Saturday, 30 April 2016

फिल्मों की अंधी दुनिया

फ़िल्मी दुनिया का ग्लैमर मायानगरी से दूर रहनेवाले लोगों को बहुत सुहाती है| खासकर के युवाओं को इस दुनिया में रचने-बसने और इसे करीब से देखने का सपना होता है| लेकिन एक पुरानी कहावत है की ‘दूर का ढोल सुहावन होता है’, यानी जो चीज हमारे पास नहीं होती या हम से दूर होती है वो बहुत आकर्षक लगती है| ठीक इसी तरह फिल्म इंडस्ट्री की मायानगरी मुंबई बाहर से जितनी आकर्षक दिखती है, अन्दर से है उतनी ही घिनौनी| एक्टिंग के नाम पर प्रतिभा का शोषण, झांसा, प्यार-मोहब्बत या धोखा होना वहां आम बात है| एक आम इंसान फ़िल्मी दुनिया का चमकता सितारा बने, डायरेक्टर-प्रोडूसर के आँखों का तारा बन जाए तो समझ लेना चाहिए की उस अदाकार या अदाकारा ने जिन्दगी की हर सही-गलत बातों का मूल्य चुकाया है|

बगैर फ़िल्मी खानदान के सिर्फ एक्टिंग के दम पर बॉलीवुड में धाक जमा पाना अपवाद की श्रेणी में आता है| ग्लैमर की चमक में युवा प्रतिभा गुम सी होती जा रही है| रंगमंच या नाटक अकादमियों में प्रस्तुति देने वाले अदाकार या अदाकारा बॉलीवुड के तमाम नामी-गिरामी एक्टरों से उनकी एक्टिंग की गुणवत्ता काफी अच्छी दिखती है| रंगमंच के कार्यक्रमों में भावपूर्ण अदाकारी बेहद मुश्किल दिखती है| बेहतरीन टाइमिंग, अर्थपूर्ण भाव या शाब्दिक मर्यादा उसे और बेहतर बना जाती है| जहाँ गलती की गुंजाइश भी न के बराबर होती है| इसलिए भी की वहां न तो रिसुट या रिटेक की कोई गुंजाइश होती है और न ही उनकी प्रतिभा को कैमरे का कमाल कह सकने की कोई शंका| रंगमंच की कला समाज का हर अच्छी-बुरी बातों को बिलकुल सहज ढंग से अपने दर्शकों पर साकारात्मक प्रभाव डालती है और बॉलीवुड से कही ज्यादा| क्यूंकि फ़िल्मी बातों को अक्सर लोग काल्पनिक सच बताकर पल्ला झाड लेते हैं|

Image result for bollywood  imageफ़िल्मी ग्लैमर की धाक हीरो-हीरोइनों को एक रियल लाइफ हीरो की तरह पेश करती है, युवाओं के मन-मस्तिष्क में एक अलग छवि की पैठ बना लेती है| एक्टिंग को टैलेंट का नाम देने वाले, देश के युवाओं को समाज सँभालने की जगह नग्नता, क्रूरता या धोखाधड़ी का अंदाज सिखा रहे हैं| मनोरंजन का हवाला देकर देश को तोड़ने की साजिश ऐसी रची गई की आज हर एक आम युवा एक गर्लफ्रेंड बना लेने का जूनून लिए आगे बढ़ रहा है या उसकी चाहत रखने लगा है| फिल्में देख-देख कर असली जिन्दगी में उसकी नक़ल उतारने लगा है| उसी अंदाज में जहाँ वो घिनौनी करतूत करता है वैसे ही क्राइम करके बच निकलने का भरोसा बना लेता है| एक रिसर्च की मानें तो अपहरण करने में अपनाई गई 90 फीसदी तकनीक या अंदाज फिल्मों से प्रेरणा लेकर रची गई|

फिल्मों में पहले तो प्रेम की सीमाएं ख़त्म हुई| फिर उसे इस हद तक तोड़ा गया की ख्वाहिश, मर्डर, आशिक बनाया आपने, जैसी फिल्मों ने तो युवाओं में सनसनी मचा दी| युवा कुछ वैसा ही करने की सोचने लगे| लोग सोंचते हैं की हीरो या हीरोइनों की जिन्दगी काफी इज्जत और प्रतिष्ठा भरा है या आरामदायक है पर हकीकत में है नहीं| निर्देशक उनके मेहनताने को यूँ खैरात में नहीं देते| उन्हें धुप-सर्दी-गर्मी, रात, दिन कभी भी काम करना पड़ता है| दर्शकों के लिए अंग-प्रदर्शन उनकी काम का ही एक मामूली हिस्सा है| नई हेरोइनें तो प्रचलित होने के लिए सारी हदें पार कर जा रही है| अगर सीधे शब्दों में कहें तो अंग-प्रदर्शन से ही आजकल फिल्मों में एंट्री हो रही है, जहाँ शर्म-हया जैसे शब्द बीच में भी नहीं आने चाहिए| मैं किसी हेरोइन का नाम नहीं लेना चाहता|

