Monday, 30 November 2015

आमिर, जानते हो देशभक्ति क्या होती है?

आमिर, तुने देश के लिए क्या किया? क्या अपने किसी बेटे को सीमा पर भेजा? कभी किसी आपदाओं में जाकर मदद की? देश के लिए अपना क्या खोया? तुम्हारी बेगम जो अब तुम्हें ये देश छोड़कर जाने को कहती है उससे जरा जाकर पूछो तो की असहिष्णुता का इतिहास किसकी रगों में है? ‘अतुल्य भारत’ का विज्ञापन करते हो, विदेशियों को भारत आने को कहते हो, राष्ट्र की एकता की वकालत करते हो, सत्मेव जयते जैसे कार्यक्रमों से सामाजिक बुराइयाँ दूर करने का पाखण्ड दिखाते हो! लेकिन किसके लिए? इतने ही सहिष्णु हो, इतने ही सेक्युलर हो तो क्यों नहीं मुस्लिम महिलायों की बेहतरी के लिए आवाज उठाते हो? क्यों नहीं बुर्का प्रथा, खतना, बहुपत्नी विवाह जैसी घिनौनी कुप्रथायों पर कार्यक्रम बनाते हो? उस समय तुम्हारी सहिष्णुता कहाँ गयी थी, जब तुमने अपनी पहली पत्नी को छोड़ डाला था? क्या गलती थी उसकी? खुद को बड़ा देशभक्त बताते हो, लेकिन कभी इस दोहरे चरित्र की सजा मिली तुम्हे? नहीं! क्योंकि मुस्लिम पर्सनल लॉ है ना तुम जैसे स्वार्थी को बचाने के लिए!

आमिर, शायद तुम सहिष्णु होने का कभी अर्थ नहीं जान पाए| लगान, मंगल पांडे जैसी फिल्मों के सहारे जिस देश ने तुम्हें सिर-आँखों पर बिठाया, देशभक्त का दर्जा दिया, शोहरत दिलाई, बेसिर-पैर के फिल्मों पर भी जमकर पैसे लुटाये आज तुम्हारे लिए असहिष्णु हो गया है| उसका मुखर हो जाना तुम्हे डरा रहा है| देश समझ सकता है की इसके पीछे भले ही कोई राजनैतिक स्वार्थ हो, लेकिन भारत का इतिहास इससे परे है| आमिर, जानते हो, भारत वो देश है जिसने हजारों सालों तक तुम्हारी कौम (इस्लाम) की गुलामी झेली है| उसने बाबर से लेकर अकबर, जहाँगीर और जिन्दा पीर औरंगजेब के शासन तक चुपचाप सिर झुकाकर कोड़े खाए हैं| उसके बाद अंग्रेजों को झेला|  उसके पूजा स्थलों तक तो लुट लिया गया, तलवार के जोर पर सनातन धर्म छोड़ने पर मजबूर किया| लेकिन इनसब पर कभी तुम्हारे जैसे तथाकथित सच्चे देशभक्त का न सोचना, इनपर फिल्म न बनाना अपने आप में तुम्हारे लिए जबाब है|

आमिर, जरा अपनी बेगम से पूछ कर देश को बताओ की दुनिया में तुम्हारे बच्चों के लिए सबसे सुरक्षित जगह कौन सी है? पता है तुम्हें की अभी पेरिस में सिर्फ 129 मरें हैं लेकिन बात मुसलमानों को देशनिकाली पर चली गयी है| लेकिन भारत में इस्लाम के बन्दों ने जो अबतक हमलों में 80,000 जानें लेकर सहिष्णुता दिखाई है इसपर भी तो अपनी राय दो|  कभी जैन, बौद्ध, सिख क्यों नहीं कहते की उनपर अत्याचार हो रहे हैं| दुनिया में सबसे ज्यादा खुशहाल भारत में रहने वाले ‘पारसी’ हैं| इनपर कभी अत्याचार की ख़बरें क्यूँ नहीं गूंजती? क्योंकि इन धर्मों का मिशन साम्राज्य विस्तार नहीं है| कभी समय मिले तो इराक या सीरिया में जाकर मकान देख आओ! या फिर सऊदी अरब तो है ही, बेगम को घुमाकर दिखा दो की महिला आजादी क्या होती है? सहिष्णुता क्या होती है?  बहुत मज़ा आता है न तुम्हें हिन्दू देवी-देवताओं का मजाक उड़ाने में| कभी कुरान का मजाक उड़ाकर देखो, तब तुम्हारे ही सहिष्णु लोग तुम्हें बताएँगे की असहिष्णुता क्या होती है?

