Saturday, 23 July 2016

मर्यादा के बंधनों को तोड़ती हमारी राजनीति

Image result for mayawati dayashankar demonstration imageभारत की राजनीति में मर्यादा के बंधनों की एक सीमा में आलोचना या बुराई करना इसकी पहचान रही है और हर एक नेता ने इन बंधनों को तोड़ने का प्रयास जरूर किया है| देश की मौजूदा राजनीतिक बिरादरी इस मामले में कुछ आगे ही चली गयी है| दूरदर्शिता के नाम पर परिवार को घसीटने का नया चलन आया है| नेता, राजनीति का पालनहार कहा जाता है और जनता को इन नेताओं का पालनहार कहा जाता है| पर, 90 के दशक के बाद जिस तरह से तमाम राज्यों में जाति, धर्म, संप्रदाय या उत्थान के नाम पर क्षेत्रीय पार्टियों का जन्म हुआ, उन्हीं पार्टियों ने राजनीतिक बौद्धिकता का हवाला देकर तमाम गुंडों, मवालियों की सहायता से इस धंधे में पैर जमाने की सोची और काफी हद तक सफल भी हुए| ऐसी मानसिकता वाले कई दल राज्यों में सफलता से शासन भी चला रहे हैं|

ऐसा बिलकुल भी नहीं है की उससे पहले के राष्ट्रीय या क्षेत्रीय दलों में दलगत बुराइयां नहीं थी या पैसे, धर्म, जाति के नाम पर अयोग्यों को चुनाव लड़ाकर लोकतंत्र या जनता के भविष्य से खिलवाड़ करने की कोशिश नहीं की गई पर, उनकी भी एक मर्यादा होती थी| चाहे वो संविधान के तकाजे से हो या सामाजिक ताने-बाने से, अगर आपातकाल को अपवाद मान लिया जाए तो|

कहा जाता है की राजनीति में सब जायज है| वैसे भी जहाँ पैसा है वहां मान-मर्यादा कहाँ मिलता? एक नेता दुसरे को गरिया रहा है, दुसरा पहले को और तीसरा मज़े लेकर ताली पिट रहा है| नेताओं की बिरादरी में भी गावों की गलियों के बच्चों की तरह हर-एक का छद्म नाम दिया जा रहा है, पप्पू, फेंकू या खुजलीवाल जैसा| सवाल है, देश की जनता इतनी संवेदनहीन क्यों है, जब जनता को सुधारने, उसे अनुशासित बनाने का ठेकेदार ही ठरकी हो जाने का संकेत दे रहा हो| क्या हम वास्तव में आधुनिक हो गए हैं? इतने आधुनिक की शब्दों की वास्तविकता हमारे लिए मायने नहीं रखती| लोगों को मां-बहन की गालियाँ दी जाती है| एक बकता है तो दूसरा भी बकता है और फिर अपनी-अपनी चमचागिरी चमकाने के लिए दोनों के पीछे लाखों चापलूस एक-दुसरे की मां-बहन एक कर देते हैं (मायावती प्रकरण)| पर भारत मां को गाली दी गयी तो कोई लड़ने नहीं उतरा|  ये संस्कार, ये अनुशासन उन्ही लोगों के बनाए संविधान, कानून के दिए हुए हैं जो सिस्टम के नाम पर आम-आदमी को धकियाने के लिए अफसर बिठाए हुए हैं और गरियाने के लिए पुलिस| हर एक को सिस्टम के नाम पर ये सब कुछ यूँ ही सहना पड़ता है...

Image result for indian vulgar politics mayawati imageहर एक नेता कानून से ऊपर होता है लेकिन पार्टी से नीचे| इसलिए की उसकी पार्टी की विचारधारा संविधान से ऊपर है, उसकी पार्टी का झंडा, तिरंगे से ज्यादा चटखदार होता है| वो क्यूँ न अपनी पार्टी की भक्ति करे? देश की भक्ति से गोली ही मिलेगी पर पार्टी की भक्ति से उसके रोजगार का प्रबंध भी हो जाता है और साथ ही एक दिन माननीय बन जाने के सपने देखते रहने का वरदान भी| भले ही वो झंडे क्यूँ न ढोता हो, पोस्टर ही क्यूँ न लगाता हो?

