Thursday, 29 October 2015

मैं अच्छा नहीं चुन पाया …

कल सुबह पटना क्षेत्र में वोटिंग का दिन था। मैं नहा-धोकर वोटिंग करने निकला था पर, उत्सुकतापूर्वक अपने आसपास के बूथों के बाहर जमें लोगों की गतिविधियाँ देखने में लग गया। एक तरफ से मतदाता आते और लगभग 200-300 मी० की दुरी से ही उन्हें बरगलाने की कोशिश की जाती। केंद्र की सामने वाली गली में दिन-भर खाने-पीने का इंतज़ाम था, पीने का मेरा मतलब पानी के साथ-साथ शराब भी। गली-गली में नाश्ते से भरे डब्बे घरों तक पहुँचाये जा रहे थे। बीस-पच्चीस लोगों का हुजूम सुबह-सुबह से ही अपनी जाति वाले मतदाताओं के घर पर जाकर अपनी ही जाति के उम्मीदवार को वोट देने की सलाह दे रहे थे। और हाँ न मानने पर पैसे का भी पूरा बंदोबस्त था।

ये सब देखते हुए मैं वहां से कुछ दूर स्थित अपने बूथ पर चला। मैंने आजतक ये सारी चीजें किताब और टीवी-रेडियो में ही सुनी थी, लेकिन कल मैंने अपनी आँखों से देखी।  मैं सकपका गया, मुझे चुनाव आयोग की मासूमियत और उसके ओवर कॉन्फिडेंस पर तरस आ रहा था। मेरा मन अपने अंतर्द्वंदों से लड़ता हुआ बार-बार सवाल करने लगा की क्या बिहार की जनता ऐसे लुच्चे-लफंगों के सरदार को चुनकर वाकई अपना भला कर लेगी या लोकतंत्र का भला कर देगीया सबकुछ वैसा ही रहने वाला है जैसा पहले थाखुद को राजनीति का तीस मार खां समझने वाले बहुत सारे लोग ट्रेनों में या चाय के दुकानों पर शोर के सहारे अक्सर इन सारे पहलुओं को भुला देने का प्रयास करते हैं। सभी की कमियां निकालते हैं, लेकिन कल मैं उन्ही जैसे लोगों को भी उसी आधार पर अपना वोट कास्ट करने को कहते देखा, जिससे न तो कभी भारत की इस गरीब जनता का भला हो सकता है और न ही लोकतंत्र का।

कुल मिलाकर, इस चुनाव में पैसे पानी की तरह बहाए गए। लेकिन इस पानी से कुछ निहायत गरीबों की क्षण भर की प्यास बुझती देखी तो दिन तो पलभर ही सही सुकून तो आया। नाश्ते के डब्बे को देखकर एक दिन ही सही उनके बच्चों की चहचहाट से उनका घर सराबोर तो हुआ!  लेकिन बिहार की जनता का भारत की राजनीति में जितना कद है उस अनुसार वो नाममात्र भी अपने दायित्व का निर्वहन नहीं कर पायी।  इसलिए कहा जा सकता है की बिहार की जनता अपने लिए कोई अच्छा खड़ा करने की दृढ़ता ही नहीं दिखा पायी, गुंडों को टिकट दिए गए, कारोबारी पैसे के दम पर टिकट पा गए और बड़े नेता अपने भोन्दु से लाडले को चुनाव लड़ा गए।

बेशक, बिहार की जनता जिसे चुने, वह अच्छा नहीं चुन पाएगी। बिहार में जाति का गठबंधन लड़ा भी, उसे वोट पड़ा भी और जाति का गठबंधन जीतेगा भी.(और... स्वाभाविक है, मैं भी अच्छा नहीं चुन पाया…..)
लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर 'कहने का मन करता है'(ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं....

Tuesday, 27 October 2015

अपना वोट किसे दूँ?

शोर-शराबे का सिलसिला अब थम चूका है, चुनाव अपने अंतिम दौर में सरपट भागा चला जा रहा है। हर उम्मीदवार, हर राजनीतिक दल सत्ता का सुख पाने के लिए बेचैन है। पर उनकी तरह मैं भी असमंजस में पड़ा हूँ की अपना वोट आखिर किसे दूँ? मेरे क्षेत्र में जितने भी उम्मीदवार मैदान में खड़े हैं, चाहे वो बीजेपी का हो, जदयू का हो या फिर निर्दलीय हो, सारे उम्मीदवारों तथा मौजूदा विधायक को पिछले 5 सालों के दौरान न तो उन्हें जनता की समस्याओं से रूबरू होते देखा है और न ही क्षेत्र के लिए जनसेवा करते। यहाँ तक की अधिकतर उम्मीदवार को क्षेत्र में कोई जानता भी नहीं, बस पार्टी ने टिकट दे दी और चले आये चुनाव लड़ने!


