Wednesday, 30 September 2015

Political legacy shaping danger

Good morning.. Hello everyone. Politics means 'Raaj-niti', how to make people for their support, which will ensure their all expectations and also exploit people for the name of democracy. India have suffered 58 year of independence and 55 years of its own constitution. But, we have seen many politicians to enhance nepotism for echoing their fame in politics during these days. For example, Biju patnayak bring up his son Naveen patnayak, son-in-law of NTR is Chandrababu Naydu has become chief minister of Simandhra, one of the most lusty example of political legacy excepts Congress who ever collect his relatives and so called 'forecast climate engineer' i.e. 'Ramvilas Paswan'. Paswan always stressing for free relative politics but unfortunately he is initiative and responsible for it in the compression of other leaders. Lalu Prasad Yadav is also being frightened his both of son from their assuming safe seet in Bihar Election besides his wife 'Rabri' has has existed 15 year period of Chief Minister.

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If we look into Congress, The list of heritage make irksom. Pd. Nehru, Indira Ghandhi, 
Rajiv, Sanjay, Sonia Gandhi, Menka Gandhi, Rahul Gandhi, Varun Gandhi and may add a name of Priyanka in list. If we look throughout top to bottom in that burning issue we found deep anger in the party workers. Anyone can't imagine to ensure party chief chair. No one is washed with milk. Politicians of every party want ticket of election for their son besides himself. Chief Minister of U.P. Akhilesh Yadav hasn't experience about administration or politics but, Netaji given throne of state to his heart piece. What is happening in U.P. till now? The no. of crime against women, rape, extoration and unruly activity by sp's has reached to zenith. The main reason of heritage-Nepotism politics happening in this country only because lack of proper accountability to the people from politicians. These politicians are making ridiculous and assertively enhance their legacy to regime on people. If they are trying to use people's mandate so, they should forthwith forsake these lust. Because people will wakeup for their right or, against Nepotism which day politicians will uproot from sacred land of Indian democracy who ever habituate its own interest.
 

writer:- ashwani kumar, who ever want to become an independent remarker...


Friday, 25 September 2015

घोषणाओं में उलझती बेरोजगारों की आवाज़

जैसे ही सत्ता बदलती है, बेरोज़गारों की उम्मीदें उस वक्त आसमान छू रही होती है। देश का बेरोज़गार युवा वर्ग अखबारों में GDP के आंकड़े देखकर खुश हो जाता है की चलो अब देश तो तरक्की कर रहा है और वो इसी तरक्की वाले आकड़ों के दम पर नौकरी पाने के सपने पाल बैठता है। अक्सर नेताओं के भाषणों में बेरोज़गारी को दूर करने की महत्वाकांक्षा लाखों युवाओं में जोश भर देती है। ऐसा दिखाया जाता है की वे ही उनके पालनहार है, वे सभी को चुटकियों में नौकरी दे देंगे। बस कमी यही है की लोग सत्ता में बैठे निकम्मों की जगह उन्हें दे दें। देश का मतदाता जिसे चाहे उसे वोट दे, लेकिन वोट डालने के बाद अंधभक्त होने के बजाय उनके प्रति सख्त रवैया दिखाए। कभी कोई सरकारें जनता को ये क्यों नहीं बताती की उसने अपने कार्यकाल में कितनी रिक्तियाँ निकली, कितनों को नौकरियां दी और उन नौकरी पाने वालों में नेताओं के कितने भाई-भतीजे थे? अगर ऐसा होता तो रोज़गार के नाम पर बेरोज़गार युवाओं को इतनी आसानी से नहीं ठगा जाता, जितनी आसानी से अबतक ठग लिया गया है। लोग आसानी से तुलना कर पाते की मनमोहन सरकार ने कितनी नौकरियाँ दी, मोदी ने कितनी दी और विकास पुरुष नीतीश कुमार ने कितनी नौकरियां विकसित की। 

