Tuesday, 9 February 2016

शादियों में खाने का मज़ा...

मैं बचपन से ही शादी-पार्टियों में खाने का शौक़ीन रहा हूँ| बचपन में जब गाँव में रहता था तो वहां बाराती वालों के बाद गाँव-मुहल्ले को खिलाने का इंतजाम किया जाता था| जब तक काफी रात हो चुकी होती थी और मैं भी बुलावे का इंतज़ार करते-करते भूखे पेट ही सो जाता था| उस वक्त जनरेटर का इंतजाम संपन्न लोग ही करते थे, बिजली दूर की बात थी| टॉर्च के सहारे निमंत्रण स्थल तक पहुंचना तो साथ में लोटे में पानी लेकर जाना और जमीन पर पंगत में बैठकर गैस लाइट की रौशनी में पूरी-सब्जी खाना, इन सारी चीजों की अब कमी खलती है| क्योंकि आधुनिक जो हो गए हैं हम...

पत्ते की सौंधी खुशबु वाली प्लेट में पूरी-बुंदिया-सब्जी खाने की बात कुछ और ही है, लेकिन बचपन में लगभग हर एक निमंत्रणों में मुझे इसके और चटनी के अलावा कुछ नहीं मिलता था| तब मैं सोचता था की मैं भी एक दिन बड़ा होऊंगा और इनलोगों के जैसे मुफ्त में मिठाइयाँ खाऊंगा| (उम्मीद है की आप मुस्कुरा रहे होंगे...)

अब शादी-पार्टियों में वो बात नहीं रही| अब तो मैं बड़ा भी हो गया हूँ और अन्य भारतीय युवाओं की तरह मैं भी सौ रुपये देकर दो सौ का खाना चट कर जाने में यकीन रखता हूँ| फिर भी ऐसा नहीं है की निमंत्रण के दिन दोपहर से ही भूखे नहीं रहता हूँ, बेशक रहता हूँ और जमकर खाता हूँ| पेट भर जाने के बाद भी एक-दो बार और आइसक्रीम खा लेता हूँ, आखिर सौ रुपये वसूल तो करने ही हैं|

बताइए की मैं ऐसा क्यूँ न करूँ? जहाँ दो-तीन खाने के आइटमों से भी मेहमानों की तशरीफ़ रखी जा सकती है वहीँ अब हमारा समाज इस फ़ोकट के दिखावे के लिए जमकर पैसे बहा रहा है| मिडिल क्लास परिवारों की हालत है की जितना वो खाने पर खर्च करते हैं उससे कहीं ज्यादा सजावट पर खुद को लुटा देते हैं| समारोह संपन्न होने के बाद उनकी आर्थिक स्थिति क्या हो जाती है बताने की जरूरत नहीं| पता है आपको की एक रिसर्च में बताया गया है की लोग शादियों में जितना खाते हैं उससे ज्यादा जूठन फेंक देते हैं| और हमने तो इसे बार-बार महसूस किया है|

पश्चिमी सभ्यता के नाम पर फैशन और दिखावे की इस चकाचौंध में हमारा समाज अँधा होता जा रहा है| बहुत जरूरी है की हमें आगे आकर अन्न की इस बर्बादी को रोकने के लिए पहल करनी चाहिए ताकि किसानों की मेहनत का सम्मान हो, भूखे की तादाद कम हो| पर लोग मानेगें, इसकी कम ही उम्मीद है| नहीं मानेगें तबतक मैं दोपहर से ही भूखे रहकर इनलोगों को सौ देकर दो सौ का खाना चट करता रहूंगा....   ये मेरी प्रतिज्ञा है...

लेखक:- अश्वनी कुमार, पटना (किसी को मेरे लेख से बुरा लगे तो माफ़ कीजियेगा और अच्छा लगे तो तीन सौ वसूल कीजिये... क्योंकि सामाजिकता एक तरफ और पूरी-सब्जी अपनी तरफ...)

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