Thursday, 29 September 2016

डरपोक देश का तगमा हमें डराता है...

भारत और पाकिस्तान के बीच पैदा युद्ध के हालत मीडिया को छोड़कर किसी को विचलित नहीं कर रही| दुनिया की तमाम महाशक्तियां दो परमाणु संपन्न राष्ट्र के मध्य खतरे को गंभीरता से क्यों नहीं ले रही ये समझना बेहद जरूरी है| भारत की पहचान एक शांत, सहिष्णु और एक बाज़ार के रूप में है| कश्मीर पर भारत का रक्षात्मक रवैया इसका एक अहम कारण है| पाक अधिकृत कश्मीर में चीन की परियोजनाओं को न रोक पाना हमारी संप्रभुता पर पहले ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया है| इन दोनों पड़ोसियों के रहते भारत कभी अपनी मौजूदा विदेश नीति से पार नही पा सकता| इसे उग्र बनना होगा, जैसे को तैसा कर देने की फिलिंग लानी होगी| पर हम जानते हैं की नेताओं की दूरदर्शी सोच के नाते ऐसा नहीं हो सकता| उनका खून जनता के जैसे उबाल नहीं मारता|

भारत में अक्सर हर हमले के बाद यह कहा जाता है की अमेरिका ने पाक को आतंकी कैंप हटाने को कहा है मतलब वह हमारी तरफ से पाक को सबक सिखाएगा| लेकिन इस बात पर भरोसा करना हमारी मुर्खता होगी| इतिहास गवाह रहा है की अमेरिका की फितरत हमेशा दो देशों के बीच युद्ध के हालत पैदा करके हथियार बेचना उसकी युद्ध आधारित अर्थव्यवस्था रही है| ईराक, वियतनाम जैसे देशों की स्वार्थ साधने के लिए उसकी आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक आजादी बर्बरता से नष्ट कर दी| भारतीय विदेश नीति में अमेरिका की चापलूसी हमारी कुटनीतिक विफलता है| इसलिए की अमेरिका यह जानते हुए भी की पाकिस्तान लादेन का संरक्षक था फिर भी क्या उसने पाक की आतंकी गतिविधियों पर पाबंदी लगाईं? उसे परमाणु बम, लड़ाकू विमान और भारत के खिलाफ संसाधन नहीं दिए? क्या ये सामरिक शक्ति भारत को रोकने के लिए नहीं दी?

लेकिन, उरी हमले के बाद सरकार और मोदी की रणनीतिक चूक या युद्ध का भय का खामियाजा हमें एक कमजोर और पिलपिले देश के रूप में प्रदर्शित करेगा| सरकार की तरफ से कहा गया की जनभावना में फैसले नहीं लिए जा सकते| मतलब साफ है की जनता उत्त्साही है, मुर्ख है, भविष्य सोचने वाली नहीं है| सब जानते हैं की युद्ध का मतलब विनाश है फिर भी एक गये-गुजरे देश से अपनी संप्रभुता खत्म कराने से अच्छा है| पर, हमें तो यह सवाल पूछने का अधिकार है ही की इस तरह की घटना से निपटने और फ़ौरन कारवाई करने के लिए पहले से योजना क्यों नहीं थी? क्या हमें किसी चीज को तय करने के लिए सप्ताह भर बैठक करनी पड़ती है? डोभाल और मोदी को समझना होगा, तय करना होगा की युद्ध या कायरता? कहीं ऐसा न हो की भारत और पाकिस्तान की गरीबी को दूर करने के प्रयासों में मोदी देश की संप्रभुता लूटा दें|