Image result for indian unemployers imageसरकार कहती है नौकरियां देने से हमारी विकास की रफ़्तार कम हो जायेगी, इसलिए एक साल तक वैकेंसी बंद कर दी। सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई केश लेने से इंकार करती है की उनके पास चपरासी से लेकर अफसर तक की कमी है। पुलिस स्टेशन से लेकर सरकारी विभाग, अस्पतालों तक में कर्मचारियों की कमी का रोना रोया जाता है।  निगम लोगों से टैक्स नहीं वसूल पाती क्योंकि उसके पास आदमियों की कमी है। न्याय नहीं मिल रहा क्योकि जजों की कमी है। लोगों के काम जहाँ के तहाँ अटके पड़े हैं। किसके कारण?  सरकार बेरोज़गारी पैदा करने की मशीन बन चुकी है।  अखबारों में भारत के परमाणु बम-मिसाइलों की गाथा सुनकर चीन-पाकिस्तान पर हमले कर देने की सलाह देता युवावर्ग के पास हीरो-हीरोइन, सिनेमा और इंटरनेट के आलावा सवाल पूछने का वक्त ही कहाँ है? रैलियों में खम्भों पर चढ़कर मोदी-मोदी के नारे लगाने वाले उनके सामने एकजुटता से ये सवाल क्यों नहीं करते? देश का एक बड़ा वर्ग बेरोज़गारों की फ़ौज़ बनकर नौकरी पाने के सपने देख रही है, लेकिन कब तक? कई लोग कहते है की नौकरी का असली फायदा आरक्षण वाले उठाते हैं। बेशक, लेकिन आरक्षण का लाभ भी तो तभी मिलेगा जब नौकरियां मिलेगी रिक्तियां निकलेगी।  क्या ये बेरोज़गार सरकार पर दबाव नहीं दाल सकता? कर्मचारियों की कमी से जहाँ समूचा देश प्रभावित हो रहा है, वहां ये युवा संगठित होकर सरकार की चूजें हिला सकता है। मान लीजिये अगर सारे बेरोज़गार संगठित हो गए, तब क्या होगा?  सारी पार्टियाँ उनका समर्थन पाने के लिए उनकी पूजा करने लगेगी और ये सब बस चुनावों तक ही।  लेकिन ये सभी अपना हक़ पाने के लिए उग्र हो गए तो हमारी जेहन में मिस्त्र के काहिरा चौक की तस्वीरें ताज़ा हो जायेगी इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता। 

सबसे अहम सवाल है की ये बेरोज़गार हैं कौन? ये कोई डुप्लेक्स बंगले में रहने वाले अरबपति के बेटे नहीं हैं। इनका बाप न ही किसी फैक्ट्री का मालिक है और न ही ये किसी सांसद या विधायक के सगे संबंधी होते हैं।  ये सरकार द्वारा आंकड़ों में उलझाया व टोयोटो से चलने की सपने देखता युवा होता है। 5X8 के कमरे में रहने वाला, मकान मालिक द्वारा सताया और कई बार भूखे सो जाने वाला छात्र होता है, जिसे हम भारत का भविष्य कहते हैं। 

कभी नीतीश कुमार या नरेंद्र मोदी मिलें तो उनसे पूछियेगा की विकास का मतलब क्या होता है? (ये मैं बिहार चुनाव के नज़रिये से कह रहा हूँ।)  अक्सर ये अपने भाषणों में सड़कें बनवा देना, बिजली मुहैया करा देना व दो-तीन कल कारखाने लगा देने को ही विकास कहते हैं।  लेकिन ये सब तो बुनियादी सुविधाएं हैं। उनसे पूछिये की बिहार की प्रति व्यक्ति आय की राष्ट्रीय आय की तुलना में कितना विकास हुआ? रहन-सहन का स्तर कितना ऊपर उठा? क्या राज्य से पलायन रुक गया?  शिक्षा-स्वास्थ के मामले में स्कूल और अस्पताल बनवा देने को विकास नहीं कहा जा सकता? मतलब, स्कूलों में प्रति बच्चे पर कितने शिक्षक हैं, जनजाति को कुपोषण से दूर रखने के लिए क्या कदम उठाये गए? ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों को विटामिन-न्यूट्रिटियन्स युक्त भोजन उपलब्ध है भी या नहीं
विकास के दावे किये जाते हैं लेकिन खोखले हैं। विकास से बेरोज़गारी को जोड़कर देखने की कोशिश भी मत कीजियेगा नहीं तो आपको इतनी उपलब्धियाँ बतायी जाएंगी की आप GDP और रुपये की भांति ऊपर निचे होते रह जायेंगें .......


लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर "कहने का मन करता है" (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं.... 


