Thursday, 27 April 2017

अभिभावकों की जेब पर स्कूलों की डकैती

देश में प्राइवेट स्कूलों की संगठित लूट अभिभावकों की आर्थिक आजादी को सीमित कर रही है| किताब, कॉपी, ड्रेस, ब्रांडेड जूते से लेकर अंडरवियर तक की दुकानें स्कूलों में खुलने लगी है| एमआरपी और खुदरा मूल्य या बाजार के नियमों में हेरफेर करके कैसे मुनाफा कमाया जा सकता है ये अब आईएमएफ वालों को हमारे प्राइवेट स्कूलों से सीखना चाहिए| बच्चे को अंग्रेजी सिखाने के सपने में गरीब अभिभावकों की चमड़ी उधेड़ ली जा रही है| मौसम के मिजाज के अनुसार अभिभावकों को दो गुने दाम पर कम-से-कम एक जोड़ी ड्रेस खरीदनी पड़ रही है| कई स्कूलों में सप्ताह में तीन अलग-अलग रंगों के यूनिफार्म पहनकर आने की गाइडलाइन जारी है| ड्रेस का कलर हर साल बदल दिया जाता है ताकि नया खरीदना पड़े| जूते से लेकर मोज़े तक के डिजाईन और कलर में फेर बदल की जाती है ताकि उसका कोई छोटा भाई या बहन इस्तेमाल न कर पाए| हर स्कूल अपने-अपने ठगने के नियमों में नियमित संशोधन करते रहते हैं| स्कूलों ने अपने हिसाब से किताबें छापकर मनमाने दाम वसूलने का इंतजाम कर रखा है और हर साल बच्चे को विद्वान बनाने की कोशिश में उसकी कवितायों या मुख्य पृष्ठ में बदलाव कर दिया जाता है ताकि वो किसी किसी के पुराने किताब न खरीद ले|
                                                      
आजादी, आर्थिक स्वतंत्रता जैसे जुमले राजनीति में खूब तरक्की कर रही है पर स्कूलों के मसले पर हवा टाइट हो जा रही है| कई जागरूक अभिभावक स्कूलों के इस संगठित लूट पर इकठ्ठे होकर विरोध-प्रदर्शन भी कर रहे हैं और डीएम से लेकर प्रधानमंत्री तक को भी लिख रहे हैं| भले ही असर कुछ नहीं हो रहा हो पर ये हांथ-पैर जरूर चला रहे हैं| सीबीएसई का गाइडलाइन नेताओं, अफसरों और उपरी पहुँच वाले लोगों पर लागू नहीं होता| हर साल हंगामा मचाता है और हर साल नए-नए ढेर सारे दिशानिर्देश दिल्ली से निकलती है पर स्कूलों तक नहीं पहुँचती| बल्कि इससे उलट प्राइवेट स्कूलों की मनमानी दिन पर दिन बढती जा रही है| राजनीतिक पार्टियाँ इस मसले पर कभी गंभीर नहीं होती क्योंकि प्राइवेट स्कूल काले धन उगाही का एक बड़ा सुरक्षित अड्डा माना जाता है| चंदे की राशि का दोगुना, तिगुना बच्चों के माँ-बाप से वसूले जा रहे हैं|

इस तरह के लूटेरे टाइप स्कूलों में पढनेवाले बच्चे adidas, action के जूते पहनकर उसैन बोल्ट नहीं बन सकते और न ही एक्स्ट्रा एक्टिविटी में समय बर्बाद कर ओलिंपिक में पहुँच सकते हैं| नर्सरी के बच्चों को 5-6 हज़ार की किताबों से पढ़कर न्यूटन तो नहीं बनाया जा सकता या लाखों-लाख एडमिशन फी वाले स्कूलों में पढ़ाकर बच्चे को आइन्स्टीन भी पक्का नहीं बनाया जा सकता| हद तो ये भी है की कई स्कूलों ने शर्ट के बटन में भी स्कूल का लोगो खुदवाया हुया है जिसके टूटने पर 20-30रु० का इंतजाम हो ही जाता है| साइंस किट और स्टेशनरी के सामानों की आज के जरूरतों के हिसाब से बहुत जरुरी है, तो इस तरह से आर्यभट्ट और वराहमिहिर जैसे लोग झूठे होंगे|