मेरे लिए राजनीतिक दल के आधार पर वोट देना उलझन भरा है। कुत्ते-बिल्ली जैसी लड़ रही BJP-JDU-RJD तीनों ही गाली-गलौज और लोकलुभावन वादों के अलावा जनता के समस्याओं के मुद्दे पर चुनाव लड़ने की जगह एक-दूसरे की कमियां गिनाने में लगे हैं। नीतीश की विचारधारा सेकुलरिज्म का तथाकथित मिसाल है, जो इस भय में जी रहे है की भारत में उनका राज तभी तक सुरक्षित रहेगा जबतक इस्लाम की तलवार उसकी म्यान में हो, उन्हें मना कर चलेंगे तभी उनपर राज कर सकेंगे। उनका डर स्वाभाविक है की सत्ता पर संघ परिवार काबिज है और दूसरा की युवा नौजवान फक्र से कहने लगा है की 'गर्व से कहो, हम हिन्दू हैं' दूसरा उनका अहंकार व सत्ता में बने रहने  लालच उनकी सिर्फ सड़क-पुल बना देने की विकासगाथा को लालू के लिए भुला देने को तैयार हैं।  लालू का कथित जातिवाद राजनीतिक बेवकूफी का एक उदहारण है। संसद में अल्हड़पन, बुड़बकपन लाने का श्रेय लालू को ही जाता है। मंडल के सहारे राजनीतिक जमीन तलाशकर खुद को यादवों का नेता घोषित करके 15 साल में बिहार में शासन किया। इस दौरान उन्होंने यादवों-पिछड़ों का कितना विकास किया ये समूचा राज्य जानता है।  पर हाँ, भले ही गरीब अपना विकास न कर पाया हो, लेकिन इस दौरान लाठी, बन्दुक की नली के सहारे गरीबों का शोषण भी हुआ और भ्रष्टाचार-अपराध का तेज़ गति से फला-फुला भी। सेक्युलर जमात में शामिल लालू को भी इस्लाम के नेक और अनेक बन्दों को लेकर उतनी ही चिंता है जितना की नितीश को।

चुनाव आयोग अपनी जिम्मेवारी बखूबी निभा रहा है, लेकिन उसे राजनीतिक वंशवाद, अवैध खर्चों तथा बेलगाम जुबानों पर प्रतिबन्ध लगाना होगा। हर कोई अपने बेटे-पोते को जबरदस्ती जनता पर थोप रहा है, जिसे दस लोगों के बीच सही से बोलना नहीं आता उसे लाखों लोगों का प्रतिनिधि बनाया जा रहा है। चुनावों में टिकट उसे ही दिया जाता है जो करोड़पति हो चाहे उस क्षेत्र का न हो पर, पार्टी को चंदा देने पर सब छिप जाता है। इसलिए, कोई दूध का धुला नहीं है। सभी मक्खियाँ लिपटी है, जरुरत है सत्ता का शहद चूसने से रोकने की। चुनाव सुधार की बात करने की, राईट टू रिकॉल क़ानून लाने की, जल्द न्याय दिलाने की तथा गंवार नेताओं को राजनीति को अपना विरासत समझने से रोकने की। तभी उसके प्रति मेरा सच्चा समर्थन होगा ....भारतीय जनता पार्टी भी खुद को पिछड़ों का हितैषी बताकर वो सबकुछ करने लगी है जो हर किसी को सत्ता का सुख कराती है। गरीब, पिछड़े, कुपोषित, निर्धन जैसे शब्द रैलियों में या कागजों पर ही अच्छी लगती है। वास्तविक हकीकत तभी पता चलेगी तब हेलीकॉप्टरों या लक्ज़री गाड़ियों से उतरकर खेतों में चलें, निर्धन बस्तियों से गुज़रें। सारे दलों ने प्रचार में जिस तरह से पैसे बहाय हैं, अगर वे पैसे गरीबों की बेहतरी पर खर्च कर दिया जाता तो भला हो जाता। लेकिन वे ऐसा क्यों करेंगे? देश की गरीबी मिट जायेगी या सारे अनपढ़ शिक्षित हो जाएंगे तो उनके झंडे कौन ढोएगा, रैलियों में तालियां कौन ठोकेगा? और फिर उनके जल्लाद, शैतान, कनफुँकवा कहने का मतलब ही क्या रह जाएगा?

