Wednesday, 29 June 2016

हम चीन को सबक क्यों नहीं सिखाते?

भारत की मौजूदा सामरिक और आर्थिक ताकत महाशक्ति बनने के अनुकूल है| जनसँख्या, सेना, एटमी ताकत, मिसाइल इत्यादि भी इसका समर्थन करती है, फिर भी दुनिया भारत को महाशक्ति मानने से इनकार क्यूँ कर रही है? हमें हर चीज के लिए अमेरिका, रूस या चीन का सर्टिफिकेट क्यों चाहिए? संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में स्थायी सदस्यता तो दूर NSG जैसे संगठनों का हिस्सा बनने को हमें अमेरिका, चीन और पश्चिमी देशों की चमचागिरी करनी पड़ रही है, उनसे मिन्नतें करनी पड़ रही है| उन देशों का इतिहास भारत के आगे विश्वशांति के आसपास भी नहीं फटकता| जिनका आस्तित्व, हकीकत साम्यवाद या पूंजीवाद के अत्याचारों से ओतप्रोत है| बावजूद इसके चीन और कुछ अन्य देशों ने भारत विरोध का स्वर पैदा किया, शांति के लिए खतरा बताया|

Image result for china army vs indian armyवैश्विक महाशक्ति बन पाने के हर एक रास्ते में चीन अपनी दीवारे खड़ी रखता है| जिस दिवार का निर्माण पंडित नेहरु के विचारों, उनके वैश्विक नेता बनने के सपने से हुआ| उनके आदर्शवादी विचारधाराओं के कारण ही चीन ने हम पर हमले किये और अभी तक उसने भारत को एक नंबर का दुश्मन घोषित किया हुआ है| आईडिया ऑफ़ इंडिया, पंचशील और हिंदी-चीनी भाई-भाई के आदर्शों ने भारत को विश्वासघात और खंजर के हकीकत में चुपचाप सहने को मजबूर किया| भारत के NSG सदस्यता के मसले पर चीन के प्रत्यक्ष विरोध के बावजूद भी हम प्रत्युत्तर नहीं दे सकते| नेहरु की गुजरे-बसरे देशों के साथ गुट-निरपेक्षता का अगुआ बनने की नीतिगत गलती देश अबतक भुगत रहा है|
                                                                                              
अक्सर सोशल मीडिया पर चीनी सामानों का बहिष्कार करने के नारे दिख जाते हैं| पर क्या हम सचमुच ऐसा कर सकते हैं? बिलकुल नहीं! क्योंकि जिस देश में लोग मुफ्त या सस्ती सामानों को खरीदने के लिए दुसरे शहर तक जाकर सैकड़ों रूपये का पेट्रोल जला सकते हैं, किसी को भी अपना मत यूँ ही मुफ्त के वायदे के लिए दे सकते हैं तो वो भला क्यूँ न इन सस्ते चीनी सामानों को खरीदेंगें| क्यों देशभक्ति के झूठे नारों में अपना पॉकेट ढीला करे| सोचिये की अगर सरकार ने चीन को सबक सिखाने की सोची और उसके सामानों के आयात पर प्रतिबन्ध लगा दिया तो क्या होगा? इससे चीन की आर्थिकी पर जितना प्रभाव पड़ेगा उससे कहीं ज्यादा प्रभाव भारत की मासूम और गरीब जनता पर पड़ेगा| जरूरी सामानों की कमी से कालाबाजारी बढ़ेगी, उससे कीमतें बढेंगी और हम उन्हीं सामानों को चीन विरोध के नाम पर महंगा खरीदकर पश्चिमी देशों से खुद का शोषण करवाएंगे|
भारत की अर्थव्यवस्था बिना किसी मुकम्मल योजना के एक बड़ा बाजार बनता चला जा रहा है| इससे ऐसा भी नहीं है की हम दुनिया को आकर्षित कर रहें हैं या दुनिया हम पर निर्भर हो जायेगी| इससे हम खुद को उन देशों पर निर्भर कर लेंगें| जहाँ अमेरिका जैसे महत्वकांक्षी देशों ने इस पर अपनी नज़रें टिका ली है, तभी वो भारत की हर दावेदारी का बन्दर की भाँति रोटी तौलकर अपना हित साध रहा है|