Image result for aamir intolerance imageकश्मीर से चार लाख हिन्दुओं का सबकुछ लुटा जा रहा था, तब तुम कहाँ थे? जब कश्मीरी पंडितों का कत्लेआम हो रहा था, उनके घरों पर इश्तेहार चिपकाये जा रहे थे, उनकी इज्जत लुटी जा रही थी, तब तुम्हारी जुबान क्यों सिली थी? इनसब पर कभी तुम्हारी जुबान खुली? तब क्यों नहीं असहिष्णुता के विरोध में किसी ने पुरस्कार लौटाए थे?  मैं बताता हूँ की देशभक्ति क्या होती है| पिछले दिनों कश्मीर में शहीद हुए कर्नल संतोष महादिक की पत्नी ने अपने दो नन्हें बेटों को सेना में भेजने की घोषणा की| जबकि तुम जैसा स्वार्थी इंसान इतनी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद भी अपने बेटे की चिंता कर रहा है| तुम और शाहरुख़ जैसे इन्सान की सोच किस प्रवृति की देने है, सब जानते हैं|

आमिर, सहिष्णु तो हिन्दू हैं, क्योंकि “हर पीर फ़क़ीर कोठी में, राम हमारे तम्बू में” फिर भी अगर तुम्हें हिन्दू युवाओं का सर उठाकर चलना, मुखर होना या हर धर्म के साथ आँख से आँख मिलाकर व्यवहार करना असहिष्णुता है तो तुम अपने रहने न रहने के फैसले कर ही डालो| इस देश का इतिहास, उसकी विविधता तुम्हारे विचारों की मोहताज़ नहीं... क्योंकि इंसानियत के तराजू पर दोनों पलड़े बराबर होते हैं...      हंसी आती है की सहिष्णुता हमें वो सिखा रहा है जिसके धर्मं ने विरोध के डर से ईशनिंदा कानून बना रखा है...

लेखक:- अश्वनी कुमार, पटना जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’(ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... आते रहिएगा...


बच्चों का बिगड़ता बचपन

एक जमाना था जब बच्चे नानी-दादी की गोद में परी कथायों की रंगीन दुनिया में खो जाते और नींद में ही बुन लेते सपनों का एक सुनहरा संसार| एक अजीब सा वक्त, जिसमें न कोई फिक्र न कोई गम और न ही किसी की परवाह| याद है, जब हम हम बच्चे थे तो उस समय की मौज-मस्ती दुनिया की सारी खुशियों से भी ऊपर है| दादा का दुलार, दादी का प्यार और मम्मी-पापा की दी हुई आजादी का मोल नहीं लगाया जा सकता| हाँ, लेकिन जब उस दौर को याद करता हूँ तो उसे वापस पाने की चाहत में दिल रो जाता है|  कहाँ आ गया हूँ मैं? काश! वो वक्त वहीँ ठहर जाती...

बेशक, लेकिन अगर हमारी 15 साल पहले की सामाजिक स्थिति की आज से तुलना करें तो काफी कुछ बदला दिखता है| लोगों का स्वभाव, उनका व्यव्हार, उनकी जरूरतें सबकुछ बहुत तेजी से बदला है| कह सकतें हैं की जब देश बदल रहा है, समाज बदल रहा है, लोग बदल रहें हैं तो ऐसे में स्वाभाविक है की बच्चे का स्वाभाव, उनका व्यवहारसबकुछ बदलेगा ही| कुल मिलाकर आज के बच्चों की कोई तुलना ही नहीं है| टेलीविज़न, सिनेमा और इन्टरनेट की इस दुनिया में बच्चों की मासूमियत कहीं गम सी हो गयी है| स्कूल से घर आने पर दादा की आँखें तरसने लगी है, अपने पोते की मासूम कारनामों को देखने की| अब कोई बच्चा अपनी दादी से कहानियां सुनाने की जिद नहीं करता| जानते हैं क्यों?  आज की आधुनिकता की दौर में फंसे परिवारों में दादा-दादी अप्रासंगिक हो गए हैं| शहरी नौकरीपेशा परिवारों में तो लोग बड़े परिवार के साथ रहे से परहेज़ करने लगे हैं| चाचा-बुआ जैसे संबंधों को बच्चे नाम के अतिरिक्त ज्यादा कुछ नहीं समझ पाते!

इन सब से ठीक उलट इन बच्चों ने अपनी एक नई दुनिया बसा ली है| उनका दुनिया-जहाँ है, मार-काट से भरे कंप्यूटर गेम्स, उलुलजुलुल के कार्टून्स और बेसिर-पैर के भद्दे फ़िल्मी गीत| जाहिर सी बात है, इससे न तो उनका शब्द सामर्थ्य बढ़ना है और न ही बौधिक विकास होना है| हालात ये हैं की आज के बच्चों से किसी पौराणिक चरित्र का नाम पूछिये तो बगलें झाँकने लगेंगे, लेकिन किसी कार्टून कैरेक्टर या किसी फ़िल्मी हीरो का नाम पूछिये तो वह उनकी जुबान पर ही रखा होगा|  यह बदलाव कहाँ से आया? यह बदलाव उस माहौल, उस परिवेश से आया है जिसमें आज के बच्चे पल रहे हैं| उनके माँ को रसोई से और बचे टाइम में सास-बहु सीरियल के अलावा फुर्सत ही नहीं है, जबकि उनके पिता जिन्दगी के भागदौड़ में अक्सर व्यस्त ही रहते हैं| आजकल के पेरेंट्स बच्चे को अच्छे अंग्रेजी मीडियम स्कूलों में दाखिला दिला देने को परिपूर्ण मान लेते हैं| कितने ऐसे पेरेंट्स हैं जो स्कूल से आने के बाद बच्चे की कॉपी चेक करते हैं? कितने ऐसे पेरेंट्स हैं जो बच्चे की हरकतों पर नज़र रखते हैं की उनका बच्चा क्या खा रहा है, क्या देख रहा है? कहीं वो किसी गलत संगत में तो नहीं पड़ गया? लेकिन इसकी हकीकत बहुत ही निराशाजनक है...