जगह और समय का इन्तजार करते-करते जनता और सेना दोनों उबने लगी है| सरकार की गतिविधियों से और उसकी विश्व महाशक्ति बनने की चाहत देश पर भारी पड़ रही है| भारत की कूटनीति आजादी के बाद इतनी सफल रही है की वो आज चाहकर भी न तो सिन्धु का पानी रोक सकती है, न व्यापार और न ही मार खाने की आदत| भारत ने खुद को दोनों बिगडैल पड़ोसियों से घिरवा लिया है| सबकुछ साफ़ है की भारत का युद्ध से बर्बादी का डर न तो कभी चीन, पाक को साध सकता और और न ही कभी महाशक्ति बन सकता है| महाशक्ति बनने का जूनून, आक्रामकता और उसका राष्ट्र की संप्रभुता निर्णायक होती है, जिसमें भारत कभी प्रयास नहीं कर सकता|

इसलिए सवाल आता है की जब युद्ध नहीं लड़ना, विनाश नहीं लाना तो राफेल क्यों ख़रीदा? अरबों-खरबों का रक्षा खरीद पर पैसे क्यों बहाए जा रहे हैं? इस पैसे से लाखों गाँव-गरीब-किसान का कल्याण होता, देश आगे बढ़ता| या फिर राजपथ पर प्रदर्शनी दिखाकर देश का सीना गर्व से कुप्पा कर देंगे... महाशक्ति बन पाने के सपने के साथ...
Image result for india pak uri attack imageसही है की जनभावना में फैसले नहीं लिए जाते लेकिन 56 इंच के सीने के ताकत कम-से-कम ओलांद की तरह भी दिखा देते, मिटाने की कसमें खा लेते तो देश को सुकून मिलता...
(इस लेख को अन्यथा न लें... ये एक गुस्सा हो सकता है, फिर भी हम श्रेष्ठ हैं...)

Image result for rafale deal imageलेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...Image result for india pak uri attack image


Thursday, 8 September 2016

खटिया लूटेरी जनता

जब लोकतंत्र जनता के लिए है, चुनाव जनता के लिए हैं, रैलियों का इंतजाम जनता के लिए है तो खटिया क्यूँ नहीं? उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले से खटिया लूटने के शुरुआत बताती है की अब चुनाव के वक्त जनता को ठगने का जो टैलेंट नेताओं में पहले था वो अब जनता में आने लगी है| मतदाता इन टाइप के रैलियों में जाने की अपनी कीमत समझने लगी है| वे जानती है की ये सारे इंतजाम उनकी उम्मीदों को सफ़ेद करके उन्हें ही बेचने के लिए है| इसलिए उसने इस बार अपना तरीका बदल लिया| नेता अपने बयानों में फायदे ढूँढते थे तो मतदाता इस बार रैलियों में अपने फायदे ढूढ़ कर ले गई|
                                                                                     
Image result for khaat loot up imageजनता का ये नजरिया लूटने और ठगने के उसी स्टाइल से प्रेरित है जिसमे वो बार-बार इन्हें नेताओं से लूटती रही| क्या लोगों ने अपना मूड बदला या जरूरत के हिसाब से और शांति से नेताओं के मूड बदलने को ठान ली? रैलियों में जाना, नेताओं के न समझ में आने वाले भाषण को सुनना और वापस घर लौट आने का जमाना पुराना था| किसान के नाम पर, व्यापारी के नाम पर या गरीब के नाम पर होने वाली सभाओं में जुटने वाले लोगों का हुजूम बेहद खतरनाक तरीके से जिंदाबाद के नारे लगाते पोलों पर लगे, मंचों पर लगे पोस्टरों को अब उखाड़ ले जाने का जूनून रखने लगे हैं| इस बार खटिया ले गए शायद अब से कुर्सी भी ले जाएँ| पोस्टर-बैनरों को ले जाने वाले वर्ग को ये शौक नहीं रहता की क्रांतिकारी नेताओं की तस्वीर घर में रहेगी बल्कि बारिश या धुप के मौसम में इन्हीं नेताओं के पोस्टरों के बदौलत इनकी दिनचर्या आराम से कटती है|