Image result for made in china imageचीन 1980 तक भारत की GDP के बराबर था पर 1980 के बाद चीन की विकास रफ़्तार औधोगिकरण के बलबूते उसे विकसित बना गया| चीन का निर्यात सेक्टर भारतीय बाज़ार के भरोसे है जहाँ माल बेचने और ग्राहकों को भ्रमित करके मुर्ख बनाने की अपार संभावनाएं भी है| चीन विरोध की जितनी भी सुर हम उठा लें, पर इस विरोध का कोई प्रतिकूल प्रभाव चीनी सामान के आयात पर नहीं पड़ता| शान से लोग दीपावली के मौके पर घरों में सस्ते चाईनीज लाइटें लगाते हैं, लक्ष्मी-गणेश जी की चाइना में बनी सस्ती मूर्तियाँ घर लाते हैं और तरक्की की कामना करते हैं| हद तो ये हैं की औसत भारतीय के घरों में हर तीन में से दो जरूरी उपकरणों में ‘मेड इन चाइना’ अंकित रहता है|

चीन का विरोध करने का साहस न तो हम सामरिक तकाते से जुटा सकते हैं और न ही आर्थिक नीतियों से| क्यूंकि इस विरोध से चीन से ज्यादा हम मुश्किल में फँस सकते हैं| चीन विरोध की गुंजाइश केवल कुटनीतिक स्तर पर संभव है| दुनिया की धुरी बनने की चाहत चीन और अमेरिका में एक-दुसरे को नीचा और ताकतवार दिखाने की होड़ है| इस परिदृश्य में भारत को एक अनुभवी कूटनीतिज्ञ की तरह पेश आकर चीन की वैश्विक नेता की छवि को कम करना होगा, उसकी दिवार को अपनी अर्थवयवस्था के टिमटिमाते तारे से नीची रखने को बाध्य करना होगा| जहाँ पाकिस्तान परस्ती या भारत विरोध की कोई गुंजाइश न बचे| तभी हमारा बाज़ार, हमारी महत्वकांक्षा हमें महाशक्ति बनने का मार्ग प्रशस्त करेगी|
नहीं तो हम यूँ ही फडफडाते, कोसते और सोशल मीडिया पर कैंपेन चलाते रह जायेंगें...


लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...

Friday, 17 June 2016

भारत की न्यायिक व्यवस्था के पहलु

भारत के लोकतान्त्रिक स्वरुप में एकरूपता बनाए रखने की जिम्मेदारी भारतीय संविधान ने न्यायपालिका को दी है| भारतीय लोकतंत्र के तीन अभिन्न अंग हैं| पहला कार्यपालिका, दूसरा विधायिका और तीसरा निष्पक्ष न्यायपालिका| कार्यपालिका का कर्तव्य है की वो विधायिका द्वारा लिए गए निर्णयों का पलान कराये| जबकी भारतीय संविधान ने न्यायपालिका को बिलकुल स्वतन्त्र और निष्पक्ष रखा है| हमारी लोकतान्त्रिक खूबसूरती है की ये तीनों एक-दुसरे के अधिकार क्षेत्र पर अतिक्रमण नहीं कर सकते| भारतीय न्यायपालिका विभिन्न स्तरों पर फैली अदालती स्वरूपों के लिए जानी जाती है| सबसे पहले किसी मामले में क्षेत्रीय व्यवहार न्यायालय का अधिकार क्षेत्र होता है| उसके बाद जिला न्यायालय, उच्च न्यायालय, और फिर सर्वोच्य न्यायालय का क्रम आता है| व्यव्हार न्यायालय के प्रमुख मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी होते हैं तथा जिला न्यायालय के प्रमुख जिला एवं सत्र न्यायधीश हो माना जाता है जो फौजदारी अथवा दीवानी दोनों मामलों, यहाँ तक की फाँसी की सजा देने लायक मुकदमों की सुनवाई तक अधिकृत होते हैं|