Monday, 19 October 2015

डॉक्टरों और दवाइयों के बीच फँसा गरीब

"(कई महीनों से मैं देश की अलग-अलग समस्याओं पर लिख रहा हूँ। आज की इस कड़ी में मैंने धरती के भगवान कहे जाने वाले 'डॉक्टरों की हैवानियत' को आपलोगों से रूबरू कराने का फैसला किया।)"
  चिकित्सा विज्ञानं के जनक 'अरस्त्तु' ने अपने समय में कभी सोचा भी नहीं होगा की एक दिन उनका यह प्रयास व्यवसाय में बदलकर व्यापक पैमाने पर गोरखधंधे का जरिया बन जाएगा। अस्पताल से लेकर सड़क तक कुकुरमुत्ते की तरह फैले मेडिकल नेटवर्क का जंजाल, डॉक्टरों के लिए तो ऐशो-आराम व पैसे का साधन है तो वहीँ इस देश के भूगोल से अक्सर भुला देने की कोशिश की जाने वाली गरीबों के लिए दैवीय प्रकोप है।  महंगे इलाज़ से घबराकर ग्रामीण इलाकों में रहने वाली गरीब जनता बीमारी को दैवीय प्रकोप मान बैठती है और तब शुरू होता है मुर्गा-कबूतर-दारु से भूतों को संतुष्ट करने का खेल !  यही सच्चाई है आम जनता तक स्वास्थ्य सुविधाएँ पहुँचाने की दावे करने वाले राजशाहों की देश का!  कहने को तो सरकारी अस्पताल में सारी सुविधाएँ मुफ्त होती है, लेकिन शायद इसकी हकीकत जानने के लिए खुद प्रधानमंत्री को स्टिंग करना पड़ेगा। बीमार होने के बावजूद लंबी-लंबी लाइनों में घंटों पसीना बहाने के बाद रोगी का रजिस्ट्रेशन होता है, फिर डॉक्टर चेम्बर का बाहर घंटो अपनी बारी का इंतज़ार करने पर जब रोगी तथाकथित भगवान के पास जाता है तो जानते हैं क्या होता हैचंद सेकंड तक स्टेथोस्कोप लगाने का दिखावा करके सीधे दवाई लिख दी जाती है, समस्या तक अच्छी तरह से नहीं सुनी जाती और हाँ बीच-बीच में MR से दवाइयों का सौदा भी कर लिया जाता है। जबकि नियमानुसार, मरीज डॉक्टर से अपनी बीमारी सम्बंधित सारे सवाल पूछ सकता है जबतक वह संतुष्ट न हो जाए और डॉक्टर को उन्हें जवाब देना बाध्य है। सरकार के पास आकड़ें बेमतलब नहीं आते की बड़ी संख्या में मरीज सरकारी अस्पतालों की जगह निजी अस्पतालों को तरजीह दे रहे हैं क्योंकि, डॉक्टर से कुछ पूछना शैतान को पत्थर मारने जैसा है, पूछने पर भूखे कुत्ते की तरह सारी खिसियाहट मरीज पर उतार देता है। और वो कुछ नहीं कर पाता क्योंकि वो गरीब है और गरीबों का कोई माँ बाप है ही नहीं! ऐसी स्थिति कमोबेश सारे सरकारी अस्पतालों की है, कुछ डॉक्टरों को छोड़कर।
सरकारी अस्पताल हो या प्राइवेट क्लीनिक, उसके डॉक्टरों की लिखी दवाइयाँ उस 500m के दायरे में ही उपलब्ध होती है, क्योंकि कंपनियों और दवा नाम के साथ-साथ डॉक्टरों की लिखावट, तीनों एक ऐसे पूरक होते हैं की वह दवा कहीं और मिलती ही नहीं। डॉक्टर अक्सर सर्दी-बुखार जैसे समस्याओं में लोगों को जेनरिक दवाइयाँ लिखने की जगह महँगी दवाइयाँ लिखते है जिसमे उनका सबसे ज्यादा कमीशन होता है, नतीज़न 5रु में ठीक होने वाली बीमारी के लिए 500 खर्च करना पड़ता है और 1000 का जांच अलग से। आखिर कहाँ जायेगी इस देश की गरीब आबादीअमीर लोग अक्सर अपनी पहुँच का इस्तेमाल करके इमरजेंसी सेवाओं का उपयोग बड़ी आसानी और बेहतरी से कर लेते हैं, लेकिन सड़क-दुर्घटनाओं में घायल असहायों, गंभीर अवस्था में लोगों को कई सरकारी अस्पताल बड़े अस्पतालों में रेफर करके अपना पीछा छुड़ाना चाहते हैं जबकि उनका इलाज़ वही संभव होता है।  सवाल है, क्या विकास के दावों के बीच-बीच में गाय-बकरी की राजनीति कर लेने वालों के लिए सड़क और पुल बना देने या बिजली ला देना ही विकास है? राज्य के PMCH, NMCH जैसे  बड़े अस्पतालों में कितने लोगों को मुफ्त दवाइयाँ, पट्टियां या सुई मिलती है? कितनी नर्से मरीज़ों से सम्मानपूर्वक बात करती है? अगर जांच के लिए अस्पतालों में ही व्यवस्था है तो क्यों डॉक्टर निजी जांच केन्द्रों के पर्चे मरीज़ को देकर वहीँ जांच कराने को कहते हैं? सरकार के पास इतनी सारी मशीनरी  तंत्र है तो क्यूँ वो ऐसे डॉक्टरों को शिकायतों के बावजूद भी नहीं ढूंढती या ढूँढना नहीं चाहती? गरीबों का खून चूसने वाले डॉक्टरों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती? और कई डॉक्टर तो मरीज़ों के बीच ही चाय-पकौड़े खाते देखे जाते हैं।