अक्सर देखा जाता है की बच्चे स्कूल से घर आते ही हाथ में रिमोट लेकर कार्टून देखने में लग जाते हैं| आजकल के पेरेंट्स अपने बच्चों की बिगड़ी बातचीत की भाषा से खासे परेशान हैं| वे कार्टून कैरेक्टर्स को पूरी तरह से अपना लेते हैं और बोलचाल में कार्टून चरित्र वाली ही लहजे का इस्तेमाल करते हैं| जिद्द पूरी करने के लिए डोरेमोन, निंजा जैसे बेवकूफाना हथकंडे अपनाते हैं और न मानने पर उन चरित्र जैसा मुंह भी बनाने लगे हैं| कुल मिलाकर ये सारी चीजें बच्चों के बालमन में घुसपैठ करके पूरी तरह हावी हो चुकी है, जो एक गंभीर संकेत है|  ऐसे में बेहतर होगा की अभिभावक इन चीजों पर पाबंदी लगायें और मनोरंजन के तौर पर साथ बैठकर उन्हें वही चीजें देखने को प्रेरित करें जो उनके भविष्य निर्माण के लिए सार्थक हो| अगर ऐसा नहीं होता है तो कहीं न कहीं बच्चों के बिगड़ने का जिम्मेदार उन्हें ही माना जाएगा| दो-तीन साल के बच्चे जो टीवी-सिनेमा की इस आधुनिक दुनिया में रहते-रहते इस कदर आधुनिक हो जाते हैं की अगर उनके सामने गुडिया और खिलौना रिवाल्वर रख दिया जाए तो वो रिवाल्वर को उठाता है|

नतीजा क्या हो रहा है? उनका बालमन बदल रहा है, उनका मानस बदल रहा है, उनकी मासूमियत छीन रही है और उनका व्यवहार भी उनकी उम्र जैसा नहीं रहा| ये इस बात का संकेत है की आनेवाली जो पीढियां हमें मिलने वाली है उसमें हमारे गुण-दोष से कई गुना ज्यादा समाहित होगी| इसलिए चाणक्य ने कहा था की 6 साल तक अपने बच्चे को खूब प्यार करो, 6 से 12 साल तक कठोर अनुशासन सिखाओ, 12 से 15 तक सारे संस्कार बताओ उसके बाद मित्रवत व्यवहार करो... (जो आज काफी हद तक सही भी लगता है...)

लेखक:- अश्वनी कुमार (मैंने इस ब्लॉग में जो भी बातें लिखी है वो मेरी आम धारणा है, जैसा की मैं
अपने आसपास के तथाकथित आधुनिक और कम उम्र के सयाने बच्चों की हरकतें देखता हूँ| .... और मेरा बचपन भी चाणक्य के आदर्शों पर कठोर अनुशासन में गुजरा है इसके लिए मैं अपने अभिभावकों का शुक्रगुजार हूँ जिन्होंने मुझे अन्धी कर देने वाली इस चकाचौंध दुनिया से बचा लिया...)


Sunday, 29 November 2015

ISIS की मंशा क्या?

पेरिस में जो कुछ हुआ उसने पूरे संसार को झकझोर दिया| ऐसा नहीं है की फ्रांस की कोई बड़ी आबादी हताहत हुई| उससे कई गुना ज्यादा मौतें विभिन्न आतंकवादी हमलों में हमारे देश में हो जाती है| लेकिन कोई हल्ला नहीं मचता, क्योंकि हमारी ख़ुफ़िया व रक्षा प्रणाली पश्चिमी देशों की तुलना में काफी कमतर है| यूरोपीय ख़ुफ़िया एजेंसी की साख पर सवाल उठने लगे हैं| फ़्रांस दुनिया का सबसे सहिष्णु राष्ट्र माना जाता है| उसने बड़ी तादाद में सीरिया व तुर्की से आये शरणार्थियों को पनाह दी, उदारता दिखाई लेकिन उसका यह परिणाम? वाकई झकझोर देता है!  इस्लाम का इतिहास रहा है की वे जहाँ रहते हैं, उसके आसपास के माहौल को अपने जैसा थोपने की जुर्रत करते हैं| फ़्रांस में बुर्के पर पाबंदी है, पर वे चाहते हैं की सारे लोग बुर्के पहन कर घूमें, लोग ईद मनाएं, कुरान से चलें, शरियत को मानें| ऐसा नहीं होता! ISIS का जन्म अमेरिकी-इराक नीतियों से हुआ है| दुनिया भर में अपनी युद्ध अर्थव्यवस्था को फलने-फूलने के लिए अमेरिका ने ही अलकायदा को पनपने दिया, ISIS को खूंखार होने दिया| अब क्यों डर रहे हो? जाओ किसी और देश की राजनीतिक, आर्थिक आजादी ख़त्म करके एक और आतंकी संगठन को जन्म दो!


