Saturday, 28 January 2017

Battle ground of U.P. election

Upcoming U.P. legislative election have created a endless race course arena to convince voters with day-dream of undesirable development, poverty, hunger, lodge etc. All of the political parties is trying to attract people with every possible prospects like that election is the last to eradicate whole calamity from the state. Just called it as a ‘NETA TYPE’ propaganda and may of then want to look original socialistic politicians behind the background of Bahubali. Voters have no idea about any parties. In fact, because history till independence prove it. People has choosen those leaders who ever suck their profits, their rights and also try to down their voice.
                                                                        
U.P. knows for the highest population so, naturally it has a largest enrolled voters in the country. Political potential of the state effected very sharply to the national politics. Now, U.P. has strucked among SP, BSP, BJP etc but No one could prove its loyalty to the state. Where, Mayawati’s corruption high as elephant contrarily, Akhilesh yadav’s inability in maintenance of law and order also should a top priority of voters at the time of vote cast. Muslim and Anti-Muslim incumbency of U.P. hits political gaining of BJP and caste-politics of state also draw a major role play in election. Religious polarization is the biggest issue for BJP. Communal rites of mujaffarnagar and dadari kand  is the key point of BJP for political support of bigot hindu’s or sympathetic vote for hope of ram mandir, which probably a panacea topic of manifesto of BJP but not a realistic.

It is time, People have to decided very consciously. They needn’t pay attention towards glimpase of promises. Voters of U.P. should define among them and choose who is truly sincere about state’s upgrowth and prosperity of backward.


Image result for battleground of upWriter:   “Ashwani Kumar”, who is the author of कहने का मन करता है... (ashwani4u.blogspot.com)

Monday, 23 January 2017

जल्लीकट्टू ने औकात दिखाई...

जनता के मनोभाव, उनके आस्था, उनकी परम्परा या उनकी सांस्कृतिक गतिविधियों पर बिना सोंचे समझे प्रहार करना हमारी व्यवस्था, हमारे न्यायतंत्र के लिए एक अच्छा सबक मिला है| धर्म आधारित आस्था व विश्वास के सांस्कृतिक पहलुओं पर कोर्ट को खुद मसीहा घोषित करने का दांव इस बार उल्टा पड़ गया| जनमानस की भावनाओं को अनदेखा करना या फिर जबरन उनके आचार-विचार में अपने तुगलकी फरमान ऊपर से थोप देना व्यवस्था के लिए सीख है| तमिलों ने दिखाया की वे कैसे अपनी अस्मिता के लिए सरकार से भीड़ कर अपनी बात मनवायेंगे और अदालत के निर्णयों की अवहेलना कर सकते हैं|

पशु क्रूरता संरक्षण से संबंधित पेटा की अपील पर 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने जल्लीकट्टू पर प्रतिबन्ध लगाया था| सरकार की एक के बाद एक अपील को खारिज कर कोर्ट ने जनता को चिढाया| खाने में हड्डियाँ चूस-चूसकर खाने वाले लोंगों के पशु प्रेम ने जनता को उग्र होने पर मजबूर किया| अपनी सांस्कृतिक विरासत छिनते देखकर भी तमिलों का संयम पिछले दो वर्षों से नहीं टुटा, पर इस बार युवा तमिल नौजवानों के स्वयंस्फूर्त जोश ने व्यवस्था से लड़ने-भिड़ने को प्रेरित किया| सोशल मीडिया में दक्षिण के साथ-साथ उत्तर भारतीयों ने जल्लीकट्टू का जिस तरह समर्थन किया, अदालत को आँखें दिखाई, सरकार को निकम्मा घोषित किया वही आज जल्लीकट्टू बहाल करने की चिंगारी बनी| तमिलों के इस विरोध ने भारत की सांस्कृतिक विविधता में की जा रही तोड़-फोड़ को एक नई दिशा दिखाई है| मतलब, लोग अब क्या खाएं, क्या पहनें, क्या खेलें-क्या कूदें इसके लिए अदालतों का मुंह नहीं देखेंगे| जाहिर सी बात है की जनता के हिंसक और उग्र रवैये से न लोकतंत्र का भला होगा और न ही अदालतों के हठी रवैये से जनता का|

