर एकदिन 'इंडिया' बन जाएगा और हम देखते रह जायेंगें।लेखक - अश्वनी कुमार, पटना जो एक स्वतंत्र टिप्पणीकार बनना चाहता है। contact no, - 8873015656

Wednesday, 15 July 2015

इफ्तार के बहाने ये कैसी राजनीती ?

बिहार की राजनीती इन दिनों ईद के मौके पर सेकुलरिज्म का मिसाल पेश कर रही है। तमाम नेता इफ्तार की पार्टी के बहाने अपना उल्लु सीधा करने में लगे हैं। चुनाव नजदीक है, ऐसे में तो पक्ष और विपक्ष दोनों के ही सहयोगी दलों में सीटों को लेकर चिंता करना वाजिब है। एक तरफ नीतीश कुमार, लालू की जगह कांग्रेस अध्यक्ष सोनिआ गांधी के इफ्तार पार्टी में शामिल हुए। वहीँ दूसरी तरफ रामविलास के इफ्तार पार्टी में बीजेपी, मांझी सहित तमाम NDA  सहयोगी दल शामिल हुए। पर इफ्तार के बहाने ये नेतागण राजनीती करने से चूक जाएँ, ऐसा हो ही नहीं सकता। हर किसी को सीटों की चिंता है। ऐसे में कुल मिलाकर हालात ये हैं  कोई भी सहयोगी दलों  कटाक्ष की राजनीती करके दवाब बनाने से नहीं चूक रहा। आरोप-प्रत्यारोप का दौर आज  वर्तमान राजनीती का एक पहलु बन चूका है। पर ये सिलसिला चुनावों के वक्त तो बेतरतीब ढंग से चरम पर पहुँच जाता है। क्या ये सफल लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है? 

                                                                                    पिछले दिनों बिहार बिधान परिषद के चुनाव हुए, बीजेपी ने अन्य के मुकाबले अधिक सीटों पर जीत हासिल की। लेकिन ये चुनाव, विधानसभा चुनाव में  जनता का मन टटोलने के लिए काफी नहीं है। इस चुनाव में वोट जनता ने नहीं बल्कि, उनके द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों ने दिया था। सब जानते हैं की अपवाद को छोड़कर लगभग सभी प्रतिनिधियों से 5 वर्ष पुरे होते-होते जनता का मोहभंग हो जाता है। इन परिणामों के आधार पर, ऐसे में न तो बीजेपी अपनी जीत सुनिश्चित मन सकती है, और न ही महागठबंधन अपनी जीत के प्रति आश्वस्त हो सकती है। और होना भी नहीं चाहिए। इस चुनाव परिणाम की सबसे अहम बात रही की 64 प्रतिनिधियों ने नोटा का इस्तेमाल किया। ऐसा क्यों? खुद को पिछड़ों का हितैषी बनाने वाले दलों के पास इन बाहुबलियों, गन्दी छवि वाले उम्मीदवारों के अतिरिक्त कोई और चेहरा था ही नहीं? या उन्हें 'डर की राजनीती' को बढ़ावा देना फायदेमंद दिखता है। तमाम सवाल उठेंगे, जब जनता पर, जनता की पसंद की जगह पार्टीयों की पसंद के उम्मीदवार थोपे जायेंगे। 

                                                                                 हैरानी तब होती है, जब नीतीश और लालू जैसे नेता, जिनका जन्म ही कांग्रेस विरोध के बिसात पर हुआ था, वो आज कहाँ जा रहे है? कांग्रेस के बाँहों में हाथ डालकर चलते दिख रहे हैं। क्या अब कांग्रेस की विचारधारा इन दोनों नेताओं को अच्छी लगने लगी? या सत्ता का मोह इन्हें ऐसा करने पर मजबूर कर रही है। 

जो भी हो, इफ्तार के बहाने ही सही, लेकिन सारे फैसले जनता के हित में लिए जाएँ तो बेहतर होगा। ऐसा क्यूँ होता है की चुनाव के वक्त गरीबी, भुखमरी को मुद्दा बनाकर वोट बैंक की तलाश की जाती है? जबकि पानी के मोटे पाइपों, सुरंगों और फुटपाथों पर गुजर बसर करते लोग तो विकास के आंकड़ों के जीवंत कार्टून हैं। आखिर कार्टून बना किसने रखा है..... हम सब जानते हैं ......