तो कुल मिलाकर फिल्मों की दुनिया और उसके लोगों ने औरों से अलग मनोरंजन के नाम पर एक नई दुनिया बसा ली है| अथाह पैसे, दर्शकों का प्यार, हीरो के संग रोमांस और डायरेक्टरों के धोखे के सम्मिश्रण ने उनकी जिन्दगी बेहद नारकीय बना दी है| फिर भी अपने देश मैं पैसे वालों की ही पूछ है चाहे पैसा किसी भी तरह आया हो... जिस्म दिखाकर या ईमान बेचकर...
Image result for bollywood reality imageअगली कड़ी में संगीत के उपर चर्चा करेंगें...


लेखक:- अश्वनी कुमार, पटना जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’(ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...

Odds in Searching for Bride

Marriage is a hard and soft knot for both groom & bride.  Because after that both of the consort play a new role in their respective life and also has a lot of expectation, responsibilities to caring each other’s families.  But  the main tenterhook for groom side before marriage is, which type of girl will fit for their toddler (son)?  Who should be beautiful, smart, talented, gorgeous, well heighted and well education-sophisticated.  Similarly, Bride side also searched for well educated with earning respective salary consists of good family environment.  The priority for family nodding is given to groom side, because traditionally whole procedure from bride selection to dowry settlement and all function is decided and decision taken by groom side.  There need a bid of conscious in society.
                                                         
                                                          First of all, I have realized many times at the time of bride selection for relatives that girl is feared and trembling on her face.  Because, Our Indian Society is male-dominated society, therefore which girl would surely hesitate who surrounded by eight-nine old age male.  Girls also worried about asking questions by the groom side and she has a lot of responsibilities to answered those questions.  I want to clear that the question asking during selection is necessary in the interest of well educated groom.

Image result for indian bride groom image                                                         Family want to know how she would dominate her family and also in the absence of his husband, and how she would dominate her family, how she would keep secure the dignity of her family  and also in the absence of his husband how she manage her responsibility?  Spouse having well understanding to pass whole life with each-other.  Because, marriage life run like two wheeler vehicle at the same platform of life.  So, I assumed that the searching for bride is very difficult decision for groom to choose one right girl for him…

Writer:- Ashwani kumar, patna ( who ever want to become an independent remarker)

Saturday, 16 April 2016

बिन पानी सब सून...

मराठवाडा, लातूर, बुंदेलखंड और बाड़मेर जैसे क्षेत्रों में पानी की हाहाकार मुझे इतनी दूर बैठे होने के बावजूद भी कंपकंपा गया| कहीं लोग सूखे घड़े लेकर टैंकर के इंतज़ार में बैठे हैं तो कहीं कोई छटपटाहट में नदी के बालू खोदकर लोटे में पानी जमा कर रहा वो भी पीने के लिए, नहाना या कपडे धोना दूर की बात है| देश के अधिकतर राज्यों का भूमिगत जलस्तर तेजी से नीचे जा रहा है| बोरिंग, हैण्डपम्प सब हांफ रहे हैं| नदियाँ भूमिगत जल को रिचार्ज करने में असफल हो रही है| क्या प्रकृति का यह संकेत भविष्य में किसी बड़े खतरे या हाहाकार मचने की तरफ इशारा नहीं कर रहा? साधारण सी बात है, पहले हमने प्रकृति से रूठना, उसकी विरासत का दोहन करना शुरू किया था और अब प्रकृति कर रही है|

हमें समय पर वर्षा चाहिए, सालों भर नदियों में पानी चाहिए, शुद्ध हवा चाहिए, स्वच्छ पानी भी चाहिए| पर, हम वनों को काटते रहेंगे, कंक्रीट के जंगल उगाते रहेंगे, मूक पशुओं का घर उजाड़ते रहेंगे| यही नहीं हम नदियों को खोदकर बालू भी निकालेंगें, पहाड़ों को भी तोड़ेंगे, बाँध बनाकर पानी भी रोकेंगे और प्रकृति की सारी भूभर्ग सम्पदा को बेचकर उसका दोहन करेंगे| प्रकृति के साथ नाइंसाफी के बाद भी हम मुर्ख मानव सबकुछ पहले जैसा चाहते हैं| सरकार को बुलेट ट्रेन की जगह पानी ढोने वाली ट्रेन चलानी पड़ती है इसलिए की उसकी सारी विकासवादी मशीनरी फेल हो गयी| कर डालो देश का विकास| काट डालो पेंड-पौधे और बना डालो हाइवे, आलिशान भवनें| और लोगों को बताओ की फिर इन सड़कों पर बनने वाली पानी की मिर्गमिरिचिका को देखकर अपनी प्यास बुझा लें|