अमेरिका के जवान हवाई जवान हैं| वह अपने सैनिकों को जमीन पर उतारने से घबराता है| ड्रोन,Image result for missile image मिसाइल, लड़ाकू विमानों से बमबारी करके ISIS को ख़त्म नहीं किया जा सकता| चूँकि सीरिया व इराक के जिन रिहाइशी ठिकानों पर इस्लामिक स्टेट का कब्ज़ा है वह जगह बेहद संकीर्ण है, पेड़-पौधों व जंगलों से भरे पड़े हैं| उनके लड़ाके जेहादी गतिविधियों में कितने परिपूर्ण हैं ये पेरिस की घटना से पता चलता है| अमेरिका, रूस और फ़्रांस तीनों को इस्लामिक आतंक का डर 9/11 के बाद फिर से एहसास होने लगा है, उनकी घबराहट बढ़ी है और बेचैनी में उनके ठिकानों पर ताबड़तोड़ हवाई हमले कर रहे हैं| ये बेचैनी अब क्यों? 26/11 के वक्त कहाँ थे? क्यों नहीं तब पाकिस्तानी आतंकवादी ठिकानों को नष्ट करके आतंकवाद को कमजोर करने का प्रयास किया? पेरिस में तो 129 मरे, लेकिन भारत में अबतक 80 हज़ार से ज्यादा मौतें आतंकी हमलों में हुई है, क्या अमेरिका को यह नहीं पता की इनसब का सूत्रधार कौन है?


अभी हाल तक अमेरिका की विभिन्न देशों की धार्मिक आजादी पर नज़र रखने वाली एजेंसी कह रही थी की ‘भारत में असहिष्णुता बढ़ रही है’| ओबामा ने भी सौहार्द की अपील की थी| पर अब क्यों कह रहें है की इस्लाम आतंकवाद का पर्याय है| (इससे ओबामा भी हमारे सेक्युलर नेताओं की नज़रों में सांप्रदायिक हो ही गए होंगे)इस्लामिक स्टेट जिहाद के नाम पर अपने कट्टर लड़कों के साथ दुनिया भर में इस्लामी राज्य का डंका बजा रहा है| काले झंडे लेकर इस्लाम के बन्दों का नेतृत्व कर रहा बगदादी किस्म-किस्म के सेनानियों के साथ समूचे विश्व का इस्लामीकरण कर देने का सपने को लेकर आगे बढ़ रहा है|  ISIS की इस बर्बर मानसिकता का खामियाजा किसे भुगतना होगा? इस्लाम को ही!  क्योंकि फ़्रांस एक बार फिर मुसलमानों को पनाह देना बंद कर देगा| उसकी ऐसी हरकतों का खामियाजा दुनिया भर के मुसलमानों को भुगतना पड़ेगा| तमाम देश मुस्लिमों को आने की अनुमति नहीं देंगे, मदरसों को बंद कर दिया जाएगा, मस्जिदों में तक पाबंदी लगाई जा सकती है| अगर इसके बाद भी हालात बेहतर नहीं हुए तो संभव है की पश्चिमी देश मुसलमानों को देश से भगा देने को बाध्य हो जाएँ! और इसका अनुसरण बहुत सारे देश कर सकते हैं|

ISIS भारत में इस्लामी राज्य कायम करने की इच्छा जता चूका है| और बगदादी के लिए तो भारत बेहद सॉफ्ट टारगेट है| यूँ सैकड़ों को लाइन में खड़ा करके गोली मार देना... शरीर में बम बांधकर उड़ा देना, सरेआम गला रेत देना... सोंचकर काँप जाता हूँ!  भारत में आसान भी है, उनकी मदद के लिए है ना हमारी सरकारी की चुनावपरस्त नीतियाँ, निकम्मे अफसर और राजनेताओं की सेक्युलर विचारधारा!  बेशक, हम तो काफी पहले से ही कश्मीर के नाम पर आतंक झेल रहे हैं| बस कमी है तो बगदादी का भारत आकर इस्लामी राज की डुगडुगी बजाने की... क्योंकि जबतक दुश्मन दरवाजे तक नहीं आ जाता, हमें विश्वास ही नहीं होता की खतरा सही में है... यही दिल्ली का इतिहास रहा है... 