अभिभावकों को लाचार बना दिया गया है| विरोध करने पर बच्चे को स्कूल से निकाले जाने की धमकी भी उन्हें ‘मदर ऑफ़ आल बम’ की तरह ‘मदर ऑफ़ आल धमकी’ जैसी शक्ति देता है| अनुशासन के नाम पर लेट फाइन ठगी का नया अविष्कार है| पेरेंट्स-टीचर मीटिंग का एकमात्र उद्देश्य अभिभावकों को बच्चे के भविष्य के नाम पर ब्लैकमेल करके उनकी जेब लूटना है| स्कूलों की इन गुंडागर्दी का परोक्ष कारण स्कूल के मालिक का पूर्व आईएस, आईपीएस या नेता होना है|
स्कूलों के लूटकर पैसे कमाने की सनक बच्चे का भविष्य क्या बनाएगा नहीं पता, पर उसे संगठित तौर पर ठग जरूर बना सकता है|

प्राइवेट स्कूलों की बढती मनमानी शोषण का नया तरीका भी कहा जा सकता है और पढ़े-लिखे नागरिकों को आर्थिक गुलाम बनाने की आधुनिक कला भी| गुलामी का ये चक्र अंग्रेजों से भी भयावह है और निश्चित ही वो एक मानसिक गुलामों की एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रही है न्यूटन, आइन्स्टीन बनने के सपने में बेरोजगार बनकर सरकार के आंकड़ों का गुलाम जरूर बन बैठेगा...
नहीं तो राजनीति का जरूर...  

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लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...


Friday, 21 April 2017

लाल बत्ती भाई को मेरा ख़त

लाल बत्ती भाई, इतने दिनों तक नेताओं, अफसरों और अमीरों के सर पर चढ़े रहने के बावजूद भी तुम्हें देश याद नहीं करता था| जो देश की सवारी करता था तुम उसकी सवारी करते थे, इसलिए हम तुम्हें याद कर रहे हैं, देश याद कर रहा है| क्योंकि तुम 1 मई से किसी कबाड़ख़ाने में पड़े रहोगे या बच्चे के खिलौने बनकर उनकी तोड़फोड़ सहोगे| अंग्रेजों के जमाने से ही तुम चमचमाती और लूटी गई गाड़ियों की शान रहे हो, वीआईपी का सिंबल रहे हो पर तुम आम आदमियों को कभी भी तनिक न सुहाए| बत्ती के अन्दर मुंडी घुमाकर देश चलाने वाले से लेकर देश बेचने वाले तक की चमचागिरी की फिर भी तुम्हें गरीबों की हाय लगी| तुम घमंड करो न करों लेकिन तुम्हारे नीचे गाडी में बैठने वाला तो तुम्हारे दम पर खुद पर घमंड करता था|

पुलिस, व्यवस्था या अधिकारी सब को तुम डराते थे| मुफ्तखोरी के सिंबल से भी कहीं-कहीं नवाज दिए जाते थे| नियम-कानून सब तुम्हें देखकर आँखें मूंद लेते थे| और वो तुम्हारा भाई हूटर...
उसने उसने तुम्हारे साथ मिलकर ट्रैफिक व्यवस्था को जैसे बजाया है, वैसे ही अब मोदी तुम्हारी बजा रहा है| ध्वनि प्रदूषण हूटर से तो होता ही था, लेकिन गरीबों-बेसहारों के आँखों से जो तुम प्रकाश प्रदूषण करते थे, उससे उनकी तिलमिलाई आँखों ने तुम्हें नजर लगा दिया| अमीरियत और शख्सियत का शान अब कबाड़ी में बेचे जाने का इन्तजार करेगा| पता है लाल बत्ती भाई, तुम उसी नियम-कानून से गाड़ियों से उतारे जा रहे हो, जिस कानून का तुम्हें नेताओं ने कभी सम्मान करना नहीं सिखाया| सिपाही-थानेदार अब तक जो देखते ही सॉल्लुट मारते थे, अब वही तुम्हारे कारण गाड़ी रुकवाएगा और मुक़दमा चलाएगा|

