Friday, 11 March 2016

महिला हिमायती बनने का ढोंग मत रचो...

अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर देश और दुनिया के तमाम अखबार महिला सशक्तिकरण पर अपने विचारों के माध्यम से ढोंग रचाते नज़र आये| क्या अखबार, क्या मीडिया, क्या फेसबुक सब पर महिलाओं के लिए कसीदे पढ़े जा रहे थे, उनकी बेहतरी के लिए आवाज उठाने का दिखावा कर रहे थे| वैसे लोगों को भी आवाज उठाते देखा जो हर सुन्दर और हकीकत सी दिखने वाली प्रोफाइल पिक्चर पर फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजते है|  नेताओं की बात सुनी तो हर बार की इस बार भी लगा की अब हमारे भारत को महान बनने में देर नहीं लगेगी| लेकिन अगले चैनल पर गया तो मेरी सारी उम्मीदें हर बार की तरह इस बार भी धराशाई हो गयी, इसलिए की वो चैनल ये दिखा रहा था की एक बार दिग्विजय सिंह किस तरह से एक महिला सांसद को देखकर कह रहे थे की क्या टंच माल है| ये कुछ उसी तरह है की महिलाओं की बेहतरी का जिम्मेदार इंसान ही उसकी मजबूरी का फायदा उठाता हो, उसका नाम क्या बताना? नेता तो नाम से बदनाम हैं असली मज़ा तो दिन के उजाले में तोंद के सहारे कुकर्म छिपाने वाले अफसर उठाते हैं|

Image result for women protection india imageमहिलाओं की इज्जत करें, उसे आत्मनिर्भर बनाएं, उसे लड़कों की तरह आजादी दें या महिला सशक्तिकरण, आत्मनिर्भरता, आत्मसम्मान, समान वेतन, वर्किंग वुमन जैसे शब्द किताबों और नेताओं की जुबानों की शोभा बनकर रह गयी है| अपने आसपास के माहौल में इन सारी शब्दों का कभी कहीं इस्तेमाल होते ही नहीं सुना| पिछले दिनों मैं इंटरनेट पर नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकडें देख रहा था, उसमें मैंने महिलाओं के प्रति ऐसे-ऐसे अमानवीय अपराधों के आंकडें पाए जिसे देखकर मुझे यकीन नहीं हुआ की क्या वाकई कोई ऐसा कर सकता है? लेकिन यह सच है... देश में महिला सुरक्षा से सम्बंधित सैंकड़ों क़ानून हैं पर किस काम के? अगर ये कानून वाकई सख्त है और महिलाओं को शोषण से न्याय दिलाती है, उसे हर तरीके की आजादी देती है तो क्यूँ आज भी महिला उत्पीडन के मामले साल दर साल बढ़ते ही जा रहे हैं?

इससे क्या साबित होता है? यही की हमारी अदालत कानून के माध्यम से इन दुराचारियों के मन में खौफ पैदा करने में असमर्थ है| दोषी कौन है? महिलाओं को पुरुषों पर इल्जाम लगाने से पहले खुद में सोंचना पड़ेगा की उसकी ऐसी हालत समाज की किस मानसिकता का परिणाम है और किन-किन तरीकों से उससे निजात पायी जा सकती है| महिला अधिकार के लिए संघर्ष कर रही वीरांगनाओं को सोंचना होगा उसे कुछ करना होगा| सबसे पहले अपने नीति-निर्माताओं को जबाबदेह बनाना होगा, उससे पूछना होगा की किसकी अनुमति से और किस मानसिकता से वे लोग विज्ञापनों में महिला बदन की नुमाइश करते हैं? अंग प्रदर्शन की इजाजत देते हैं ताकि आने वाली पीढ़ी का लक्ष्य लड़की पटाना हो?

आजकल की लडकियां भी कुछ कम नहीं| आधुनिकता की दौर में अंधे होकर वे भी मॉडर्न बनना चाहती है सुन्दर दिखना चाहती है जहाँ पब है, शराब है, नशा है, प्यार है, शक है तो धोखा भी है| जिस पश्चिमी सभ्यता का वो अन्धानुकरण कर रही है वहां की लड़कियां इस ब्लैक होल से बाहर निकलने के लिए भारत की तरफ देख रही है, जहाँ 85% से अधिक विवाहों का अंत तलाक है| अलग-अलग राजनीतिक मांगों के लिए अक्सर हाथ में तख्ते लेकर प्रदर्शन करने वाली महिलाओं को कभी ये क्यूँ नहीं सूझता की समाज में टीवी और फिल्मों में अश्लीलता जघन्य अपराधों की मूल जड़ है| ये सभी चीजें लड़कों को लड़कियों से कुछ पाने के लिए प्रेरित करते हैं, एक मकसद तैयार करते हैं जिसमें डर और शर्म जैसी कोई बात ही नहीं होती|

महिला हिमायती बनाने का ढोंग रचाने वालों से मुझे सख्त नफरत है, उससे भी ज्यादा उन लड़कियों से, जो सुन्दरता को अपना हथियार बनाकर अपना उल्लू सीधा करती है, लोगों को ठगती है, उसे बेवकूफ बनती है वही उसे गलत रास्ते पर लेकर जाने की जिम्मेदार होती है| चाहे बात पहनावे की हो या लोगों को हुस्न की आजमाइश करके रिझाने की| इनसब को ठोकर लगती है तो ठीक है फिर भी उन मासूमों की क्या गलती है जिसे दुनिया की समझ नहीं| अगर लोगों के मन में कानून का तनिक भी खौफ होता तो वो ऐसी हरकतें करने से पहले सौ बार सोंचते| शायद ये लोग इसलिए नहीं डरते क्योंकि इन्हें पता है की पेट किसका नहीं होता और भूख किसे नहीं लगती...  और यहाँ तो डाल-डाल पर भूखे ही बैठे हैं...
                                                             
लेखक:- अश्वनी कुमार, पटना जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’(ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...


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