पर बात राजनीतिक मर्यादा की है, आचरण की है| विनम्रता, अनुशासन और ईमानदारी राजनीति में अगर किसी के पास है तो वह नेता नहीं हो सकता| जिस तरह से देश की संसद में सड़क छाप भाषा का इस्तेमाल होने लगा है वह हमारी जडें खोद रही है| एक-दूसरे के विरुद्ध सख्त लहजे का बढ़ता इस्तेमाल इस बात का संकेत है की राजनीति में व्यक्तिगत महत्कान्क्षा बढ़ रही है| पर जनता ये कतई न सोंचे की ये गाली-गलौज उनके लिए की जा रही है| ये तो एक-दूसरे की बुराईयों को आइना दिखाने के नाम पर अपना छिपाने की कोशिश की जा रही है और यही राजनीति का ऐतिहासिक आदर्श भी रहा है...
                                           
खुब कर लीजिये, हो सके तो रामलीला मैदान को बुक करके इसका एक शो ही आयोजित कर दीजिये| फिर तो चैनल वाले पहुंचकर लाइव टेलीकास्ट करके विज्ञापन वालों से कमा भी लेंगे| जनता मज़े लेगी और कार्यकर्त्ता होने के नाम पर एक-दूसरे से लड़ भी लेगी| पर चुनावों के वक्त सत्ता पाने के लिए मिल जाइएगा... इन मुर्ख जनता के सेंटिमेंट के चक्कर में अपना भविष्य मत बर्बाद कीजियेगा... क्योंकि आपकी बिरादरी की धूर्तता के इतिहास के आगे देश औंधे मुंह गिरा पड़ा है...

लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...


Wednesday, 13 July 2016

इस्लाम का जेहादी चरित्र और भारत

इस्लाम के नाम पर मानवता के विरुद्ध रची जा रही साजिश का प्रभाव दुनिया को दिखने लगा है| आईएसआईएस, अलकायदा जैसी संगठनों की मानसिकता इस्लाम व उनकी रक्तपात भरी जेहादी जुनूनों के अफीम में मदहोश है| समूचे विश्व में खलीफाई राज लागू करने की महत्वकांक्षा और इस्लाम के नाम पर खौफ मचाने की प्रवृति असभ्यता के पनपने का संकेत है| दुनिया के ऊपर अपने विचारों, आस्था या उसके तौर-तरीकों को थोपने की सनक विकृत मानसिकता का परिणाम है| पेरिस, बेल्जियम, अमेरिका के बाद बांग्लादेश के ढाका शहर में जिस तरह से इस्लाम के बन्दों ने आईएसआईएस का खौफ दिखाया, गैर-मुसलमानों को चुन-चुन कर मारा, इससे क्या साबित हुआ? की इस्लाम की जेहादी व जुनूनी विचारधारा कुरान के कलमों से चलती है, आयतों के कहे अनुसार चलती है, शरियत के उलुलजुलुल नियमों में उलझी है या फिर इस्लाम के माननेवालों की मनोदशा कुरानशरीफ में लिखी बातों पर आधारित है इसलिए उन्हें दुनियादारी, मानवता या सौहार्द नहीं सीखना|

सवाल है, क्या दुनिया में बढ़ रही आतंकवादी घटनाओं को नियंत्रित करने का कोई कारगर उपाय नहीं? क्या दुनिया के ताकतवर देशों की ड्रोन, मिसाइल या बमों के आगे एक धर्म की विचारधारा भारी पड़ रही है? इसलिए की क्यूंकि सीरिया और ईराक में आईएसआईएस के बढ़ते प्रभाव को तमाम कोशिशों के बावजूद भी अमेरिका और पश्चिमी देश उसे नियंत्रित नहीं कर पा रहे हैं| ईराक व सीरिया के ताज़ा हालात असभ्यता और बर्बरता का प्रतीक नहीं है? दुनिया आतंकवाद के तांडव के आगे असहाय है| उनकी बेचारगी, उनकी सहनशीलता इस्लाम के पैरों तले है|
                                                                                                              
भारत में आईएसआईएस के पनपने की सम्भावना से कटाई इनकार नहीं किया जा सकता| इसलिए की भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है और जहाँ की सेक्युलर विचारधारा की मनोवृति ऐसी रही है जैसे वो तो धर्म विशेष के नाम पर उनके स्वागत के पलक पावडे बिछा देंगे| भारत में बढ़ रही इस्लामिक व जेहादी गतिविधियां बेहद खतरनाक ढंग से कट्टरपंथी विचारधारा को बढ़ावा दे रही है| जहाँ धर्म की आड़ में विभिन्न मदरसों, मस्जिदों में मौलवी जेहाद और आतंक की खुलेआम शिक्षा देते हैं, जेहादी बनने का प्रशिक्षण देते हैं| फिर भी कोई भारतवंशी सेक्युलर ये मानने को तैयार नहीं की आतंक का कोई धर्म होता है| जबकि आंकड़ें बताते हैं की देश में अबतक हुए विभिन्न इस्लामिक आतंकवादी हमलों में 50,000 से अधिक लोग मारे गए हैं|