कुछ समय पहले सांसद पप्पू यादव ने डॉक्टरों की मनमानी के विरुद्ध आवाज उठाई थी, लेकिन क्या हुआ उनका? डॉक्टर एसोसिएशन के गुर्राने से सरकार डर गयी और पप्पू यादव को दबा दिया गया। जहाँ तक प्राइवेट क्लीनिकों के बात है तो अगर सरकारी अस्पतालों की सुविधाएँ बेहतर हो जाए और सरकार गरीबों का खून चूसने वाले डॉक्टरों कसे जो सरकारी और अपना दोनों काम देखते हैं, तो उनकी मनमानी पर काफी हद तक रोक लग सकेगी। मुझे तो हैरानी होती है की लोगों के ज़िंदगी से जुड़ी मुद्दे से हटकर गाली-गलौज और जातिवाद पर चुनाव लड़ी जा रही है, ऐसे में न तो जनता का भला होगा न ही लोकतंत्र का।  लेकिन डॉक्टरों और नेताओं के अच्छे दिन चल रहे हैं और चलेंगे भी, जबतक जनता नहीं सुधरेगी ....

लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर 'कहने का मन करता है' (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं.…  पेज पर आते रहिएगा....

Friday, 16 October 2015

राम मंदिर पर सेक्युलर बनती भाजपा

भारतीय जनता पार्टी पर चढ़ती सेकुलरिज्म का बुखार सबका लिए हैरानी भरा है। वो भारतीय जनता पार्टी जिसे 1998 तक हिन्दू-राष्ट्रवादी पार्टी कहा जाता था, वो पार्टी जिसे 2 सीटों से 272 सीटों  पहुँचाने में उसके हिन्दुत्वादी चेहरे का बड़ा योगदान रहा है। अगर वैसी पार्टी अपनी विचारधारा ही बदलने की कोशिश करे तो हैरानी होना स्वाभाविक है। भाजपा के युगपुरुष अटलबिहारी बाजपेयी तथा अब हाशिये पर डाल दिए गए 'लाल कृष्ण आडवाणी' का भी एक समय था, जो कभी खुद को रामभक्त बताकर किसी भी कीमत पर राम मंदिर बनवाने की बात करते थे, उनकी ही पार्टी की सरकार के मंत्री राजनाथ सिंह इसे अदालती मामला बताते फिर रहे हैं। ये सच है की 1992 में आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या तक की रथ यात्रा ने रामभक्तों के बीच  अपनी अच्छी पैठ बना ली थी, जिसका फायदा उन्हें चुनावों में भी मिला। वर्ष 1998 में बनी वाजपेयी सरकार अपनी हिंदुत्ववादी छवि होने के बावजूद भी उन्होंने विकास के एजेंडे पर काम किया, लेकिन राम-मंदिर मुद्दे का परित्याग नहीं किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जिन्हे 2002 गुजरात दंगे का मास्टरमाइंड बताया गया, एक हद से ज्यादा उन्हें कट्टर हिंदूवादी चेहरे के रूप में देश के सामने लाया गया, जिसके परिणामस्वरूप 16वीं लोकसभा के चुनावों में वोटों का ध्रुवीकरण उनकी छवि के आधार पर हुआ। नतीज़न, पार्टी पूर्ण बहुमत से सत्ता पर काबिज हो गयी व अपने कट्टरवादी चेहरे को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठा दिया।

Image result for ram mandir ayodhya imageसंघ के विभिन्न हिंदूवादी संगठनों में प्रमुख रूप से विश्व हिन्दू परिषद राम-मंदिर पर मोदी से आशान्वित थी। लेकिन सरकार का हिन्दूवादी एजेंडे से डरकर भागना कायर सिद्ध नहीं करताजिस पार्टी का जन्म से लेकर अबतक का इतिहास राम-जन्म भूमि के इर्द-गिर्द घूमता है वो पार्टी अब सत्ता में होने के बावजूद भी सदन में चर्चा कराने से भी घबरा रहा है। यूनिफार्म सिविल कोड, गौ हत्या या राम-जन्म भूमि जैसे मसलों में अगर सबकुछ अदालतों पर ही छोड़ दिया जाना था तो बाबरी विध्वंश की क्या जरूरत थी? रथ-यात्रा करने व उसके कारण जेल जाने की नौटंकी क्या किसी स्वार्थ की ओर इशारा नहीं करती?