Image result for khat pe charcha imageखटिये को लूट लिए जाने को लेकर तमाम बुद्धिजीवियों ने अपनी राय घुसेड़ी| लेकिन शायद यही खटिया जमीन पर सोने वाले लोगों को हवा में सोने का एहसास भी दिलाएगी| किसी ने नहीं सोचा की जनता की यह लूटेरी तस्वीर उस परिवेश, उस माहौल का परिणाम है, जिसमें अक्सर हमें विकास के आंकड़ों और योजनाओं के बदौलत भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है| पहले भी रैलियों होती थी, वोटरों के लिए खाने-खिलाने का इंतजाम होता था पर शायद तब कुर्सियां होती थी जो गरीबों के स्टैण्डर्ड की नहीं है| नेताओं ने जनता से खटिये से सहारे वोट के तार जोड़ने की रणनीति लोगों के जुगाड़ टेक्नोलॉजी के दम पर सफल रही| गरीब के लिए खटिया फाइव स्टार होटलों के गद्दों से भी बढ़कर आरामदायक है| इन गरीबों के चेहरे पर जो सुकून मुफ्त की खटिये पर सोने का होगा वह खुद को एक मतदाता मान कर कभी महसूस नहीं कर पाता की उसने ईमानदारी से वोट देकर लोकतंत्र को मजबूत किया है| एक खटिये को ठोककर-बनाकर सालों चलाते रहना इन गरीबों के लिए शानदार इंजीनिरिंग का नमूना भी हो सकता है और मजबूरी की दास्तान भी| शौक के लिए नेताओं को छोड़कर भला यह मासूम जनता क्यों चोरी करेगी जो वर्षों तक खुद को जाति और पार्टी के भक्त होने के नाम पर गरीब रहने का बार-बार इंतजाम किया है|

नेता सोंचते बहुत हैं लेकिन सिर्फ चुनाव जीतने के लिए| वास्तविकता और काल्पनिकता के बीच की जगह में वे विकास की इतनी गाथा और बखान ठूंस देते हैं की जनता के लिए साँस लेने तक की जगह नहीं बचती| वो अकबका जाती है, वर्तमान को सोचकर अपना भविष्य बिगाड़ लेती है| कथनी और करनी में नेताओं के अंतर को जनता हर बार भांप लेती है पर उसके पास वो राजनेताओं वाली सुपरपॉवर नहीं होती की विरोध कर सके| अलग-अलग राजनीतिक दुकानों में मतदाताओं के लिए भरपूर इंतजाम हैं, पेट पालने से लेकर, नेता बना दिए जाने के सपनों तक| लेकिन इन सारी दुकानों के नियम-शर्तों में कोई अंतर नहीं मतलब लूटना मतदाता को ही है|

इस तरह खटिया लूट लेने से लेकर नेताओं के पीछे जिंदाबाद के नारे लगाती भीड़ में एक चीज कॉमन है की सबकी मजबूरी की वजह गरीबी और बेबसी है| नहीं तो  बदलते भारत में किसी कामगार को इतनी फुर्सत कहाँ की वो लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपनी आर्थिक श्रद्धांजली दे| लोकतंत्र के नाम पर समाजवाद की विचारधारा की भावनाएं लोगों की उम्मीदों में बहकर चू जाती है| खटिया लूटेरी जनता के लिए नेताओं और पार्टियों को लूटने का चलन संविधान वाली समानता का अधिकार जैसा फील देता है|
इसे चलना चाहिए और खूब चलना चाहिए ताकि इन नेताओं को भी कभी लूटे जाने का एहसास महसूस हो...

लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...

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Saturday, 3 September 2016

बदलते भारत की ये हकीकत...