लेखक- अश्वनी कुमार,  पटना गुलज़ारबाग़ ,जो एक स्वतंत्र टिप्पणीकार बनाना चाहता है.… 




Friday, 10 July 2015

एक बार फिर... नीतीश कुमार या मोदी सरकार

नमस्कार! हमारे बिहार में 5 सालों के बाद एक बार फिर चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में तो स्वाभाविक है  की, नेताओं को जनता की याद तो आएगी ही। प्रचार के लिए नेतागण जनता के दरवाजे भी खटखटाएंगे। हाथ जोड़कर राम-राम करेंगे, गली मोहल्लों में रैलीयां निकालेंगें, नुक्कड़ सभाएं करेंगे, बड़ी-बड़ी घोषणायें करेंगे, झूठे वायदे करेंगे। मुंगेरी लाल की तरह हसीन व भी दिखाएंगे, एवं सबसे महत्वपूर्ण की पैसे दारू का लालच देकर वोट खरीदने की कोशिश भी करेंगे। पर इन सब में नया क्या? 5 साल पहले भी तो यही सब कुछ हुआ था। दरअसल उन्हें जनता की नहीं जनता के वोट की कीमत याद आती है, तभी तो जन-जन के दरवाजे तक खीचें चले आते हैं।                                                                                                                 बिहार की वर्तमान राजनितिक परिस्थिति कुछ इसी तरह है। नीतीश कुमार अपने क्षेत्रीय विधायकों, भावी नेताओं के साथ 'हर घर दस्तक' देने को निकल चुके हैं। लोगों से सरकार के कामकाज से सम्बंधित सवाल पूछे जा रहे हैं। पर ये सब चुनाव के ही वक्त क्यों? पहले क्यों नहीं? जनसंवाद जैसे लोकतान्त्रिक तरीकों का चुनाव प्रचार के लिए इस्तेमान करना, क्या सही है? नीतीश ने कितने विधायकों-सांसदों से इन 5 सालों  क्षेत्र में किये कामों का ब्यौरा देखा? उन्होंने कितने लोगों के घर जाकर उनकी परेशानी पूछी? बस, चुनाव आ गए और चल दिए जनता के पैर छुने। पर सच तो ये है की आम दिनों में मुख्यमंत्री के 100-200 मीटर की दुरी तक किसी को प्रवेश भी नहीं करना दिया जाता। जिसका भुक्तभोगी कई बार उनके काफिले के कारण मैं भी रहा हूँ। लेकिन चुनाव के वक्त उनकी सुरक्षा व्यवस्था कहाँ चली जाती है?  हाँ,  ये सही है की नीतीश ने पिछले 10 सालों में बिहार के विकास के लिए काफी काम किये। सड़कों की हालत दरुस्त की। लचर कानून-व्यवस्था में काफी सुधार किये गये। अफसरों की जवाबदेही तय की गयी। तमाम सुशासन सम्बंधित कार्य किया गया। लेकिन क्या सूबे की तस्वीर बदलने वाले व्यक्ति को, सिर्फ राजनितिक लाभ के चलते 'आतंकराज के मसीहा' के गोद में बैठ जाना सही फैसला है? उन्होंने राजनीतिक द्वेष-भाव से प्रेरित होकर एक ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाया, जो कहीं न कहीं अरस्तु और प्लूटो के उस कथन को बुलंद करता है की लोकतंत्र मूर्खों का शासन है। जिसका खामियाजा भी उन्हें भुगतना पड़ा और संभव है की जातिगत समीकरण के कारण चुनाव  में भी भुगतना पड़ेगा।
                                                                            लेकिन विपक्ष में बैठी बीजेपी क्या कर रही है? वही हंगामें, प्रदर्शन, नारे, रैलियां और पोस्टरबाजी। गद्दी पाने की चाहत में भले ही सदन ठप रहे, विकास रुक जाये,  पर जनता के कामों से उन्हें कैसा सरोकार। नेता का पहला और अंतिम काम क्या होता है? सत्ता पर कब्ज़ा करना। बिहार में मुख्य विपक्षी दल बीजेपी को सरकार द्वारा शुरू की गयी अच्छी योजनाओं पर सवाल उठाने, आलोचना करने से पहले लोगों के वास्तविक मुद्दे उठाने चाहिए थे, प्रदर्शन करने चाहिए थे। पर ये सब वो क्यों करें? उन्हें तो बस एक ऐसे व्यक्ति के नाम पर चुनाव लड़ना और लड़कर जीत जाना है, जो रंग-बिरंगी बण्डियां और सूट-बूट पहनकर भाषणो की झड़ी लगा देते है। पर उसका को ठोस नतीजा देने में अबतक उनकी सरकार विफल साबित हुई है।  नेताओं के VIP व्यव्हार, व्यापम घोटाला, सांसदों के वेतन वृद्धि, ललित-सुषमा-वसुंधरा पर मौन, उनके न खाऊंगा और न खाने दूंगा के दावों पर बहुत सारे प्रश्न-चिन्ह खड़ा करते हैं। उन सब में बिहार में भारतीय जनता पार्टी का आंतरिक कलह और जनता का मोदी से मोहभंग, निश्चित रूप से नीतीश को फायदा पहुंचाएगा। बिलकुल स्पष्ट है की जनता उसे अपना वोट क्यों दे, जिसका कोई घोषित नेता ही न हो? चुनाव पूर्व उम्मीदवार घोषित रहने से  मतदाताओं को निर्णय लेने में आसानी रहती है। कही उसका नेता किसी भ्रष्ट्राचार या आपराधिक पृष्टभूमि से तो नहीं जुड़ा है? उसकी छवि कैसी है? क्या वास्तव में वो मतदाताओं की अपेक्षाओं  को पूरा करेगा भी या नहीं?
                                                                                        जो भी हो पर, बिहार की जंग इतनी आसान भी नहीं। चाहे कितनी ही बार दस्तक दें, कितना भी ढोल पीटें या कितनी भी रैलियां करें। जनता उसे ही अपना नेता चुनेगी, जो  उनकी सभी अपेक्षाओं पर खड़ा उतरता हो। शायद इसलिए की चुनाव लोग, छल, चालों, दावों और अहंकार से नहीं जीते जाते, बल्कि बेहतर नेतृत्व देने से जीते जाते हैं।
                       