Image result for drought condition imageसरकार को क्या, इस देश के मशीनरी को क्या? भुगतेंगें तो आम लोग| आबाद भूमि को रेगिस्तान बनते देखेंगें| अब तो भगवान भी नहीं सुनने वाला| क्यूँ सुने वो सबकी? क्या हम उसकी सुनते हैं? नहीं|  कितनी आसानी से नाले को नदी में बहा देते हैं, पर कोई सोंचता है क्या की हम इन नालों की दुर्गन्ध नहीं सह सकते तो ये मूक और बेचारी सी नदी कैसे सहती होगी? हम घर में पीने के पानी को ढककर रखते हैं ताकि वो दूषित न हो जाये पर हम नदियों में कितनी आसानी से मल-मूत्र को बहा देते हैं| चाहे शहर हो या गाँव उसका दम फूल रहा है, वह हांफ रहा है| साँस, किडनी या त्वचा के बिमारियों का इलाज तो हम आसानी से किसी अस्पताल जाकर करा लेते हैं, पर यह शहर कहाँ जाए अपने को लेकर?
पहले हमने प्रकृति व उसके आवोहवा को बीमार किया अब वो हमें कर रही है... है ना...

लेखक:- अश्वनी कुमार, पटना जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’(ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा... (गुस्सा इसलिए की 150 किलोमीटर की सड़क को लगभग 5 फिट बढाने के नाम पर कई हज़ार पेड़ों को कटते देखा है... ताकि टेंडर मिले और करोड़ों डकारे जाएँ| मेरी उम्र काफी छोटी थी, फिर भी उस वक्त काफी गुस्सा आया था... ये तो ट्रेलर है...)


 

Thursday, 14 April 2016

राम हमारे तम्बू में...@रामनवमी

हर पीर फ़कीर कोठी में लेकिन राम हमारे तम्बू में| क्या दुनिया के किसी और धर्मं में ऐसा हो सकता है की उसके आराध्य प्रतिकृति को तम्बू में बांस और तिरपाल के सहारे टिकाया जाए| या दुनिया के करोड़ों वर्ष पुराने धर्मं के लिए अपने भगवान् के प्रत्यक्ष जन्मस्थल पर पूजा करने को यूँ 1500 साल पुराने धर्म से इजाजत लेनी पड़े| जिसके धर्म की नींव ही क्रूरता-धूर्तता की बिसात पर खड़ा हो| नहीं! मर्यादा पुरुषोतम भगवान् राम की जन्मस्थली अयोध्या आज हमारे राम-लला के लिए सुरक्षित नहीं है| 100 करोड़ हिन्दुओं का विश्वास तम्बू में धुल फांक रही है... सरयू नदी की कलकल बहती धारा व अयोध्या की पतली-पतली गलियां आज भी भगवान राम के प्रत्यक्ष होने का एहसास कराती है|

हम हिन्दू अपने धर्मं पर कितना भी गौरव क्यूँ न करें या हिन्दू होने का गर्व क्यूँ न माने पर वर्तमान भारत की हकीकत है की हिन्दू आज के क़ानून, संविधान और उसकी अल्पसंख्यक नीतियों की गुलाम है| हम कितना भी क्यूँ न फड़फडायें लेकिन धर्म के स्वछन्द आकाश में उड़ नहीं सकते इसलिए की हमारे पैरों में सेकुलरिज्म की बेड़ियाँ बंधी है और जिसकी आजादी की चाभी उनलोगों के पास है जो कभी हिन्दू की उड़ान बर्दाश्त नहीं कर सकते| उसे असहाय देखना चाहते हैं, उसके आचार-विचारों का इस्लामीकरण चाहते हैं या वो चाहते हैं की सदा श्रेष्ठ सनातनी हिन्दू इस्लाम के झूठे इतिहास से डर जाए, मूल छोड़ दे अन्यथा ऐसा न करना हराम होगा|

कौन हैं ये लोग और ऐसा चाहते क्यूँ हैं की भारतवर्ष अपने वीर सपूतों पर गर्व न करके वे उन बाबर, अकबर या औरंगजेब पर गर्व करे जिन्होंने भारत की सभ्यता, संस्कृति या इसके गौरवमयी इतिहास को इस्लामी तलवार के जोर पर लोगों की आस्था बदल डालने की हर एक कोशिश की पर अफ़सोस की वे वीर हिन्दू भगवाधारियों के साहस के आगे ऐसा न कर सके| आज के सेक्युलर, बुद्धिजीवी इस्लाम के किस पुण्यता की बात करते हैं? की कोई गजनी की औलाद भारत आता है और 17 बार मंदिर को लूटता है| कोई तुर्क भगोड़ा बाबर आता है और हमारे भगवान राम के जन्मस्थली को तोड़ देता है| कोई औरंगजेब हजारों महिलाओं-बच्चों को इस्लाम न स्वीकारने पर जलती चिता में फूंक देता है| क्या इस्लाम का यही गौरवमयी इतिहास है? मैं इस्लामी रीती-रिवाजों या घिनौनी प्रथाओं की चर्चा भी नहीं कर रहा|