हमारे यहाँ कोई डोनाल्ड ट्रंप या शेख हसीना जैसे मुसलमानों को इसका जिम्मेदार मानने को कतई तैयार नहीं है| लोग खौफ में जी रहे हैं, हमले हो रहे हैं, मासूम मारे जा रहे हैं, लोगों का घर बर्बाद हो रहा है, घाटी सुलग रही है, जवान शहीद हो रहे हैं, फिर भी आतंक का कोई धर्म नहीं है| कुरानशरीफ की आयतें सेक्युलर भारत के लिए सर आँखों पर है चाहे वो जिहाद या बर्बरता ही क्यूँ न सिखाता हो| किसी में भी हिम्मत नहीं जो इस्लाम के इन जड़ों को प्रतिबंधित करे|

Image result for islam terror imageजाकिर नाईक का मसला इतनों दिनों तक छुपा कैसे रहा? भारत की जमीन से दुनिया को जिहाद करने, आतंकी बनने का सन्देश दिया जाता रहा फिर भी हम इतने संवेदनहीन क्यों बने रहे? क्या ये हमारी सुरक्षा तंत्र की विफलता नहीं है? राजनीति और अपने लोकतंत्र की आड़ में धर्मनिरपेक्ष बने रहने की झूठी शान हमारे राष्ट्र-राज्य को बर्बाद कर देगी| अभी तो मजा आ रहा है की आम लोग ही तो मर रहे हैं, जब खास मरने लगेंगे तब शायद उन्हें हकीकत का अंदाज़ा हो पर तबतक देर हो चुकी होगी|

ईराक और सीरिया का रास्ता भारत भी पहुँचता है और भारत का खौफनाक इस्लामिक इतिहास और उसका चरित्र उनके स्वागत के लिए हरसंभव तत्पर रहेगा| फिर तो सारे बम-बारूद धरे के धरे रहे जायेंगें और लोगों को कलमें, आयतें पढने को मजबूर हो जाना पड़ेगा... क्या नहीं!

लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...


Tuesday, 5 July 2016

The role of Media in Democracy

According to Abraham Lincoln “Democracy is for the people, it is of the people and that is by the people.  That slogans of Lincoln definitely appropriate with the success achieved by democracy in democratic country like India.  But we can’t think of democracy without impartial media.  The role of media in democracy just as sentinel of public rights.  Media is known for fourth pillar of democracy.  We can say that the media is a symbol of freedom of expression.  there is a big and effective role of media in democracy like India, because the constitution of India secure right of press in article 19(A) which give us independency of speak, organize public meetings and right to oppose peacefully any initiatives.

Image result for The role of Media in Democracy image            Today’s present condition, media is playing a grand role in the political and social stability of the nation.  Impartial Journalism secure the future of democracy and demand more transparency in system also.  Therefore, print and electronic media have proved its importance many times by their loyalty for nation.  2G scam, coal scam, agusta westland scams and many more are exposed by media reports which scam shacked nation.  By the help of this reports government probed it and reality would exposed.  However, There are also black spot present in the form of prejudice reporting, paid news and political biased.  But the body like press council of India have also constitute to heed on that types of matter.

            Now, It is the era of internet.  Where, Social media is playing a new role in our democracy.  it is clear that the social media obviously loud voice of common man to the world.  Freedom of expression really revealed here.  Whenever, any sensitive issues happened in the country, social media firstly boil over that issue, people also write and trend their own conception on that.  Hence, we can say that the after print media, electronic media was giving strength to our democracy, social media also strengthen it.  We can’t deny over impartiality of social media because, often seen to have that many people try to impose their prejudice notion on country which is not preferable for democracy.

Image result for The role of Media in Democracy image            Therefore, We conclude that the role of media in democracy is need for improvement of infrastructure, security of journalist, hurdle with government or planning for better journalism are reveal a lack of will in government.  So, The future of democracy is totally depend upon the impartiality of journalism and the impartiality of journalism also depend on the faithfulness of journalist towards nation.


Writer:-  Ashwani kumar, who ever want to become an independent remarker.