                    लेखक   अश्वनी कुमार, पटना, गुलज़ारबाग़ जो एक स्वतंत्र टिप्पणीकार बनना चाहता है। शायद इसलिए की  कोई उसकी बात सुनना ही नहीं चाहता। क्योंकि उसकी हैसियत अभी इतनी नहीं की खुलेआम वह अपने विचारों को प्रकट कर सके। प्रकट करेगा भी तो बच्चा समझ कर अनसुना कर दिया जायेगा।

Wednesday, 8 July 2015

असहिष्णुता का घोतक बनता हिन्दू

हमारे देश के वर्त्तमान राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक कार्यकलापों में काफी उठा-पटक दौर चल रहा है। राजनीती के शिखर पर एक ऐसे दल का शासन है, जिसका हर  फैसला सांप्रदायिक एवं भगवाकरण से जोड़कर देखा जाता है। तो दूसरी तरफ समाज आधुनिकता के भेंडचाल चलता जा रहा रहा है, जो अवश्य ही एक दिन  बड़े संकट का शिकार होगा। कमोबेश, अब हमारे देश के धार्मिक माहौल पहले जैसे नहीं रहे, फिर भी तो हम निश्चिंत नहीं बैठ सकते! कुछ दिनों पहले बिहार के जहानाबाद में जमीन  विवाद से उपजे सांप्रदायिक तनाव पुरे शहर में जबरदस्त हिंसा भड़कने का कारण  बना। शहर में कर्फू लग गए और तमाम धार्मिक संगठन अपनी रोटियाँ सेंकने लगा। इलाहबाद शहर पुलिस की दंगा का मॉक ड्रील हुआ, उसमें उपद्रवियों को भगवा झंडे लेकर तोड़फोड़ करते दिखाया गया।  इसका क्या मतलब? यानि दंगों में हिन्दू ही अन्य के मुकाबले अधिक असहिष्णु होते हैं, ऐसा सन्देश समाज को हिन्दुओं  के खिलाफ भड़काने के लिए काफी नहीं है? सब जानते हैं की सपा सरकार का ज्यादा झुकाव किस धर्म के प्रति है। लेकिन, उस वक्त सारे  सेकुलरवादिओं ने रोना-धोना क्यों मचाया,जब ऐसे ही मॉक  ड्रील  में आतंकवादियों को इस्लामी टोपी में दिखाया था?  अब जब हिन्दुओं से जुड़े मामले सामने आये तो वे सभी मौन क्यों पड़े हैं?  क्यों नहीं CBI जाँच की मांग दुहराते? क्यों नहीं  SIT बनाने की बात करते?                               
   मतलब, सब वोट के गणित का खेल है। वे हमेशा मुसलमानो को डरते फिरते हैं  की ये BJP है, ये कभी तुम्हारा भला नहीं सोचेगी। ये  RSS है, ये तुम्हे यहाँ नहीं रहने देंगे। कभी कोई ये क्यों नहीं कहता की संघ की अवधारणा को नजदीक से जानो। बीजेपी के मुद्दों को निष्पक्षता से देखो।  राम  मंदिर की बात सामने आते ही ये सभी बाबरी की कथा सामने लाते हैं। पर इस्लाम तो कभी दूसरे के बजा स्थलों पर मस्जिद की बात नहीं स्वीकारता।  अनुच्छेद 370, हमेशा से कश्मीर में हिन्दुओं के  बसने पर पाबन्दी लगता है। क्या ये उनलोगों का स्वार्थ नहीं, जो खाते भारत का हैं, पर गाते पाक का  हैं। यूनिफार्म सिविल कोड की वकालत किसके लिए की जाती है? मुस्लिम महिलाओं को समान  अधिकार दिलाने के लिए, जो हमेशा पुरुषों द्वारा दबी-कुचली जाती रही है। लेकिन नहीं?  