Image result for odisha dana manjhi imageपिछले दिनों उड़ीसा के कालाहांडी से पत्नी के शव को कंधे पर लादकर चलते दाना मांझी के चेहरे पर मजबूरी का जो दर्दनाक सच देखने को मिला वो शायद कई दशकों तक याद रखा जाएगा| शहर के चकाचौंध, धूम-धड़ाके, वादे-घोषणाओं से दूर इस व्यक्ति के जज्बे और दुःख की अनंत सीमा में हमारा देश पीछे चला गया| विकासवादी नारे के बीच से एक अकेला व्यक्ति सारे दावों को झुठलाता हुआ चला गया| क्या ये तस्वीर सिर्फ दाना मांझी की है या फिर उन सारे दूर-दराज के गांवों में रहनेवाले आदिवासियों की असली आबादी की जो शायद ही कभी इस देश के असली भूगोल या किसी सर्वे में दिखाई गई हो| क्या विकास की रफ़्तार में इनकी छवि सिर्फ एक खर्चालू योजनाओं की जड़ मानी जाती है या फिर मीडिया, सरकार की नज़रों में शोषितों, वंचितों के एकमात्र मतलब रोहित वेमुला और गुजरात के दलित रह जाते हैं? कोई भी नेता बड़े टरकाऊ अंदाज से लन्दन में पढ़कर बड़े होने वाले बाबा साहब के आदर्शों को ही इस देश की सामाजिक उत्थान से जोड़कर देख देखते हैं, उनके विचारों से आगे नहीं सोंच पाते हैं| पर क्या कभी सरकार ने दूर-दराज के इलाकों में बसने वाले देश के असली शोषितों-वंचितों के लिए योजनाओं से अधिक कुछ सोचा?

Image result for dana manjhi udisa imageये तस्वीर दाना मांझी की हो सकती है, हजारो-लाखों गरीबों की भी हो सकती है लेकिन इनकी वास्तविकता वही है जो मंत्रालय में एसी-दफ्तरों की फाइलों में पड़ी है| सरकार का खजाना लुट रहा है, योजनायें सफलता से चल रही है, वंचितों को रोटी-मकान दिए जा रहे हैं पर कहाँ? अगर वास्तव में ऐसा होता तो दाना मांझी की तस्वीर हमें विचलित नहीं करती| हम सब सरकारी मशीनरी की हकीकत जानते हैं शायद इसलिए ही इन तस्वीरों का मानवतावाद से नाता जुड़ा| देश काँप गया, क्योंकि 21वीं सदी के डिजिटल भारत में आदिकाल की झलक मिली| इन्फ्रास्ट्रक्चर का नारा सरकारी तंत्र से है, जिसमें नेता, अधिकारी, डीएम, अफसर, पुलिस, क्लर्क जैसे स्ट्रक्चरों को गरीबों के लिए भेद पाना असंभव है|

सरकार भले ही शहरों और उसकी आधुनिक डिजिटल इंडिया को देखकर अपनी पीठ थपथपा रही हो पर, अभी भी गाँवों की असली आबादी अपने अधिकारों, कर्तव्यों से अनजान है| सरकारी आदमियों का उनमें खौफ है, उनके हर नियमों को वो आसानी से मानते हैं| किसी काम के लिए 4-5 बार उनके दफ्तरों का चक्कर लगा लेते हैं, बैंक में खाते खुलवाने के लिए अधिकारीयों की बेवजह के नियम-कायदों को मानते हैं फिर भी काम न बने तो इनसे रूपये ऐठ लेना बेहद साधारण काम है| इसलिए अक्सर सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तव में उन्हें इस भ्रष्ट तंत्र के कारण नहीं मिल पाता|

इसलिए, सरकार चाहे जितनी भी बार सामाजिक उत्थान के नारों को आंबेडकर के सपने के सहारे बुलंद करने की कोशिश करे लेकिन इस देश का तंत्र ऐसा नहीं होने देगा| क्योंकि यहाँ किसी को वोट चाहिए तो किसी को पैसे और जो बच गए उन्हें कामचोरी की लत है| शहरों की चकाचौंध में मस्त शासन भले ही भारत को इंडिया बना देने के लिए झूम रहा हो, पर दाना मांझी जैसे लाखों लोगों की हकीकत ही इसका मूल है... जिन्हें कदम-कदम पर सत्ता के गुंडे उनके सपने को खदेड़ देते हैं...


Image result for odisha dana manjhi imageलेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...