लेखक:- अश्वनी कुमार, पटना जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’(ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... आते रहिएगा...


Tuesday, 24 November 2015

लालू के ‘लाल’ करेंगे विकास!

चुनाव के नतीजे आये और सबको पता चला की लालू के दोनों लाल मंत्री बनेंगे, एक तो उपमुख्यमंत्री! पता है, क्या गुज़र रही थी उन लाखों युवाओं के दिल पर जिसने जी-तोड़ मेहनत करके तमाम डिग्रियां हासिल की है, एक सरकारी नौकरी के लिए योग्यता के बावजूद भी कितनी भाग-दौड़ करनी पड़ रही है? सभी आहें भर रहे थे, काश मेरा भी बाप ‘लालू प्रसाद यादव’ होता!

                     
यही होता है लोकतांत्रिक राजनीति में जब मतदाता अपना मत वंशवाद, जातिवाद के नाम पर देकर लोकतंत्र की हत्या कर देता है| बिहार की जनता को अब संभलना होगा, जागना होगा लेकिन मौका तो 5 साल बाद ही आएगा| जनता जानती थी उसके फैसले के बाद कौन है जो उनपर राज करेगा? कौन आईएस, आईपीएस जैसे अधिकारियों से अपनी सलामी ठुकवायेगा, फिर भी हद है!  बिलकुल साफ़ है की नेताओं वाली मौकापरस्ती के गुण जनता में भी आ गए है| वो आलसी हो गयी है| सच जानने के लिए मीडिया पर आधारित हो गयी है| उसे अपनी जागरूकता का अहंकार हो गया, नहीं तो उसके फैसले से इतने ख़राब-ख़राब नेता कैसे चुन लिए गए?  इसलिए की, उम्मीदवार के तौर पर तो नेता मतदाताओं के सामने सर तो झुका लेता है| लेकिन लोकतंत्र में जनता राजा है, फिर वो क्षेत्र में नेताओं के आने पर सख्त सवाल करने के बजाए उसके सामने पूरे 5 साल सर क्यों झुकाती है? उसके पीछे-पीछे चाटुकारों की तरह झंडे लेकर नारेबाजी करने वाला लोकतंत्र का एक जीता-जागता गुंडा है जिसे पोषित करने वाले भी वही नेता हैं, जो कैमरे पर लोकतंत्र की तोता-रटंत जुमले सुनाता है|

लालू के एक लाल नीतीश जैसे तेजतर्रार नेता को बिहार की आर्थिक, सामजिक हर फैसले में उन्हें अपनी सलाह देंगे| वाकई, एक नौवीं पास युवा उपमुख्यमंत्री क्यों नहीं बन सकता? तेजस्वी या तेजप्रताप तो ये भी नहीं कह सकते की उन्होंने गरीबी देखी है इसलिए वे गरीबों का दर्द समझते हैं!  आखिर जनता ने उन्हें चुना है, जनता ने उनकी समझदारी, योग्यता में कुछ तो ऐसा जरूर देखा होगा!  क्योंकि अरस्तु ने पहले ही कहा था की लोकतंत्र मूर्खों का शासन है और मुर्ख भी उसमें सता के सर्वोच्य शिखर तक पहुँच सकता है| पहले मांझी और अब लालू के दोनों लाल ने उनकी बात को बल जरूर दिया है|  लालू के दुसरे बेटे तेजप्रताप को स्वास्थ-पर्यावरण मंत्रालय मिला है| क्या भाग्य है उनके डिपार्टमेंट के आला अफसरों की! यही मौका है, कर डालो सारे फायदेमंद फैसले, बेच डालो पेड़-पौधे और लकड़ियाँ! डर किस बात का, फैसले अंग्रेजी में लिखकर दो और हस्ताक्षर करा लो, उन्हें कौन सा हिंदी पढने आता है जो इंग्लिश समझेंगे!

Image result for vanshvaad imageराजनीति में वंशवाद जनता के लिए अभिशाप है तो नेताओं के लिए वरदान| बिहार की जनता देश में सबसे जागरूक मतदाता का स्थान रखती है, लेकिन उसकी ये छवि जातिवाद के चुंगल में फंसकर धूमिल होती जा रही है| बेटे-पोतों को सता दिलाने का इतिहास इन 66 सालों में काफी पुराना रहा है, पर इस चुनाव में जिस तरीके से जनता ने नीतीश को चुना, उनपर भरोसा दिखाया अगर इस दौरान राजद की तरफ से कोई भी ऐसी-वैसी बात हुई तो वो नीतीश पर कायम विश्वास को ले डूबेगी| बिहार ने 15 साल लालटेन के सहारे गुजारे, गुंडागर्दी झेली, अत्याचार सहा फिर भी उन्हें 10 साल जनता का विश्वास हासिल करने में लग गए| सवाल है, क्या नीतीश की बेदाग़ छवि उनकी सता वापसी करने में मदद दे गयी या बीजेपी का मोदी-शाह पर से जनता का उठता भरोसा?  बहुत सारे राजनीतिक विश्लेषण किये गए है, पर मेरा मानना है की बीजेपी की घटती लोकप्रियता का एक बड़ा हाथ नीतीश को जीत दिलाने में रहा है| क्योंकि लोकसभा चुनावों में बीजेपी तमाम जातिवादी आंकड़ों को दरकिनार करते हुए 180 सीटों पर आगे थी|