     भारतीय न्यायपालिका को संविधान का सबसे बड़ा रक्षक माना जाता है| भारत में न्यायपालिका की अवधारणा को संयुक्त राज्य अमेरिका से लिए गया है| सर्वोच्य न्यायालय ने आजादी से अबतक आए संवैधानिक संकटों के विभिन्न पहलुओं को बारीकी से समझते हुए जितने भी फैंसले दिए हैं वो ऐतिहासिक है, जनहितैषी है| आपातकाल संकट के लिए राजनारायण बनाम इंदिरा गाँधी मामला हो या शाहबानों प्रकरण या कोलेजियम प्रणाली मामला चाहे विभिन्न राज्यों में मनमाने तरीके से लगाए जाने वाले राष्ट्रपति शासन को रद्द करना, सभी फैसलों में देश की सर्वोच्य अदालत ने न्यायपालिका को संविधान का रक्षक साबित किया है| बंद को असंवैधानिक घोषित करना, मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए पीआइएल पर संज्ञान लेना या फिर विधायिका के मनमाने फैसले पर अंकुश लगाना, सारे आदेशों ने देश की जनता पर एक गहरा असर छोड़ा है| उसने जनता के मन-मस्तिष्क में एक विश्वास पैदा किया है, भरोषा बनाया है|

Image result for judiciary in india image          देश की न्यायिक प्रणाली ग्राम पंचायतों से लेकर सर्वोच्य न्यायालय तक फैली हुई है| विधायिका के साथ न्यायपालिका का टकराव एक-दुसरे के क्षेत्राधिकार में अतिक्रमण का प्रयास है| अगर देश की न्यायपालिका जनता का अहित न होने देने का प्रण लिए बैठी है तो विधायिका को भी राजनीतिक हित के लिए ऐसा कोई प्रयास न ही करना बेहतर होगा जो जनता के हितों से परे हो या व्यक्तिगत स्वार्थ की भावना लिए हो| क्यूंकि भारतीय लोकतंत्र की सफलता का सबसे बड़ा आयाम न्यायपालिका का स्वतंत्र रहना है|

          इस तरह जनधिकार, मानवाधिकार या उनके मौलिक अधिकारों की रक्षा करना न्यायपालिका का कर्तव्य है| ये सही है की भारतीय क़ानून की जटिलताएं और उसकी विसंगतियां अक्सर इस देश की जनता को परेशान करती है| फिर भी हमें अपने न्यायपालिका द्वारा इन जटिलताओं को दूर करने लिए किये जा रहे प्रयासों पर पूर्ण विश्वास व भरोसा है की वे सुधारों और बदलावों के बलबूते भारतीय लोकतंत्र और उसके संविधान पर कभी कोई संकट नहीं आने दे सकते...
लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा... (परीक्षा की तैयारिओं के लिए मैंने ये आर्टिकल लिखी है जिसके कारण लिखने की आजादी की प्रत्यक्ष कमी दिखाई देती है...)



International Yoga day

First International Yoga day had announced to celebrate on 21st June 2015 by the agenda approved by United Nation.  India is the origin of yoga which probably introduced by ‘Maharshi Patanjali’.  India played a big and important role to declare 21st June for international yoga day.  Yoga is the best physical meditation to secure one’s health be healthy.  The golden impact of yoga on people’s make it became popular rapidly towards whole world.  Our country is much populous in the context of daily yoga practitioner.  Now, The flag of yoga is being flied by yoga guru ‘Baba Ramdev’ in India.

            Benefits of Yoga reveal in good health, meditation, soothing and peace of mind.  Therefore, Many of people who treated their old disease to various doctors and spending a lot of money are also gain straight recovery from disease like pain, B.P, diabetes, weakness, mental pressure etc.  Not only India but also whole world is availing profit by yoga.  The various posture of yoga help our body to elastic and also assistance for strengthen our parts of body.  Today Nobody in the world can refuse to positivity of yoga or, Can say bad impact on their health because of having yoga workout daily.