तुमने अपने जीवनकाल में मुफ्तखोरों से लेकर अपराधियों, देशद्रोहियों और ईमानदार-कर्तव्यनिष्ठ लोगों तक का सफ़र तय किया| पैसा, पॉवर और रुतबे को नजदीक से देखा| ईमान बेचते देखा, ईमान खरीदते देखा, गरीबी को अमीरी का पाँव पड़ते भी देखा और तुम्हें पाने के लिए वो सबकुछ करते देखा जो नहीं देखना चाहिए| लेकिन लुच्चे-लफंगों के सर पर बैठकर तुम्हारा मन नाचने को पक्का नहीं करता होगा| क्योंकि माना की तुमको अंग्रेजों ने बनाया, पहचान दिलाया फिर भी हो तो तुम भारतीय ही| गरीबों के अधिकारों के हत्यारे भी तुम्हारे कारण उन्हीं गरीबों के बीच इज्जत और जयकारे पा जाते थे, इसलिए दोषी तो तुम भी हुए!

पर लाल बत्ती भाई, राजनीति को तुमसे बेहतर किसने समझा होगा? सत्ता का असली सुख नेताओं को तब महसूस होता था जब तुम अपने भाई हूटर की आवाज पर नाचते हुए सड़कों से गुजरते थे| ईमानदारी से कहूँ तो मैंने जितनी भी बार तुमको देखा है मैं तुमसे जला हूँ| मेरे जैसे कितनों के सपनों के अरमान थे तुम| तुम्हारा रंग पाने की चाहत में युवा खुद को पसीने के रंग में रंग दे रहे हैं| कोई तुम्हें पाने के लिए शॉर्टकट अपनाता है और वह राजनीति ने नाम पर चमचागिरी की सड़ांध मारती गटर में खुद को उतारकर हाईकमान की कृपा का इन्तजार करता है|

पर सच कहूँ लाल बत्ती भाई तो तुम्हारे आगे लगी सरकारी नेम प्लेट तुम्हारी सफलता की गारन्टी लेता था| नहीं तो मैंने कई बार तुम्हें फिरे ब्रिगेड की गाड़ियों से जाम छूटने के इन्तजार में पसीने से तर-बतर देखा है| और तुम्हारा पडोसी, नीली बत्ती! उसे एम्बुलेंस की छत पर चढ़कर शर्मिंदा होना पड़ता है क्योंकि उसकी अहमियत बताने वाला डंडाधारी उसमें नहीं बैठा होता| तुम नेता ले जा रहे होते हो और वह जीवन ले जा रहा होता है फिर भी नेताओं के आगे जीवन का कोई मोल नहीं| वैसे भी नेताओं के नजरिये से आबादी में संतुलन बेहद जरूरी है पर हाँ लोकतंत्र के लिए नेताओं की आबादी में संतुलन नहीं होनी चाहिए!

तो लाल बत्ती भाई, तुम जा रहे हो...  बहुत कमी खलेगी....  हमारे नहीं, नेताओं की जिन्दगी में| क्योंकि अब कौन डराएगा?
पुलिस-प्रशासन, टोल-नाके सब उन गाड़ियों को टोका-टोकी करेंगे| हाईवे पर ट्रक वाले से कुटाई का डर रहेगा और ट्रक वालों का लहरिया कट ओवरटेकिंग का एक नया दौर शुरू होगा| और तो और टेम्पों वालों से भिड़ने पर माननीय को दो-चार झापड़ लगने का भी पूरी सम्भावना रहेगी...
#क्योंकि_हर_भारतीय_VIP_है

        तुम्हारा शुभचिंतक

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Thursday, 13 April 2017

अंबेडकर का महिमामंडन

संविधान के निर्माता व दलितों का मसीहा कहे जाने वाले डॉ भीम राव अंबेडकर का महिमामंडन उनकी शख्शियत को सीमित कर रहा है| राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए या आरक्षण की मांग को लेकर दलित-दलित चिल्लाने वाले अंबेडकर को बेच रहे हैं| उनके सपने को व्यक्तिगत स्वार्थ की पूर्ति का साधन बनाया जा रहा है| रोज नए-नए दलित प्रेमी पैदा हो रहे हैं और अंबेडकर बनने की चाह में दलितों के अधिकारों का सौदा कर दे रहे हैं| कोई वेमुला आता है तो कोई जेएनयू से कन्हैया आता है| दोनों को आजादी चाहिए, बस फर्क इतना है की उन्हें उनके अंबेडकर के संविधान से आजादी चाहिए, स्वार्थ से नहीं| राजनीतिक ठेकेदारों से पूछना चाहिए की जातियता के विमर्श में दलित होने का अधिकार उनसे कौन छीन रहा है? दलित होने से कौन रोक रहा है?