मोदी-शाह की घटती लोकप्रियता के अन्दर उनका अहंकार और हाईकमान प्रणाली है| जमीनी कार्यकर्ताओं से संपर्क टुटा है क्योंकि बीजेपी मिस कॉल से कार्यकर्ता जो बनाने लगी है... मोदी ये मान रहे थे की उनकी जीत गुजरात के विकास गाथाओं के नाम पर हुई है, लेकिन सच ये है की जनता कांग्रेस की कारनामों से खासी परेशान थी और मंहगाई जले पर नमक छिड़क रही थी| वैसे में पुरा देश खदबदाया हुआ था| मोदी की जगह कोई भी होता तो वो जीत जाता पर 282 सीट नहीं|  पूर्ण बहुमत हासिल करने के पीछे मोदी की हिन्दू-मर्द नेता की छवि का बड़ा योगदान रहा| बिहार में आकर घोषणाएं कर रहे थे, बोली लगा रहे थे, अमेरिकी यात्रा की कहानियां सुना रहे थे और व्यापार आसान बनाने की कोशिश कर रहे थे| जबकि लोगों को दाल चाहिए, टमाटर चाहिए, व्यापार नहीं जिन्दगी आसान चाहिए| मोदी को ये याद रखना होगा की 2019 में पुतिन, ओबामा या नेतान्याहू नहीं जिताने आयेंगे, बल्कि देश की जनता जिताएगी|

और... बिहार में महागठबंधन की सरकार चल रही है, स्वछन्द उड़ रहे नीतीश के पैरों में बेड़ियाँ लग चुकी है| जिसमें साइकिल चलाने की योग्यता वालों को विमान उड़ाने के लिए दे दिये गए है और सरकार में राहुल गांधी जैसे तेजतर्रार, ओजस्वी नेता के नुमाइंदे भी है... आगे क्या होगा, राम जाने...


लेखक:- अश्वनी कुमार, पटना जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’(ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... आते रहिएगा...

Saturday, 14 November 2015

प्रधानमंत्री जी मेरी भी सुनिए...

(प्रधानमंत्री जी को मेरा खुला पत्र... जिसे मैंने PMO को भेजा है...)

आपको मेरा प्यार भरा नमस्कार | आपके लिए मेरा यह पहला पत्र है| याद है, डेढ़-दो साल पहले आपका हर एक ट्वीट-शब्द करोड़ों नौजवानों में उम्मीद की ऊर्जा भर देती थी| करोड़ों दीवाने थे, जो आपकी एक आह्वाहन पर मर-मिटने को तैयार होते थे और बेशक आज भी है| लेकिन इतने दिनों में बदला क्या? वो जो आपकी फैन बना देने वाली कला 7RCR में जाकर गुम तो नहीं हुई पर, उसका रंग जरूर फीका पड़ गया है| जब आप प्रधानमंत्री बने तो लोगों ने ये उम्मीद पाली थी की आप जनता के पैसों की हो रही बर्बादी नियंत्रित करेंगे, लेकिन आपने उसे तवज्जो नहीं दी|  मन की बात में आपने लोगों से अंग दान की अपील की, जो मानवतावाद के अनुरूप है| लेकिन मेरे प्रिय प्रधानमंत्री जी आप देश के पथप्रदर्शक है, आपको सलाह देने के बजाय खुद की सारी शरीर दान करके 125 करोड़ देशवाशियों को ऐसा करने के लिए प्रेरित करना चाहिए था, लेकिन आपने ऐसा नहीं किया|  चुनाव जीतकर शपथ-ग्रहण के तुरंत बाद रेसकोर्स आवास भी ले लिए, जबकि अगर इसे ठुकरा कर साधारण नॉन-एसी बंगले में रहते तो जनता के पैसे से मौज कर रहे नेताओं-अफसरों को शर्म जरूर आती| क्योंकि चाणक्य ने कहा था “जिस देश का राजा महलों में रहता है उस देश की जनता झोपडी में रहती है” जो कटु सत्य है|  फ़िलहाल आप टीवी, रेडिओ के माध्यम से जनता को गैस सब्सिडी छोड़ने की पहल कर रहे है, लेकिन उससे पहले अपने 99% करोड़पति-अरबपति सांसदों से सरकारी खर्चा छोड़ने को तो कहिये| मुफ्त हवाई-यात्रा, मुफ्त रेल-यात्रा, नौकर, लक्जरी गाडी, बिजली, पेंशन, भता, संसद की सब्सिडी वाली कैंटीन का लाभ उठाकर सरेआम गरीबी का मजाक उड़ाना तो बंद कीजिये| फिर एक घर क्या करोड़ों घरों में चूल्हा यूँ जलने लगेगा|  क्योंकि कोई भी पार्टी गरीबों को तो टिकट देती नहीं, जो भी नेता चुने जाते हैं वे या तो अरबपति कारोबारी होते हैं या तो करोड़ों की रंगदारी वसूलने वाले तथाकथित जनसेवक!  प्रधानमंत्री जी, इन मुद्दों पर पहल तो करके देखिये, सब्सिडी छोड़ने वालों की संख्या इतनी हो जायेगी की आप गर्व से किसी देश में जाकर कह सकेंगे “मेरे यहाँ सब्सिडी नहीं लेने वालों की आबादी आपके बराबर है”|