Wednesday, 16 September 2015

हिंदी कभी राजभाषा न थी और न है…

प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर के नजदीक आते ही सरकार से लेकर आम बुद्धिजीवी वर्ग तक हिंदी के भविष्य के लिए आशंकित हो जाते हैं। टेलीविजन चैनलों से लेकर तमाम सरकारी विभागों में हिंदी के प्रति अपनी दिखावटी सम्मान जताने के लिए कोई न कोई ख़ास कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। लेकिन राजभाषा का मतलब क्या है, ये 1949 से आजतक आम जनता न ही समझ पायी है और न ही उसे कोई समझा पाया है। दुनिया में तीसरी सार्वधिक बोले जाने वाली भाषा हिंदी है। संविधान में हर किसी को अपनी भाषा, अपना पसंद चुनने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। फिर भी क्या सरकार जनता के मौलिक अधिकारों को उस तरीके से लागू करा पायी है, जिससे किसी को कोई परेशानी न हो? हिंदी को आगे बढ़ाने की योजनाएँ तो बना ली जाती है, पर उसे लागू कराने का जिम्मा अंग्रेजियत विचारधारा से प्रभावित नौकरशाहों पर छोड़ दी जाती है। ऐसा बिलकुल भी नहीं है की अफसरों की जुबानी भाषा अंग्रेजी होती है या हिंदी उन्हें बिलकुल अच्छी नहीं लगती, बल्कि उन्हें नौकरी हासिल करने के लिए अंग्रेजियत का गुलाम बनना पड़ता है। न चाहते हुए भी अंग्रेजी को जबरदस्ती रटना होता है। 

इस बार स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले से प्रधानमंत्री ने छोटे नौकरियों में इंटरव्यू को ख़त्म करने की सलाह दी। लेकिन इससे ज्यादा बेहतर होता की इसके साथ-साथ वे बड़े नौकरियों में हिन्दीभाषी छात्रों को हिंदी में ही इंटरव्यू और प्रश्नपत्र को अनिवार्य कर देते। देश के प्रतिष्ठित सिविल सेवाओं में जिस तरह से क्षेत्रीय भाषाई छात्रों का ग्राफ गिर रहा है, उससे तो आनेवाले दिनों में IAS, IPS बनने का मतलब ही पहले डॉ, इंजीनियर बनने का होगा। हम सभी जानते हैं की डॉ या इंजीनियर कितने बच्चे बन पाते हैं जो सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं?  क्या सारे सरकारी दस्तावेजों का अनुवाद हिंदी में कर लिया गया? आखिर अदालतों से अंग्रेजी कब विदा होगी ? सर्वोच्च न्यायालय तो संविधान का सबसे बड़ा संरक्षक है, तो वो क्यूँ नहीं अदालतों में आम लोगों की समझ के लिए क्षेत्रीय अनुवादक की व्यवस्था करती हैं, ताकि लोगों को हो रही सुनवाई स्पष्ट तरीके से समझ आये? जैसी व्यवस्था चीन में है। 
आज चीन हमसे आगे क्यों है? 70-80 के दशक तक भारत की GDP चीन के बराबर थी। लेकिन उसके बाद ऐसा क्या हुआ जिसका भारत सपना भी नहीं देख सकता? चीन के वैश्विक महाशक्ति बनने का सबसे बड़ा कारण उसकी भाषा व कानून के प्रति प्रतिबद्धता है। वहां के स्कूलों में विदेशी भाषा पढ़ने पर प्रतिबन्ध लगा है। हर कोई चाइनीज में ही लिखेगा और चाइनीज भाषा में ही जानकारी हासिल करेगा। इसलिए तो दुनिया में सबसे ज्यादा बोले जाने वाली भाषा वही है। वहां न तो कोई कानून किसी संसदीय समिति में लटकता और न ही उसपर हंगामें या प्रदर्शन होते हैं। रातों-रात कानून बदल दिए जाते हैं। जबकि भारत में यहाँ की जनता ऐसे गंभीर विषयों पर कुछ करने के बजाय सारी जिम्मेदारी मिडिया के ऊपर छोड़ देतीहै। हिंदी भाषाई समाचार की हिंदी अंग्रेजों द्वारा पढाई गयी लगती है।  अखबारों का शीर्षक होता है "स्कूल में बच्चों के एडमिशन के लिए पेरेंट्स परेशान"....  एक लाइन में 3 अंग्रेजी! क्या ऐसे बढ़ेगी हमारी हिंदी?  दिवस के दिन हिंदी के प्रति वैचारिक प्रतिबद्धता दिखाने वाले प्रधानमंत्री एक बेसिर-पैर का भाषण झाड़ कर चलते बने। देश की भाषा, संस्कृति का मान-सम्मान दिलाने के लिए सबसे जिम्मेदार और पहले व्यक्ति तो प्रधानमंत्री को ही माना जाएगा। लेकिन वे क्या करते हैं....  सार्क सम्मलेन में सूट-बूट पहनकर अंग्रेजी में भाषण झाड़कर चले आते हैं। सार्क का प्रमुख उद्देश्य क्षेत्रीय समझ व सहयोग बढ़ावा देना है, पर देश के कितने लोग इसे समझ पाते होंगे?
बेशक, जिस देश का प्रधानमंत्री ही अपनी मातृभाषा बजाय विदेशी भाषा का ज्यादा सम्मान करता हो विदेशी पहनावे को ज्यादा तरजीह देता हो। इसलिए ऐसा लगता है की हिंदी कभी राजभाषा न थी और न है.... 