सब जानते हैं की भारतीय अदालतों की गति का दुनिया में कोई जोड़ नहीं, अदालत भी जानती हैं की रामलला, राम-जन्म भूमि है।  और कितने प्रमाण चाहिए इन दिखावटी मौलाना सेक्युलरिस्ट नेताओं को। खुदाई में मिली 'ॐ नमः शिवाय' लिखी ईंटें तब की है जब शायद बाबर की औलादों के परदादाओं के भी परदादा का जन्म नहीं हुआ होगा। लेकिन कोर्ट को इनसे कोई सरोकार नहीं, क्योकि कानून तो अँधा है। पर इनकी आँखें तब होती है जब बात सेकुलरिज्म से सम्बंधित हो। दूसरी तरफ BJP की नज़र अगले साल होने वाले U.P. चुनावों पर है, जहाँ संभव है की एक बार फिर राम नाम का शगूफा छोड़ा जा सकता है। लेकिन अब इतना आसान भी नहीं, राम नाम का राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करने वालों के लिए कोई गुंजाइश नहीं बची है, जरूरत है सच्चाई का साथ देने की, सच पर सदन में बहस कराने की।

"बड़ा दुःख होता है की हम हिन्दू अपने भगवान के प्रत्यक्ष जन्म-स्थल के लिए संघर्ष कर रहें है, लेकिन जेरुसलम में ऐसा क्यों नहीं होता? वेटिकन में ऐसा क्यों नहीं होता? काबा में ऐसा क्यों नहीं होता? अक्सर हम हिन्दू ही क्यों दबे-कुचले जाते हैंसोचियेगा……"
 

लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर 'कहने का मन करता है' (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं.…  पेज पर आते रहिएगा....

Monday, 12 October 2015

मतदाता भी अब पहले जैसे नहीं रहे…

अब से 10 वर्ष या उससे पहले नेताओं के लिए जनता को बरगलाना आज के मुकाबले कही ज्यादा आसान काम था। भ्रष्टाचार, गरीबी, भुखमरी या बेरोज़गारी तब भी थे और अब भी हैं। खासकर बिहार जैसे राज्य में जहाँ की जनता खुद को राजनीति का तीस मार खां समझती है, उसे खुद से ये सवाल करने चाहिए की क्या उनके लिए राजनीति का स्तर बस इतना ही की नेताओं को जल्लाद, नरभक्षी, चोर, डाकू, कनफुँकवा जैसे शब्दों का प्रयोग उन्हें समझाने के लिए करना पड़ता हैबिहार की आबादी का एक बड़ा हिस्सा कुपोषण, अशिक्षा और बेरोज़गारी जैसे मसले में सबसे ऊपर है। लेकिन अगर हम 2001 के जनगणना के आकड़ों से 2011 के आंकड़ों की तुलना करें तो, बिहार आश्चर्यजनक तरीके से विकास के रास्ते पर उड़ान भरते देखा जा सकता है। उस वक्त भी लालू, नीतीश, राबड़ी व रामविलास जैसे नेताओं पर जनता भरोसा करती थी और अबतक करती आयी है। पर, 1990 की पिछड़ा राजनीति के फलस्वरूप कई क्षेत्रीय दलों का गठन हुआ। राष्ट्रीय पार्टीयाँ, क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ने लगी और राष्ट्रीय दलों में क्षेत्रीय दल के गुण-दोष देखे जाने लगे व राष्ट्रीय दलों के गुण और दोष क्षेत्रीय दलों में देखने को मिलने लगी। पहले, आज की तरह न तो फेसबुक इंटरनेट का चलन था और न ही हर किसी को टीवी या अखबार नसीब थी। लोग नेताओं के रैलियों में जाते थे लेकिन आज की तरह नहीं या नेता लोगों के घर-घर जाकर उनसे वायदे करते और मतदाता अपने नेता के प्रति वही आम धारणा बना लेता जो उसे बताया जाता।

कल मैं रविश की रिपोर्ट देख रहा था, जो समस्तीपुर रिपोर्टिंग करने गए थे। गाँव की महिलाओं में गजब की राजनीतिक दूरदर्शिता समझने को मिली, हर महिला विकास को ही मुद्दा मान रही थी। टीवी,रेडिओ, साइकिल या स्कूटी बांटकर वोट लेने की चाहत रखने वाले लोग भी अब गांव-गावं जाकर लोगों से मिलने कतरा रहे हैं, वे जानते हैं की जनता अब पहले जैसी नहीं रही। सख्त सवाल करेगी, क्षेत्र की योजनाएं पूछेंगी तथा अपनी तरह-तरह की बुनियादी सवालों से उनके चेहरे का रंग फीका कर देगी। उस रिपोर्ट में मैंने उन महिलाओँ का अपने लोकतंत्र के प्रति सच्ची आस्था देखी जिनके गांव में बिजली नहीं है, घर में टीवी नहीं है और अखबार के बारे में पूछे जाने पर कहती है की वो तो आधा झूठ ही रहता है। कह रही थी की नितीश कुमार यहाँ आएं तो उन्हें पूछेंगे की आज तक गांव में बिजली क्यों नहीं आई, नरेंद्र मोदी आते हैं और रैलियों में भाषण झाड़कर चले जाते हैं, हमें कौन देखने आता है।  जिस सख्त लहजे का वे इस्तेमाल कर रही थी बेशक मेरा दिल ये सब देखकर झूम उठा। भ्रष्टाचार के विरुद्ध, वंशवाद के खिलाफ भी ये मतदाता आज नहीं तो अगले चुनाव तक जागरूक जरूर हो जाएंगे। जातिवादी का चलन अक्सर पुरुष मतदाताओं में देखा जाता है लेकिन जिस तरह से बिहार की अनपढ़ महिलाये अपने नेता से हिसाब मांगने लगी है, क्षेत्र में न जाने वाले नेताओं को खरी-खोटी सुनाने लगी है, लगता है किसी के अच्छे दिन आएं न आएं, लोकतंत्र के अच्छे दिन जरूर आ गए हैं.