भारत में हिन्दुओं के धार्मिक आस्थाओं, विश्वास में जितना सुधार हुआ है उसी ने हिन्दू एक जीवन शैली की पहचान दिलायी| सती-प्रथा, नरबली, पशु-हत्या, हिन्दू विवाह, स्त्रियों को समान हक़ जैसे सुधारों ने भारत को मानवीय दृष्टिकोण से संवेदनशील बनाया| इस्लामी सुधारों के प्रति सामाजिक संगठनों और अदालतों का विद्रोह का डर हमेशा पैठा रहा है| पशु-क्रूरता की पराकाष्ठ वाले इस्लाम पर पेटा जैसे संगठनें कहीं नहीं दिखती| तो सिर्फ सांढ़ों को बगैर नुकसान पहुंचाए खेल-खेलने में ये इतने संवेदनशील हो सकते हैं तो तमिल और हिन्दू अपनी परम्परा के लिए क्यों नहीं? सरकार और अदालतों का धर्म विभेद बेशक इस बार हिन्दुओं की मनोदशा में गहरा पैठा है|

तो कुल मिलाकर जल्लीकट्टू विवाद दादागिरी से दादागिरी का भिड़ना माना जाएगा| मतलब अदालतों की दादागिरी रवैये को इस बार युवाओं ने दादागिरी से भिड़कर सरेआम बेइज्जती कर दी| यक़ीनन, पिछले कुछ सालों में धर्म-आस्था के मसले पर बेवजह दिलचस्पी दिखाकर अदालतों ने अपने को बार-बार नीचा दिखाया है| जनता की संवेदनशीलता सरकार आसानी से परख सकती है और उसे जन-जागरूकता के माध्यम से ही धीरे-धीरे उनके व्यवहारों में सुधार लाया जा सकता है|
नहीं तो डंडे की भाषा इस्तेमाल करने में आत्म-विश्वास कभी-कभी भारी पड़ जाती है और लोग सांढ की तरह उग्र होकर लाठी से व्यवस्था को हांक भी डालते हैं...

Image result for jallikattu issue imageलेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...




Saturday, 21 January 2017

ट्रंप युग का आगमन

दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति की सत्ता अब औपचारिक तौर पर डोनाल्ड ट्रंप के हाथों में आ गयी है| अमेरिकी राजनीति के शिखर पर एक ऐसा व्यक्ति काबिज हुआ है जो न तो देश के प्रबुद्ध मीडिया वर्ग को स्वीकार्य है और न ही बड़ी पढ़ी-लिखी और गंभीर आबादी को| डोनाल्ड ट्रंप की अस्पष्ट नीतियाँ, इस्लाम को अमेरिका से बाहर करने की प्रतिबद्धता और गैरजरूरी आर्थिक-राजनीतिक बयानबाजी उन्हें सत्ता तक पहुंचा गयी| ये हकीकत कई मायनों में भारत के 2014 चुनावों के वक्त मोदी लहर की पुरान्वृति कही जा सकती है|

डोनाल्ड ट्रंप के चुनावी अभियानों में इस्लामी आतंकवाद और कट्टरपंथी विचारधारा को नेस्तनाबूत करने की उनकी सोच वर्तमान वैश्विक माहौल से प्रेरित है| अमेरिका सहित तमाम पश्चिमी देश आईएसआइएस व अन्य इस्लामिक आतंकवादी संगठनों के मचाये उत्पात से सहमा था| ऐसे वक्त में अमेरिका जैसी महाशक्ति के राजनीतिक-आर्थिक हालातों को नज़रअंदाज कर खुलेआम इस्लामी आतंकवाद को चुनौती देना ट्रंप को प्रचलित बना गया| मतलब, अमेरिकी जनता के लिए अब आर्थिक चुनौतियों से बढ़कर आतंकवाद का डर ज्यादा महत्वपूर्ण बन गया है| ट्रंप जैसी शख्सियत का उदय 21वीं सदी को या तो सबसे बड़ा वैश्विक सुधार के लिए जाना जाएगा या फिर वैश्विक उथल-पुथल का जिम्मेदार| वक्त और हालात जैसे भी हों पर ट्रंप प्रशासन का ज्यादातर ध्यान अमेरिकियों के लिए ही होगा| अगर ऐसा हुआ तो दुनिया भर के देशों से अमेरिका का प्रभाव निश्चित तौर पर घटेगा और चीन जैसे देशों की मनमानी से सामरिक टकराव जैसी स्थितियों से इंकार भी नहीं किया जा सकता|