Image result for bhagwan ram imageहम हिन्दू की श्रेष्ठता है की इतने जघन्य इतिहास के बावजूद भी हमने इस्लाम को मान्यता दी, इसे अपने धर्म से कही ज्यादा सहूलियत देने को स्वीकार किया| उनकी हर छोटी-बड़ी गलती पर अपनी आँखें बंद रखी| फिर भी क्या वो हमारे अयोध्या को मुक्त नहीं देखना चाहते? जिसकी इंटें भी तब की बनी है जब बाबर के सैकड़ों परदादाओं का भी जन्म नहीं हुआ होगा| मुसलमानों को सोंचना होगा की अगर अयोध्या भगवान राम की जन्मस्थली न होकर पैगम्बर मोहम्मद का जन्मस्थल होता तो क्या वे हिन्दुओं के जैसे सहनशीलता दिखा पाते? नहीं! क्या वो कछुए के जैसे भारतीय अदालतों का इंतज़ार कर पाते? नहीं! कभी नहीं!

अयोध्या विवाद हिन्दुओं के लिए आजादी के बाद से ही प्रतिष्ठा का प्रश्न है, भगवान राम के अस्तित्व पर सवाल है| 1990 के दशक में रामजन्मभूमि मसला हिन्दुओं को साहस दे गया| उसे अपने धर्म के भविष्य को लेकर चिंता हुई इसलिए की इतिहास गवाह रहा है, जहाँ भी इस्लाम पनपा वहां साम्राज्य विस्तार की कोशिश की गयी, नरसंहार किया गया| इसलिए हिन्दुओं में भी ये खौफ बना की अगर सजग नहीं हुए तो आज राममंदिर कल वृन्दावन, अमरनाथ, काशी आदि भी हाथ से निकल जाएगा| उस दशक में राम मंदिर आंदोलन ने इसलिए भी जोर पकड़ा क्यूंकि उसी वक्त रामानंद सागर कृत ‘रामायण’ सीरिअल घर-घर में भगवान राम के आदर्शों की एक अलग छवि दे रही थी| कार सेवकों पर गोलीबारी और रामायण सीरिअल का परिणाम ही बजरंग दल के रूप में उभर कर सामने आया| रथयात्रा का व्यापक समर्थन अखिल भारतीय स्तर पर भगवा झंडे को हिन्दूवाद का प्रतीक बना गया|

Image result for bhagwan ram mandir imageपर अफ़सोस की आज अयोध्या के पावन धरती पर हमारे रामलला तंबू में खड़े हैं| प्लास्टिक की तिरपाल फट चूकी है और उसे मात्र बदलने के लिए कोर्ट हमें आदेश देती है| क्या अयोध्या काबा होता तो ऐसा होता? क्या अयोध्या जेरुशेलम होता तो क्या जीसस तंबू में धुल फांकते? रोम, वेटिकन जैसे कितने नाम गिनाऊं सब अपने आप में अपने धर्म को अपने तरीके से चलाने के लिए स्वतंत्र है| सिर्फ हिन्दू को छोड़कर| यहाँ तक की हमारे सेक्युलर भारत में मस्जिद या मदरसा किसी भी गतिविधियों या अर्नगल फतवों के लिए स्वतंत्र है| पर दुनिया के सबसे पुराने सनातन धर्म और इसके लाखों-करोड़ों वर्ष पहले के सनातनी आस्था वाले हिन्दू को मात्र 66 साल का संविधान व इसके कानून हिन्दू के आचार-विचारों और आस्था को दिशा दिखाता है| सही-गलत तय करता है पर सिर्फ हिन्दू के लिए ही| मतलब संविधान के आगे लाखों वर्षों के हकीकत की कोई अहमियत नहीं|

कई बार तो लगता है की हम लोग राम के नहीं पांडवों के वंशज हैं जो की भरी सभा में द्रौपदी के चीरहरण पर भी चुप्पी साधे बैठे रहे| समय रहते सही प्रतिक्रिया जताना तो हमारे डीएनए में है ही नहीं... फिर भी हम संभलेंगें, अपने धर्म के लिए जिम्मेदार बनेंगें और एक सचमुच सेक्युलर राष्ट्र बनायेंगें...  जय श्री राम...

लेखक:- अश्वनी कुमार, पटना जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’(ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...