लेखक:- अश्वनी कुमार , जो ब्लॉग पर "कहने का मन करता है" (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं..... 


Friday, 11 September 2015

बिहार में कौन जीतेगा - जाति या पार्टी

बिहार में चुनाव की घोषणा हो चुकी है। सभी दल पहले से ही एक दूसरे के प्रति शोर मचा रहे हैं, अब ये शोर और भी तेज़ हो जायेगी। राजनीतिक दलों की हमेशा फितरत रही है की दूसरे को लेकर इतना शोर पैदा करो की अपना न दिखे। अपना छिपाओ और दूसरे का दिखायो। देखने और दिखाने की राजनीति जनता को ही दिखाने के लिए होती है। एक चीज़ पक्की है की बिहार की जनता जिसे भी चुनेगी, वह अच्छा नहीं चुन पाएगी। अधिकतर मतदाता अपना नेता अंपने जैसा ही चुनेगा। उम्मीदवार भले ही दूसरी जातियों के मतदाताओं के लिए घूसखोर या गुंडा हो, लेकिन उसकी जाति के मतदाताओं के लिए तो वह ईमानदार और देवता होता है।  सोचतें हैं, ये अपनी जाति का है तो मेरे लिए काम जरूर करेगा। नहीं करने पर अगली बार किसी दूसरे को ट्राई कर लेंगे, क्या हर्ज़ है!  लेकिन वे ये नहीं जानते की उनका ये अगला वाला प्रयोग राज्य के लिए और देश के लिए कितना भारी पड़ रहा है।


 नीतीश तो बिहार में वोट विकास के नाम पर मांग रहे हैं। अगर विकास ही उनका असली मुद्दा था तो जाति के नाम पर ऐसी पार्टी से गठबंधन करने की जरूरत क्यों पड़ी, जिसका विकास से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं? विकास और सुशासन के दावों पर चुनाव लड़ने वाली JDU को बीजेपी से सहमे रहने की क्या जरूरत है? सहमे रहने का दो ही मतलब निकला जा सकता है, या तो उन्हें अपने ही दावे पर शक है, या सत्ता छूटने का मोह!  कार्यकाल के अंतिम दिनों में उन्होंने जिस अंधाधुन तरीके से फैसले किये, निषादों को ST का दर्ज़ा किया और लगभग तमाम संगठनों की मांगें पूरी करके वोट बैंक पक्का करने चाहा। क्या सत्ता का मोह उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर कर रहा है, या जातिगत समीकरण के तोड़-जोड़ में लगी BJP गठबंधन का डर?
 

भारतीय जनता पार्टी रामविलास, मांझी, कुशवाहा और पप्पू यादव को लेकर जाति के नाम पर ही सही लेकिन सत्ता हथियाने का प्रयास कर रही है, जो उसका पहला और अंतिम लक्ष्य भी है। अगर ऐसा नहीं होता तो ये चुनाव न तो प्रधानमंत्री के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बनता, न ही बिहार के मुख्यमंत्री के DNA पर शक जताया जाता और न ही यहाँ की जनता की बोली लगाई जाती। 75हज़ार करोड़ … 80 हज़ार करोड़ … 1.65 हज़ार करोड़!  कभी नीतीश के रबर स्टाम्प रहे मांझी आज नीतीश के लिए धोखेबाज और उनके गले की घंटी बन चुके हैं। ऐसा ही हाल लालू के लिए पप्पू यादव का भी है और UPA  के लिए पासवान का। लेकिन अगर यही तीनों महागठबंधन का हिस्सा होते तो उनलोगों के लिए दूध के धुले हो जाते और BJP के लिए भरष्टाचारी तथा हिन्दू विरोधी।  यही लालू BJP से गठबंधन कर लेते तो बीजेपी वालों के लिए 'जंगलराज' नाम का NOUN ही उनकी डिक्शनरी से फ़िल्टर हो जाता।  इसलिए गठबंधन से ज्यादा मायने बिहार में जाति की है।  बिहार में चुनाव हो रहे हैं, एक साल बाद फिर यूपी का चुनाव आ जाएगा। सारे नेता-मंत्री और प्रधानमंत्री उसमें लग जाएंगे, पुनः अच्छे दिन के दावे किये जाएंगे और इस तरह से हर एक-एक साल करके केंद्र का 5 साल निकल जाएगा। फिर से अबकी बार मोदी सरकार के अच्छे दिन का नारा देकर पद बरकरार रखने की कोशिश की जायेगी। 