दलितों के सामाजिक उत्थान की कोशिशों का समूचा ठेका बाबा साहब के पास पड़ी है| आरक्षण के प्रावधानों में दलितों के लिए खूब सोंचा गया, उनके भविष्य निर्धारण के लिए दूसरों का हक़ तक छिना गया| फिर भी आज दलित दलित क्यों है? अंबेडकर के सपनों को लागु कराने वाले ठेकेदार करोड़ों की गाड़ियों में कैसे घुमने लगे? अंबेडकर के नाम और उनकी मूर्तियों का इस्तेमाल करके दलितों के लोकतान्त्रिक अधिकारों को किसने हड़पा? अगर ऐसा था तो रोहित वेमुला की क्रांतिकारी आदर्शों के सामने अंबेडकर की क्या जरुरत है|

भेदभाव-छुआछुत के उन्मूलन के लिए संविधान में बाबा साहेब ने कड़े प्रावधान बनाए| संविधान का निर्माण किया, देश के लिए सोंचा न सोंचा पर दलितों-शोषितों की बेहतरी के लिए खूब दिमाग खपाया| अंग्रेजों के कानून बदले न बदले पर दलितों के लिए कानून बदले, आर्थिक मदद का इंतजाम किया और समानता के सपने देखे| फिर भी दलित उतना क्यों नहीं बदला जितना बदलना चाहिए था? दलितों की विकास रफ़्तार अन्य जातियों के पैरों में दलित विरोधी की बेड़ियाँ लगे होने के बावजूद भी कम कैसे रही? आजादी के इतने सालों के बाद आज जब समाज, उसकी संकीर्ण सोच, उसकी मानसिकता और व्यव्हार में जो व्यापक परिवर्तन हुआ है फिर भी जातियता के बंधन में दलित शब्द का चोट अंबेडकर  को घायल करता है| ये चोट जातिवाद के उस संकीर्ण मानसिकता का परिणाम है जिसमें एक दलित ही दलित का उत्थान नहीं चाहता है|

डॉ भीम राव अंबेडकर एक अच्छे संविधान निर्माता हों न हों लेकिन एक अच्छे समाजसेवी जरूर थे| इतिहास उठाकर देखें तो डॉ राव के सन्दर्भ में ढेरों बातें शोर पैदा करती है| आजादी में उनका कोई योगदान ने होने से लेकर गोलमेज विवाद, ब्रिटिशों का पक्ष लेने से लेकर लन्दन में टाई-कोर्ट पहनकर स्वदेशी आन्दोलन का मजाक बनाने तक है| बौद्ध बन जाने तक भी है और आरक्षण विवाद तक भी| शायद इसलिए भी आरक्षण व्यव्स्था उनके दलित होने की सोंच की ही उपज थी|
Image result for ambedkar imagesआरक्षण से देश जोड़ने की हकीकत में एक तरफ आज दलितों का उठता जीवन स्तर और बढ़ती सामाजिक स्वीकार्यता है तो फिर दूसरी तरफ आरक्षण का लाभ उठाये अयोग्यों से देश चलवाकर देश को फिर से सोने की चिड़िया बनने के सपने भी हिलोर मार रही है....!!!

बस दलित-दलित चिल्लाकर या अंबेडकर की मूर्ति बनाकर दलितों के लोकतान्त्रिक अधिकारों को खरीदों मत !!!

लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...