जरूरत है, नेताओं की आँखों में ऑंखें डालकर उन्हें याद दिलाएं की हमने उन्हें किसलिए चुना है? हमें उनसे काम की अपेक्षा है न की सदन में हंगामें कर के जनता का पैसा व वक्त बर्बाद करने की.....

लेखक:- अश्वनी कुमार, पटना

Sunday, 11 October 2015

क्योंकि मैं नेता नहीं हूँ...

"(मैं अपने इस ब्लॉग में खुद की व्यथा को कलमबद्ध कर रहा हूँ। मेरी शिकायत न तो सिस्टम से है और न ही इस बनाने वालों से. शिकायत है तो सिर्फ इस चलानेवालों से। मैंने अबतक अपनी छोटी सी ज़िंदगी में नेता न होने की बहुत कमी महसूस की और मुझे उम्मीद है की आपने भी कभी न कभी महसूस की होगी)"
सड़कों पर कचड़े को देखकर इसके जवाबदेह लोगों पर बहुत गुस्सा आता है,  मन करता है की शिकायत कर दूँ, लेकिन किससे? कौन सुनेगा मेरी! किसके पास फुर्सत है इसकी!  अस्पताल में टिकट खिड़कियों पर घंटों धुप में खड़ी रहकर अपनी बारी का इंतज़ार करता हूँ, पर कोई ऐसा है जो मिनटों में टिकट लेकर चला जाता है !  त्योहारों में जब मंदिर जाता हूँ, 5-5 घंटे लाइन में धक्के खाता हूँ, पर कोई कार से उतारकर VIP दर्शन करके चला जाता है, क्यों? क्योंकि मैं नेता नहीं हूँ !  सड़क से जाते वक्त कई बार पुलिस द्वारा धकिया दिया जाता हूँ, क्योकि कोई नेता आ रहा होता है, हमारा प्रतिनिधि उस रास्ते से जा रहा होता है। अपने नेता से मिलने की बहुत चाहत होती है, अपनी समस्याएँ बताकर उनसे आश्वासन लेने की बड़ी कामना होती है, पर क्या करूँ उन्हें हमसे ज्यादा अपनी पार्टी की चिंता रहती है, आखिर जनप्रतिनिधि तो पहले पार्टी ने ही बनाया था जनता ने वोट तो बाद में दिया था।  कभी कभी तो लगता है की वोट ही न डालूँ, जबरदस्ती थोपे गए गुंडों-मवालियों व अनपढ़ भोंदू नेताओं के बेटों-बेटियों से घृणा होती है, थूकने का मन करता है पर क्या करूँ लोकतंत्र के प्रति कर्तव्य के बंधन में खुद को बंधा महसूस करता हूँ!  डॉक्टर के पास इलाज़ के लिए जाता हूँ, तीन-चार टेस्ट कराने को कहकर टेस्ट सेंटर की पर्ची थमा दी जाती है, मजबूरी का ब्लैकमेल करके दो गुने ज्यादा चुकाकर चला आता हूँ ! उसके बाद डॉक्टर की लिखी दवाइयों में भी न जाने कितने लूट लिया जाता हूँ!  शिकायतों के समाधान के लिए डीएम, कमिश्नर को चिट्ठी लिखता हूँ, न्यूज से पता चलता ही की चिठ्ठियाँ कूड़े में पड़ी होती है!  न्यूज़ से याद आया, हमारे मीडियातंत्र के पास नेताओं की गाड़ियों के पीछे भागने से वक्त ही कहाँ मिलता? बुद्धू नेताओं के गाली-गलौज हेडलाइन बनाकर देश के भविष्य निर्धारण में जुटे  ,उन्हें देश की 40 करोड़ गरीब आबादी की चुनौतियाँ, ठंडे एसी दफ्तरों में रिपोर्टिंग करने से बेशक सब-कुछ अच्छा ही दिखता है!  हिन्दू-मुसलमान मुद्दे पर नेताओं की मूर्खता देखकर खून खौल जाता है! उससे भी बड़ी मुर्ख उनकी दिन-रात आरती करने वाली मीडिया होती है। देखकर लगता है, ये देश में दोनों की गृह युद्ध कराकर ही दम लेंगें !  लाख जहरीले बयानों के बाद उनका कुछ नहीं होता पर, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर सिर्फ व्यंग करने पर गिरफ्तार कर लिया जाता हूँ! क्योकि मैं नेता नहीं हूँ.