Image result for nitish lalu and bjp cartoon image ऐसा नहीं है की सिर्फ नेता ही गुनहगार है, जनता भी कोई दूध की धूली नहीं है। पैसे लेकर रैलियों में जाने लगी है, बोतल की कीमत पर वोट बेचने लगी है और जाति के नाम पर अंधे-लंगड़े को भी अपना मान रही है। इस तरह से बिहार में जाति का गठबंधन लड़ेगा भी और जाति का गठबंधन जीतेगा भी। चाहे जीत जिसकी भी हो एक बात पक्की है की बिहार की जनता जिसे चुने, वह अच्छा नहीं चुन पाएगी …  
लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर 'कहने का मन करता है' (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं.… 


Tuesday, 1 September 2015

आज के युग में शिक्षकों की प्रासंगिकता

हम सभी प्रत्येक वर्ष 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाते हैं। इस दौरान हमें अपने शिक्षकों को करीब से जानने का अवसर मिलता है। शिक्षक बाहर से जितने अक्खड़ व सख्त होते हैं, अंदर से उनका हृदय उतना ही कोमल और उदार होता हैं। हम सभी जानते हैं की शिक्षक दिवस के जनक 'डॉ० सर्वपल्ली राधाकृष्णन' ने शिक्षकों के प्रति सम्मान जताने के लिए अपने जन्म दिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया। डॉ० राधाकृष्णन पहले ऐसे व्यक्ति थे, जो गैर-राजनीतिज्ञ होने के बावजूद भी देश के पहले उपराष्ट्रपति बने और बाद में राष्ट्रपति। राष्ट्रपति बनने के बाद भी उनकी सादगी आज के लोगों के लिए एक प्रेरणा है।  शिक्षक दिवस के मौके पर बहुत सारे स्कूल,कॉलेजों और कोचिंग संस्थानों में लोग शिक्षकों व उनकी महता के बारे में बातें करते हैं। पर हाँ,बहुत सारे तो नहीं लेकिन कई ऐसे लोग हैं जिनकी देश की गिरती शिक्षा व्यवस्था, शिक्षा का बाज़ारीकरण इत्यादि पर चर्चा जायज लगती है।                                                                                 

जीवन में माता-पिता का स्थान कभी कोई नहीं ले सकता, क्योकि वे ही हमें इस रंगीन-खूबसूरत दुनिया में लाते हैं। उनका ऋण हम किसी भी रूप में नहीं उतार सकते। लेकिन जिस समाज में हम रहते है, उसमे रहने लायक इंसान तो हमें शिक्षक ही बनाते हैं। बेशक, बच्चों की पहली पाठशाला उनका परिवार होता है, पर वे तो कच्चे घड़े की भाँति होते हैं। उनकी मानसिकता बिलकुल वैसी हो जाती है, जैसा वे अपने आसपास के माहौल में देखते हैं। सफल जीवन के लिए शिक्षा तो अनिवार्य है ही पर शिक्षा देने वाले शिक्षक को तो भगवान से भी बढ़कर माना गया है। परन्तु न तो आज शिक्षकों में वो बात रही, न आज के छात्र ही वैसे रहे। आज शिक्षकों को वो सम्मान, आदर, प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं है. जैसा पहले के शिक्षकों को प्राप्त था। नतीजा, गुरु-शिष्य परम्परा ही ख़त्म होने के कगार पर है।  गुरु-शिष्य परम्परा भारत की संस्कृति का एक अहम हिस्सा है, जिसके कई सुनहरे उदाहरण हमारे इतिहास में दर्ज़ है। लेकिन वर्तमान समय में कई ऐसे लोग हैं जो अपने अनैतिक कारनामों व लालची स्वभाव से इस परम्परा पर गहरा आघात कर रहे हैं।