मेरे प्रिय प्रधानमंत्री जी, कभी समय मिले तो सरकारी क्वार्टरों में रह रहे लोगों की ठाठ-बाट जरूर देखने जाइएगा| well furnished कमरे, शानदार भवन और यहाँ तक की बाथरूम में भी पंखे लगे होते है, लेकिन किसके पैसे से? क्या सरकार इनलोगों को मिल रही गैर-जरुरी सुविधायों में कटौती करके किसी गरीब की मदद नहीं कर सकती? सरकारी योजनायों का मजाक बनते तो बहुतों ने करीब से देखा है| लेकिन पर्यावरण समस्या का मजाक बनते आपने भी देखा है की दुनिया के प्रमुख देश कैसे एसी कमरों में बैठकर ग्लोबल वार्मिंग पर चिंता जताते है! लोगों को पर्यावरण का ज्ञान बांटने से पहले खुद ही पर्यावरण की जरूरतों का ख्याल तो रखें!

लोगों को आपकी आलोचना करते देखता हूँ तो मन दुखी हो जाता है, हाँ कईयों का राजनीतिक मकसद भी होता है, फिर भी आखिर देश का युवा आपको नेता जो मानता है| पर, आप भी चुनाव जीतकर युवाओं को भूल गये|  भूल गये की कैसे ये युवा रैलियों में आपके लिए धुप की परवाह किये बिना पलक-पांवड़े बिछा देता था, खंभों पर चढ़कर मोदी-मोदी के नारे लगाता था, वो भी किसी की परवाह किये बिना|  ये युवा कौन थे? ये कोई अरबपति के बेटे नहीं थे, न ही इनका बाप किसी फैक्ट्री का मालिक था और न ही ये अपनी नौकरी से छुट्टी लेकर आपके रैलियों में आता था|  ये सारे लोग जवानी से बुढ़ापे की ओर ढलता बेरोजगार तथाकथित युवा था और अब भी बेरोजगार ही है| ये युवा अबतक राजनीतिक इस्तेमाल कर लेने के बाद फेंका हुआ सा महसूस करने लगा है...| लगा अच्छे दिन आ जायेंगे, लेकिन कैसे? आपने सरकारी वेकेंसी ही बंद कर दी| स्किल डेवलपमेंट शुरू किया अगर विश्वास न हो तो गावों में जाकर पूछिये की क्या किसी को इसका लाभ मिला? जवाब मिलेगा, ये होता क्या है?  प्रधानमंत्री जी, अपना भारत दुनिया का सबसे युवा देश है और आपसे अपेक्षा है की चुनावी रैलियां या पार्टी पॉलिटिक्स की जगह युवाओं की बेहतरी का प्रयास करें तो इसके सार्थक परिणाम मिलेंगें| जो समय की मांग भी है...

संसद सत्र के दौरान कामकाज बाधित होना काफी विचलित करता है| किसी बेतुके से मुद्दे पर जनता का पैसा और वक्त बर्बाद किया जाता है| प्रधानमंत्री जी, जब सांसद अपने वेतन दो गुने तक बढाने की मांग करते हैं तो सत्र की अवधि भी दुगनी क्यों नहीं कर दी जाए?  जब अमेरिकी कांग्रेस साल में 200 दिन काम करती है, ब्रिटिश संसद 150 दिन काम करती है तो हमारे यहाँ 67 दिन ही क्यों? कामकाज बाधित करनेवाले सांसदों पर स्पीकर अपने अधिकार का उपयोग क्यों नहीं करती, जैसे आयरलैंड में मार्शलों द्वारा उपद्रवी सांसदों को उठाकर सड़क पर फेंक दिया जाता है| इसलिए की 150 में 20 दिन का एजेंडा विपक्ष ही तय करता है, यहाँ भी ऐसी व्यवस्था करके उसे अपनी भड़ास निकालने का पूरा मौका दीजिये|

