Wednesday, 14 December 2016

मन की चंचलता...

           इस दुनिया की फिजाओं में, प्रकृति की गोद में,

          उसकी तन्हाइयों में चले जाने का मन करता है|

                भक्ति रस की अनमोल धाराओं में,

         राम-कृष्ण के भावनामृत में बह जाने का मन करता है|

                 फूलों से भंवरों की मोहब्बत में,

          मेघ से मोर की ख़ुशी में ढल जाने का मन करता है|


    
  पर क्या करूं जीवन-बंधन के मोह में, घर-परिवार की खुशियों में,

कुछ क्रांतिकारी सा ना कर पाने का दर्द आप सब से बांटने का मन करता
                          है...      
           

इसलिए ही शायद कुछ कहने का मन करता है...


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