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                                                      हम अगर भारत के अतीत में जाकर द्रोणाचार्य-एकलव्य जैसी गुरु-शिष्य संबंधों को देखें तो हमें खुद पर शर्म आती है। 'शिक्षा'  जिसे अब व्यापार समझ कर बेचा जाने लगा है, उसी परम्परा की नींव पर चाणक्य-चन्द्रगुप्त जैसे महापुरुषों का आस्तित्व है। हर कोई ज्ञान की बोली लगाने में जुट चुका है. आखिर शिक्षक करें भी तो क्या? आज के बदलते परिवेश में जहाँ सब-कुछ बदल रहा है, हमारी परम्पराएँ बदल रहीं हैं, सोच बदल गए हैं, ऐसे में तो निश्चित रूप से सबकुछ बदलेगा ही। आखिर आधुनिक जो हो गए हैं हम !  अंब हमारी पढाई ऑनलाइन होती है, आगे आनेवाली पीढ़ियां शिक्षक की जगह रोबोट से पढाई जायेगी। सभ्यता-संस्कृति से किसी को क्या मतलब, क्योकि 'भारत' को डिजिटल करके 'इंडिया' जो बना डालना है। सवाल है, फिर शिक्षकों का महत्व और उनके  आस्तित्व को बचाने के लिए क्या कदम उठाये जाएंगे? या उनकी भी स्वच्छ भारत अभियान में कहीं सफाई न कर दी जाए !  भारत की शिक्षा व्यवस्था पहले से ही नौकरी आधारित शिक्षा व्यवस्था है। सन 1835 में इंडियन एजुकेशन सिस्टम की ड्राफ्टिंग करने वाले 'लार्ड मैकॉले' ने भारत की शिक्षा व्यवस्था ऐसी कर दी की आज भारत ने पढ़े-लिखे बेरोज़गारों की एक बड़ी फ़ौज तैयार कर ली है , अब 500 पद के लिए 30 लाख फॉर्म भरे जाते हैं। लेकिन इसका पिछले 65 सालों से अनुसरण कराने वाले तो अपने हैं। नतीजा, 10 साल अंग्रेजी सिखने में बर्बाद करो, फिर पूरी जवानी इतिहास-भूगोल याद करने में। फिर भी इसकी कोई गारंटी नहीं की आप सर्विसमैन कहलाओ, हाँ अगर आप के पास पैसे न हो तो!  उच्च शिक्षा के लिए पैसों और अंकों का गणित बड़े-बड़े विद्वान भी नहीं समझ पाते। DU, JNU जैसे अच्छे कॉलेजों में दाखिला लेने के लिए 98-99 फीसदी को प्रतिभा का पैमाना बनाया जाता है। लेकिन जिनके पास पैसे नहीं उनका यानी देश का भविष्य तथाकथित 'खिचड़ीघरों' में पढता है, ऐसी दोहरी नीति क्यों? ऐसे में क्या उसके अंकों की अमीरों के बच्चों के अंकों से कोई तुलना की जा सकती है? सोच कर डर लगता है की उन बच्चों पर क्या गुजरती होगी, जिनके 50 से 60 फीसदी अंक आते हैं। वो DU, JNU तो क्या, शहर के अच्छे कॉलेजों में भी नहीं पढ़ सकता। अगर सरकार सभी कॉलेजों को DU, JNU जैसी नहीं बना सकती तो कॉलेज खोल ही क्यों रखा है? वैसे कॉलेज हैं ही क्यों जो अच्छे नहीं है?                                                       

आज के शिक्षक व शिक्षा का बाज़ारीकरण केवल धन कमाने का एक जरिया बनकर रह गए हैं। शिक्षक जिस पर इस देश के भविष्य को सँवारने की जिम्मेवारी होती है, वह पैसों के लालच में अपनी जिम्मेवारी भूल बैठा है। ये सब किसकी उदासीनता से भुगता जा रहा है? सरकार की, समाज की, या हम सभी की?
जो भी हो, लेकिन शिक्षक अगर चाह ले तो चन्द्रगुप्त जैसे शिष्य को महान बना सकता है और नन्द वंश का नाश भी कर सकता है। लेकिन हाँ, गुरु भी चाणक्य जैसा होना चाहिए। परन्तु आज के इस डिजिटल युग में न कोई गुरु चाणक्य बन सकता है और न ही चन्द्रगुप्त जैसा शिष्य गढ़ सकता है.....
लेखक:-  अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर 'कहने का मन करता है…'(ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं.…   पेज पर आते रहिएगा….