इसलिए कमी महसूस होती है नेता न होने की! क्योकि अगर मैं नेता होता तो मेरी हर बात हर अफसर को माननी पड़ती!  कभी किसी लाइन में इंतज़ार नहीं करना पड़ता!  एक बार जनता के आगे सर झुका लेने से 5 सालों तक जनता मेरे आगे सिर झुका कर खड़ी रहती!  कभी पैसे को लेकर चिंता नहीं होती,   लूटा हुआ  पैसा काफी होता मेरे दो पीढ़ियों के लिए!  मंदिरों में आसानी से मिनटों में दर्शन करके भगवान को खुश करने का ढोंग कर चला आता!  रास्ते में पुलिस भीड़ पर लाठियाँ बरसाकर मेरे लिए रास्ता बना रहा होता! घर पर डॉक्टर चले आते, घर बैठे वकील कोर्ट में मेरा केश लड़ लेता और मीडिया मेरे एसी गाडी के पीछे लोहिया की तरह मुझ जैसे क्रांतिकारी के विचार जाने के लिए पीछे भाग रही होती!  काश, ऐसी अय्याशी कर पाता तो जीते जी यही धरती मेरे लिए स्वर्ग बन जाती!

लेकिन मैं कभी-कभी बहुत खुश हो जाता हूँ की मैं नेता नहीं हुँ....  क्योंकि इसके लिए मुझे किसी मजहब के लोगों के तलवे चाटने पड़ते,  नेता बनने के लिए हत्याएं करनी पड़ती, काला धन बनाना पड़ता,  बड़े नेताओं की चापलूसी करनी पड़ती, तभी तो उम्मीदवार के रूप में चुना जाता!  मैं खुद पर गर्व करता हूँ की मैं ऐसा नागरिक हूँ जो किसी की बेड़ियोँ में नहीं जकड़ा, खुलेआम सवाल उठाता हूँ और स्वछन्द लेखन करता हूँ ....

लेखक:- अश्वनी कुमार, पटना जो ब्लॉग पर 'कहने का मन करता है…'(ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं.पेज पर आते रहिएगा



Friday, 9 October 2015

पुलिस बर्बरता का शिकार बनती निर्मम जनता…

खाकी रंग की वर्दी, लाल बेल्ट, लाल-लाल जुटे, उड़े हुए बालों को ढँकने की नाकाम कोशिश करती उनकी टोपी, कंधे पर अंग्रेजी हुकूमत की याद दिलाती बंदूकें व जनता की आवाज को कुचलने वाली लाठियां लेकर खटारे जीप में चलने वाली बिरादरी को हम पुलिस के नाम से जानते हैं। इनकी कृपा से बहुत सारे ठेले-रेहरीवालों के लिए दो वक्त की रोटी का इंतज़ाम हो जाता है। बदले में उन्हें या तो रोज़ाना दुकान का सामान खिलायेगा या हफ्ता देगा!  यही नहीं इनकी असली कमाई तो पैसे लेकर अपराधियों को छोड़ दिए जाने से ज्यादा सड़क पर वाहनों की जांच से ही होती है। लोगों के निर्मम चेहरे देखकर उनकी गाड़ियाँ रोकने के बाद उसकी चाभी निकल ली जाती है, जबकि मोटर वाहन अधिनियम में गाडी की चाभी को हाथ लगाने की सख्त मनाही है। उसके बाद लाइसेंस के नाम पर तो प्रदुषण के नाम पर नागरिकों को परेशान करके मोल-भाव किया जाता है और ये पैसे सरकार के पास जाने की जगह पर सीधे उनके पेट में चली जाती है। कुछ वक्त पहले तो U.P. में नकली रसीद छपाकर करोड़ो गबन का मामला सामने आया था।