Image result for yoga day image            World know the power of yoga, which is also called exercise.  But many of menace in our society always trying to communalize that for political gaining mindset.  Hence, we can proud on our yoga which is teaching to whole world with its history to assume ‘whole world is my family’.  We Indians ever pray to b e whole world may happy healthy and fit.

            International yoga day is a factor of proud for every Indians, because world follow our historical ancient culture to live long.


Writer:-  Ashwani kumar

Sunday, 12 June 2016

सादा जीवन उच्च विचार एक कल्पना है...

Image result for simple living high thinking imageगाँधी दर्शन का सर्वोतम झलक गाँधी की सादा जीवन और उच्च विचार के सपने में है| आचार्य चाणक्य ने कहा है की सीधे वृक्ष और सीधे व्यक्ति पहले काटे जाते हैं| इसका सीधा मतलब है की इंसान को ज्यादा सीधा बना रहना हानिकारक है| पर इसका वैचारिक दृष्टिकोण 21वीं सदी में मानव की क्रियाकलापों से बिलकुल भी नहीं दिखता| चारों तरफ लोग भागदौड़ की जिन्दगी जी रहे हैं| जहाँ सिर्फ झूठ, धोखा, विश्वासघात और कुतर्क की पनाह ज्यादा नज़र आती है| जबकि ईमानदारी, भाईचारा और विनम्रता अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है| मॉडर्न लाइफ स्टाइल की इस दुनिया में अगर कोई अपने नीतिपरक आदर्शों या महान लोगों के विचारों पर चलता है तो दुनिया उसे अनपढ़, पिछड़ा या मुर्ख का तगमा पहना देती है| उसका मजाक बनाया जाता है, उसे अन्धविश्वासी कहा जाता है|

     सवाल है, दुनिया में जितने भी वैश्विक महाबली नेता उभर रहे हैं क्या वो परमाणु बमों, मिसाइलों, गोला-बारूदों से आगे की सोंच सकते हैं? क्या उनकी बौद्धिकता सादे जीवन को इजाजत दे सकती है? या फिर वो भी हड़प और विस्तार नीति पर ही चलते रहने को बाध्य हैं? विश्व के अनेक सभ्यताओं का विकास, उनका उत्थान उनके विचारों से हुआ| पर क्या अब इस हडबडाई हुई आबादी से सादा जीवन जीने की हम उम्मीद भी कर सकते हैं? नहीं|  महात्मा गाँधी, लूथर या मंडेला जैसी शख्सियतों को दुनिया इसलिए सुनती थी की उनकी विचारधारा एक व्यवस्थित भविष्य की राह दिखाती थी| उनके आदर्शों में उनलोगों की विचारशीलता झलकती थी|

     सादा जीवन और उच्च विचार हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की आदर्श थे| पर क्या हुआ? जैसे ही गांधी की मृत्यु हुई, वैसे ही उनके अनुयायी कहे जाने वाले लोगों ने गाँधी की विचारों को कोने में रख दिया| राष्ट्रपति बनने के बाद राजेंद्र प्रसाद वायसराय के महल (राष्ट्रपति भवन) में रहने लगे और नेहरु तीन मूर्ति बंगले में बस गए और सभी ने उन सारी सुख-सुविधाओं का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया, जिसे लेकर गांधी अक्सर अंग्रेजों की आलोचना करते थे|

     अब तय हमें करना है की सादा जीवन जीना और उच्च विचारों का अनुप्रयोग एक कल्पना है या गांधीवादी हकीकत| या हम चावार्क के ही जीवनदर्शन पर जीते रहेंगे “जब तक जियो मजे से जियो, कर्ज लो और घी पियो”| गाँधी या चावार्क हमें तय करना है वो भी अपने भविष्य के लिए, आने वाली पीढ़ी के लिए...  नहीं तो चावार्क से भी महान लोगों का जन्म भविष्य नियत कर देगा...

लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...