Tuesday, 4 April 2017

हिन्दू स्वाभिमान की गाथा ‘राम’

अयोध्या में रामजन्मभूमि विवाद से देश के हिन्दू स्वाभिमान और उनके इष्टदेव भगवान राम की व्यापक अवहेलना हुई| राजनीतिक और धार्मिक स्वार्थ के पहलुओं पर इतने संवेदनशील मसले को टरावा दिया जाना हिंदुत्व और हिन्दू जनमानस की भावनाओं से खेलना है| सरकार और कोर्ट ने रामजन्मभूमि को आजादी के बाद से ही जनभावना की क़द्र न करके इस्लामी कट्टरपंथियों और आक्रमणकारियों की स्मृति में हिन्दूओं की आस्था और विश्वास का खूब मखौल उड़ाया| अयोध्या और भगवान राम की आस्था को सेकुलरों ने बिना पेंदे के लोटे जैसा व्यव्हार जताया, फिर भी किसी को हिन्दूओं की मासूमियत और सहनशीलता पर किसी को तरस नहीं आया|

बात सिर्फ अयोध्या में बाबरी मस्जिद की नहीं हैं, बल्कि मथुरा, काशी विश्वनाथ सहित उन सभी मंदिरों की है जिसे विध्वंस करके मस्जिदें बनाई गयी| इस्लामी बर्बरता, रक्तपात और विध्वंश की यादें इन्हें देखकर हिन्दूओं को हज़ार साल गुलामी की घावें हरी कर देता है| बाबर से लेकर औरंगजेब और गजनवी की बर्बर इतिहास का प्रतीक समभाव व धार्मिक समता में हमेशा आड़े आता है| रक्तरंजित और खंजरों के इतिहास को लोकतान्त्रिक व्यवस्था में लादकर चलना व्यवस्था को पंगु बनाता है| इस्लामी कट्टरपंथ ने दुनिया और भारत में मुसलमानों के व्यवहार में काफी परिवर्तन लाया है| उनकी सोच में काफ़िर और गैर-इस्लाम जैसी मनोवृति इस्लाम को अन्य धर्मों से दूर कर रही है|
इस्लामी कट्टरपंथियों का उत्पात का ही नतीजा पहले भारत में नरेन्द्र मोदी, अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप और फिर योगी आदित्यनाथ हैं| मुस्लिमों को समझना चाहिए की दुनिया में धर्म के नाम क्रूसेड या हिन्दू बनाम मुसलमान या मुस्लिम बनाम ईसाई की उनकी जंग कमजोर पड़ने लगी है|

भारत में रामजन्मभूमि मसला कोई नया नहीं है| या उनका यह समझना भी गलत होगा की ये संघ या भाजपा द्वारा प्रायोजित हिन्दूओं को भडकाने की साजिश है| रामलला और बाबरी विवाद आजादी के पहले से है और तब से है जब संघ-भाजपा आस्तित्व में भी नहीं थे| रामलला हमेशा से हिन्दूओं की जनभावना, आस्था का लौ रहा है| आस्था के केंद्र में बाबरी विध्वंस का अतीत भी है तो भव्य राम मंदिर के सपने भी है| मुसलमान ये कतई न सोंचें की अदालतों और सेकुलरों की आड़ में ये मामला बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक बनकर वैसे ही टला रहेगा जैसे कांग्रेस के जमाने में था| मतलब साफ़ है की हिन्दूओं का अपने धर्म के प्रति सजगता उसे गंभीर बना रही है| मंदिर निर्माण में मुस्लिमों और सेकुलरों का थोथा हद बेशक हिन्दू युवा नौजवानों को दूसरा रास्ता पकड़ा सकती है| क्योंकि प्रश्न भगवान राम के अस्तित्व का है|

Image result for जय श्री राम imageहिन्दू स्वाभिमान की गाथा वर्तमान में तो रामजन्मभूमि से जुड़कर मंदिर निर्माण के सपने तक है| हिन्दू स्वाभिमान का दर्द तम्बू में राम से भी है और सरकार का अदालत में गिडगिडाने से भी है| मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् राम की आस्था-विश्वास हिन्दू नवजागरण की चेतना है| इसी के मूल में राजनीति के शिखर पर आरएसएस की उपस्थिति और भगवाधारी को राजयोग मिलना नए हिंदुत्व का आगाज है... संकेत स्पष्ट है...


Image result for jai shri ram logo imageलेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...