सबसे महत्वपूर्ण चुनाव सुधार की बात है| आपको पता है की बिहार में आपकी पार्टी क्यूँ हार गयी? क्योंकि BJP ने पैसे वालों का टिकट दिए, गुंडों को टिकट दिए, जिसका उस क्षेत्र से कभी कोई सरोकार नहीं रहा| बहुत सारी खामियां रही, खैर जो भी हुआ उसमें सुधार की गुन्जाइश है|  जनता का आपके प्रति मोहभंग होने के बहुत सारे कारण है... उदाहरण के तौर पर कश्मीर जैसे अहम राज्य में आपने अलगावादी के साथ सरकार बनाई, फिर भी भारतीय झंडे को जलने और पाकिस्तानी झंडे को फहरने से नहीं रोक पाए, कश्मीरी पंडितों को फिर से बसाने का वादा ख्याली पुलाव जैसा लगता है, पाकिस्तान-चीन जैसे मसले पर शेर की तरह दहाड़ने वाला व्यक्ति मौन हो जाए, खुद में एक बड़ा सवाल है...  फिर भी तो आप संसद में मौन रहने के बजाए सच बता ही सकते हैं| विदेशों में जाकर अपनी महिमामंडन करना व काला धन पर आपका अति-उत्साही भाषण अलोकप्रियता का कारण रहा है| उनसब में 60 साल बनाम 5 साल का नारा, 60 साल बनाम 25 साल में बदलता दिख रहा है|

मेरे प्रिय प्रधानमंत्री जी, आप अपने चारों तरफ मौकापरस्त चाटुकारों से घिरें है, जिसके कारण ही मुश्किलें आ जाती है| और हाँ, ये राज्यसभा या विधानपरिषद वाले चोर दरवाजे को बंद करवाइए, क्योंकि जो सांसद या विधायक बनने की भी योग्यता नहीं रखता हो वो मंत्री कैसे बन सकता है...
और हाँ आज असहिष्णुता पर कुछ भी नहीं लिखूंगा... घबराइएगा नहीं, हम सारे आप के साथ हैं, बस आप इन मुद्दों को ध्यान में रखिये... क्योंकि किसी ने भी अबतक परमवीर चक्र या अशोक चक्र नहीं लौटाए हैं, जानते हैं क्यों?  क्योंकि ये चाटुकारों को नहीं मिलते...
(अब वक्त आ गया है की हम नेताओं को उनकी आँखों में आँखें डालकर उन्हें याद दिलाएं की हमें उन्हें किसलिए चुना है? उनसे काम की अपेक्षा है न की जनता का पैसा और वक्त बर्बाद करने की...)
                                 आपका विश्वासी
                              अश्वनी कुमार, पटना(बिहार)


                      

Monday, 9 November 2015

बिहार का जनादेश

कुल मिलाकर जाति का गठबंधन लड़ा भी और जीता भी। लेकिन मैंने पहले भी कहा था की BJP कोई दूध की धूलि नहीं है। जिस तरीके से उसने इस चुनाव में बे-रोक-टोक अपार धन का इस्तेमाल किया, उससे जनता का उनके साथ किया सुलूक सही भी लगता है।  पूरी केंद्रीय कैबिनेट का मैदान में उत्तर जाना, मुख्यमंत्री उम्मीदवार न घोषित करके मोदी चेहरे पर चुनाव लड़ना या सिर्फ चुनाव के लिए गाय, बकरी का इस्तेमाल की राजनीति बिहारियों को तस-से-मस कर दे, ये हो नहीं सकता।   हम ये मानते हैं की नितीश और लालू ने जातिवाद के दम पर जीत हासिल की, पर एक कोने में ही सही विकास मुद्दा था।  लेकिन, इनके झंड़े ढोने वाले कार्यकर्ताओं को गुस्सा उस वक्त भी आया था, जब बीजेपी ने मौकापरस्ती करके मांझी और पासवान जैसे मौकापरस्तों को साथ ले लिया। किसलिए?   जातिवाद के सहारे जीत हासिल करने के लिए।
Image result for nitish kumar poster imageबेशक, जनता में भी अब राजनेताओं वाली मौकापरस्ती आ गयी है।  नहीं तो उसके फैसले से तेजप्रताप जैसे नेता क्यों चुने जातेकुल मिलाकर बिहार की जनता ने एक का अहंकार चूर किया जो लोकतंत्र के बेहतर लिए बेहतर है और उनके लिए भी, जो ये समझते थे की हमने हिन्दू हृदय सम्राट नहीं बल्कि विकासगाथा के दम पर लोकसभा चुनाव जीती। तो ये उनकी भूल थी।  हेलीकॉप्टरों में उड़ने से बेहतर होता की खेतों से चलकर जाते, निर्धन बस्तियों से होकर गुजरते तो उनके लिए कुछ बेहतर जरूर कर पाते....  नहीं तो जनता राम नाम के भरोसे कब तक जिताएगी ....