वे उन्हें अपने हाल पर छोड़ देने की बात करते हैं। पर कैसे? पश्चिम एशिया में इस्लाम के नाम पर नरसंहार किये जा रहे हों,  उनके डर से वहाँ  की सेना और पुलिस भाग खड़ी होती है। वहीं कि सरकार हक्की-बक्की रह जाती है और ये सब तब हो रहा जब सारी  अमेरिकी ताकतें  पीछे खड़ी  है। क्या ये सब भारत के लिए एक चेतावनी नहीं है? अगर आने वाले संकट से पूर्व तैयारियां कर ली कर ली जाये तो, जो संकट आने वाला  है वो भी टर  जायेगा। ऐसे में हम क्यों न अपने मुसलमानों को बेहतर बनाएं? उनकी अज्ञानता दूर करें। उन्हें नफरत, जिहाद, की प्रवृर्ति से बचायें!
                                                                          कुछ वक्त पूर्व यूपी  के ही मुरादाबाद में शिवमंदिर से लाउडस्पीकर उतार लिए गए, तमिलनाडु के महालक्ष्मी मंदिर के घंटे को उत्तर दिया गया। सिर्फ इसलिए की उससे मुस्लिमों को परेशानी होती थी, क्योंकि वो मुस्लिम बहुल इलाके थे। लेकिन ऐसा किसी हिन्दू बहुल क्षेत्रों में ऐसा नहीं किया जाता। क्यों?  ये जानते हुए भी की पाकिस्तान में हमारे भाइयों पर कैसे-कैसे अत्याचार किये जाते हैं। ऐसा शायद इसलिए की हमारा धर्म सिर्फ शांति और अहिंसा का सन्देश देता है। लेकिन अहिंसा परमो धर्मः , धर्मों  हिंसा तदैव चः॥ अहिंसा परम धर्म है पर धर्म के हिंसा उससे भी श्रेष्ठ है।
                                                                     आज अमेरिका हमें धार्मिक असहिष्णुता का पाठ पढ़ा रहा है। उसकी विभिन्न धर्मों पर नजर रखने वाली एजेंसी कहती है, की भारत में धार्मिक असहिष्णुता बढ़ी है। ये तो उल्टा चोर कोतवाल को डांटने वाली बात है। जितने धर्म भारत में पैदा हुए और पनपे, क्या दुनिया के किसी देश में हुए? भारत में विभिन्न धर्मों के जितने लोग सर्वोच्य पदों तकक पहुंचे, क्या दुनिया के किसी और देश में पहुंचे?  हम सब जानते हैं की अमेरिका ने न जाने कितने देशों की आर्थिक, राजनीतिक  और धार्मिक आज़ादियाँ नष्ट कर दी है। हमारे यहाँ किसी को सूली पर नहीं लटकाया जाता। यहाँ किसी को पत्थर मार कर दुनिया से नहीं उठाया जाता। सद्दाम हुसैन और गद्दाफी के खून से किसके हाथ सने हैं?
                                                                         जो भी हो पर,हिन्दू कभी दूसरे धर्म के प्रति असहिष्णु नहीं हो सकते। क्योंकि अगर हिन्दू असहिष्णु होते तो, मुसलमानों को सड़कों पर नमाज कैसे पढ़ने दिया जाता। दिन में 5 बार ये कैसे कहने दिया जाता की अल्लाह के सिवा कोई दूसरा भगवान नहीं.......
      लेखक:- अश्वनी कुमार जो एक स्वतंत्र टिप्पणीकार बनना चाहता है........... आते रहिएगा.....                                                                         