Image result for POLICE lathicharge imageपर, महत्वपूर्ण सवाल ये है की आखिर गरीब, निर्दोष और निर्मम लोग ही पुलिसिया ज्यादती का शिकार क्यों होते हैं?  केश, मुक़दमे का सबसे ज्यादा शिकार देश का मध्यम वर्ग ही होता है। आपराधिक मामलों में पुलिस जांच, अपराधी को कम तथा पीड़ित को ज्यादा दुःख देने वाली होती है। अक्सर कोई घटना होने के बाद सबूतों को सुरक्षित करके पहले अपराधी का पक्ष जानना चाहिए ताकि शुरुआती स्तर पर ही मामला साफ हो सके। लेकिन वर्त्तमान पुलिस नियमों से ठीक विपरीत पहले पीड़ित का बयान लेती है और अक्सर उसे डरा-धमकाकर मामला वापस लेने का दबाव बनाती है। उसके बाद अपराधी को थाने बुलाने की सूचना किसी तीसरे व्यक्ति से दिलाती है। ऐसा क्यों? कौन अपराधी खुद चलकर पुलिस थाने आएगामतलब वहां भी मोल-भाव वाली स्थिति पैदा होती है, केश कमजोर करने के इतने और न पकड़ने के इतने । है ना!
मैंने अबतक सड़क पर किसी लाल-पीली बत्ती लगी गाड़ियों को हाथ मारते किसी भी पुलिसकर्मी को नहीं देखा। हाईप्रोफाइल मामलों में पुलिस की किस तरह से पसीने छूटते हैं, वो जगजाहिर है। तो क्या नियम, कानून के बाद अब पुलिस भी सिर्फ अमीरों के लिए है? लगता तो ऐसा ही है, क्योकि 1857 की स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेज़ों ने police act बनाया ताकि भविष्य में ऐसे आन्दोलनों को दमनतापूर्वक दबाया जा सके। और आजादी के इतने सालों के बाद भी वही कानून बिना रोक-टोक के चल रहा है, सरेआम निहथ्थी भीड़ पर लाठियां चला दी जाती है। हालत ये हैं की पुलिस की बर्बरता का शिकार होने से रोकना तो दूर इन ठेले वालों, झुग्गी-झोपडी वाले गरीबों को कोई पूछता भी नही। अतिक्रमण हटाने के कोर्ट के आदेश के बावजूद भी बिल्डिंगों का बाल भी बाँका नहीं होता क्योकि वे सुप्रीम कोर्ट से स्टे हैं। पर इन गरीबों के लिए सुप्रीम कोर्ट स्थानीय प्रशासन ही होता है और उनका आर्डर सर्वोपरि!  सड़क किनारे भुंजे बेचने वाले, जूते सीने वाले और सब्जी बेचने वाले इनकी लाठियाँ बहुत आसानी से सह लेते हैं, क्योकि गरीबी के रेगिस्तान में जगह-जगह कैक्टस की तरह उगे अमीरों को देखकर भी ही हमारी सरकार अमेरिका को पीछे छोड़ देने के सपने देख रही हो पर, इन गरीबों के लिए यही लाठियाँ उनके लिए रोटी का भी इंतज़ाम करती है.

गंभीर अपराधों और घोटालों की जांच के राज्य पुलिस के ज्यादातर रिकॉर्ड यही बताते हैं की पुलिस बड़े ठंढेपन और टरकाउ अंदाज़ में जांच करती है। और यदि मामले का जुड़ाव सत्ताधारी पार्टी से हो तो पुलिस का लक्ष्य अपराधी का पता लगाना नहीं बल्कि किसी खास को आरोपों से बचाना होता है। मध्य प्रदेश में व्यापम, बिहार में दवा घोटाला, धान घोटाला इसके उदाहरण हैं।  पिंजरे में  बंद तोते का ख़िताब हासिल कर चुकी CBI की साख अन्य एजेंसियों से कुछ बेहतर तो जरूर है, इसलिए हर मर्ज की दवा में CBI की मांग की जाती है। क्योकि वर्त्तमान पुलिस जनता के प्रति कर्तव्यपरायण होने के स्थान पर अपने वरिष्ठ अधिकारीयों और नेताओं के स्वामिभक्त भक्त अधिक होते हैं।  राज्यों की पुलिस की साख इतनी ख़राब हो चुकी है की कहीं दंगा हो जाए तो तुरंत सेना बुलाने की मांग की जाने लगती है। क्योकि वही डर यह भी होता है की स्थानीय पुलिस राजनीतिक पहुँच वाले अपराधियों को पकड़ने के बजाये उन्हें बचाने की कोशिश करेगी। ऐसे में स्थानीय चुनौतियों से निपटने के लिए राष्ट्रीय संसाधन का हमें उपयोग करना पड़ता हैं जो की पुलिस की लचर कानून व्यवस्था से ही उत्पन्न होती है।

जाहिर है, देश में पुलिस सुधार को लागू किये बिना व पुलिस को राजनीतिक हस्तक्षेपों से मुक्त किये बिना पुलिस बर्बरता का शिकार बनती निर्मम जनता को सिर्फ कानून के सहारे बचाना मुश्किल है.....
           
          "वर्दी का धौंस दिखाने वाले अंदर से उतने ही corrupt होते हैं..... 
          जितने भीड़ से पत्थर दिखाते ही भाग खड़े होते है.…"


लेखक:- अश्वनी कुमार, पटना जो ब्लॉग पर 'कहने का मन करता
है…'(ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं.पेज पर आते रहिएगा