दूसरी तरफ सीरिया, लीबिया, मिस्र या अफगानिस्तान जैसे देशों के आतंकवाद पर अमेरिका को बेहद सावधानी से काम करना होगा| क्योंकि इन देशों में पनपे आइएसआइएस और तालिबान जैसे संगठन अमेरिका, रूस सहित पश्चिमी देशों के अथक प्रयास के बाद भी कुछ भी बिगाड़ा न जा सका है| अब देखना होगा की ट्रंप इन संगठनों के आस्तित्व पर कितना भारी पड़ पाते हैं| या उनकी कार्यकुशलता सिर्फ अमेरिका को आतंकवाद से मुक्त रखने को है ये वक्त बतायेगा|

भारत के प्रति ट्रंप की नीति में उदारवाद की झलक थोड़ी बहुत तो मिली है| अमेरिकी-हिन्दुओं के संबोधन में ‘आई लव हिन्दू’, ‘आई लव इंडिया’ जैसे शब्द और मोदी की नीतियों का समर्थन, शायद उनके कार्यकाल में भारत-अमेरिका संबंधों को एक नई ऊंचाई पर ले जाए| भारत को अपने आर्थिक हितों के साथ-साथ ट्रंप की चीन विरोधी नीतियों से चीन को भी साधना होगा और आतंकवाद पर उनके रुख से पाकिस्तान को भी| अब देखना ये होगा की नरेन्द्र मोदी भारत के हितों के लिए ट्रंप का कितना समर्थन हासिल कर पाते हैं|

डोनाल्ड ट्रंप ने ‘मेड इन इंडिया’ की तरह ‘मेड इन अमेरिका’ का नारा दिया| जो खुले तौर पर अमेरिकियों के लिए चीनी सामानों पर निर्भरता कर करने के स्पष्ट संकेत हैं| दक्षिण चीन सागर पर चीन की दादागिरी से अमेरिका टकराव के मुड में दिख भी रहा है| जापान, फिलीपिंस, ताइवान व दक्षिण कोरिया भी इस मुद्दे पर चीन से परेशान रहा है| ऐसे में भारत को चाहिए की किसी तरह इन सारे देशों को एक साथ जोड़कर अमेरिका के साथ चीनी आयात को कम करने के लिए आपसी सहयोग की संधि बनाए| ऐसी स्थिति में चीन की अर्थव्यवस्था बुरी तरह लड़खड़ा जायेगी| जिस कारण दुनिया की आर्थव्यवस्था से चीन की गैरजिम्मेदाराना नीतियाँ अपेक्षाकृत प्रभावहीन हो सकती है|

Image result for donald trump against islam imageइस तरह अमेरिका के नए राष्ट्रपति के रूप में डोनाल्ड ट्रंप का आगमन उम्मीदों का मेघ लेकर आया है| इन बादलों में किसी को कुछ दिख नहीं रहा है| कितना पानी बरसेगा या सिर्फ मोर नाचने के बादल हैं ये भी वक्त बतायेगा| हवा चलेगी, मेघ उड़ेंगे तो शायद कुछ अंदाजा लग पायें| फिर भी ट्रंप से रूस को भी उम्मीद है, भारत को भी उम्मीद है और वैश्विक शांति बहाली की भी|
हो सकता है ‘दारुल-ए-इस्लाम’ इस्लाम का राज कायम करने की मंशा बदल जाए| नहीं बदली तो वो समझ जाएँ की ये सहिष्णुता की बात करने वाले ट्रंप नहीं बल्कि इस्लाम विरोध के झंडाबरदार डोनाल्ड ट्रंप हैं..... मान जाओ.... नहीं तो आस्तित्व के लिए संघर्ष करोगे...

लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...