राम मंदिर पर सेक्युलर बनती भाजपा


 भारतीय जनता पार्टी पर चढ़ती सेकुलरिज्म का बुखार सबके लिए हैरानी भरा है। वो भारतीय जनता पार्टी जिसे 1998 तक हिन्दू राष्ट्रवादी पार्टी कहा जाता था, वो पार्टी जिसे 2 सीटों से 272 सीटों तक पहुचाने में उसके हिंदूवादी चेहरे का बड़ा योगदान रहा है। अगर वैसी पार्टी अपनी विचारधारा ही बदल डाले तो हैरानी होना स्वाभाविक है। भाजपा के युगपुरुष अटल बिहारी वाजपेयी तथा अब हाशिये पर डाल दिए गए 'लाल कृष्ण आडवाणी  का भी एक समय था, जो कभी खुद को रामभक्त बताकर किसी भी कीमत पर राम मंदिर बनवाने की बात  करते थे, उनके ही पार्टी की सरकार मंत्री राजनाथ सिंह इसे अदालती मामला बताते फिर रहे हैं। ये सच है की 1992 में आडवाणी  की सोमनाथ से अयोध्या तक की रथ यात्रा ने राम भक्तों के बीच अपनी अच्छी पैठ बना ली थी, जिसका फायदा उन्हें चुनावों में भी मिला। वर्ष 1998 में बनी वाजपेयी सरकार ने अपनी हिन्दुत्वादी छवि होने के वाबजूद भी उन्होंने विकास के एजेंडे पर काम किया, लेकिन राम-मंदिर मुद्दे का परित्याग नहीं किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जिन्हे 2002 गुजरात दंगे का मास्टरमाइंड बताया गया, एक हद से ज्यादा उन्हें कट्टर हिंदूवादी चेहरे के रूप में देश के सामने लाया गया,  जिसके परिणामस्वरूप 16वीं लोकसभा चुनावों में वोटों का ध्रुवीकरण उनकी छवि के आधार पर हुआ। नतीजन, पार्टी पूर्ण बहुमत से सत्ता पर काबिज हो गयी वजानते हैं  अपने कट्टरवादी चेहरे को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठा दिया।                                                                                                                                                        संघ  विभिन्न हिंदूवादी संगठनों में प्रमुख रूप से विश्व हिन्दू परिषद राम मंदिर पर मोदी से आशान्वित थी। लेकिन सरकार का हिंदूवादी एजेंडे से डरकर भागना कायर सिद्ध नहीं करता? जिस पार्टी का जन्म से लेकर अब तक का इतिहास राम जन्मभूमि, धारा 370, यूनिफार्म सिविल कोड के इर्द-गिर्द घूमता है वो पार्टी  अब सत्ता में होने के बावजूद भी सदन में चर्चा कराने से भी घबरा रहा है। अगर सबकुछ अदालतों पर ही छोड़ दिया जाना था तो बाबरी बिध्वन्स की क्या जरूरत थी? रथ-यात्रा करने व उसके कारण जेल जाने की नौटंकी क्या किसी स्वार्थ की ओर इशारा नहीं करती?                                                                                                                            सब जानते हैं की भारतीय अदालतों की गति का दुनिया में कोई जोड़ नहीं, अदालत भी जानती है की राम लला रामजन्मभूमि है। और कितने प्रमाण चाहिए इन मौलाना सेक्युरलिस्ट नेताओं को। खुदाई में मिली 'ओम नमः शिवाय' लिखी ईंटें  तब की है जब शायद बाबर की औलादों के परदादाओं के भी परदादा का जन्म नहीं हुआ होगा। लेकिन कोर्ट को इनसे कोई सरोकार नहीं, क्योंकि कानून अँधा है। पर इनकी आँखे तब होती है जब बात सेकुलरिज्म से सम्बंधित हो। दूसरी तरफ बीजेपी की नज़र अगले साल होने वाले यूपी चुनावों पर है, जहाँ सम्भव है की एक बार फिर राम नाम का शगूफा छोड़ा जा सकता है। लेकिन  अब इतना आसान  भी नहीं, राम नाम का राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करने वालों के लिए कोई गुंजाईश नहीं बची है। जरूरत है सच्चाई का  साथ देने की, सच पर सदन में बहस कराने की।                                                                                                                                            बड़ा दुख होता है की हम हिन्दू अपने भगवान के प्रत्यक्ष जन्म स्थल के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन जेरुसलम में ऐसा क्यों नहीं होता? काबा में ऐसा क्यों नहीं होता? अक्सर हम हिन्दू ही क्यों दबे कुचले जाते हैं? सोचिएगा ........                  writer:-    ashwani kumar,  who always want to become a independent remark...  and this column is written by my heart touching opinion about plight of hindu dharma...