Monday, 8 May 2017

नौकरी मुक्त भारत?

भारत में सरकारी और प्राइवेट सेक्टर में तेज़ी से घटती नौकरियां, सरकार की नौकरी मुक्त देश की तरफ कदम बढ़ा सा प्रतीत होता है| सरकारी कर्मचारियों की रिक्त स्थानों में लगातार कटौती रोजगार की संभावनाओं पर करारा प्रहार है| विकास और आर्थिक प्रगति के तमाम दावों के बावजूद भारत में रोजगार का परिदृश्य और भविष्य धुंधला ही नजर आता है| एक रिपोर्ट में कहा गया है की बीते चार वर्षों से रोजाना साढ़े पांच सौ नौकरियां गायब हो रही है| यह दर अगर सरकार के मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया जैसी जुमलेबाजी से जारी रही तो वर्ष 2050 तक देश से 70 लाख नौकरियां ख़त्म हो जायेंगी|

इसी तरह रेलवे की गैर तकनीकी संवर्ग में बहाली का वर्ष 2015 की नियुक्ति प्रक्रिया भी सरकार के नौकरी मुक्त भारत के सपनों की भेंट चढ़ चुकी है| विभिन्न पदों के 18,252 नियुक्तियों को बहाली प्रकिया में लेटलतीफी का खामियाजा युवाओं को भुगतना पड़ रहा है| डिजिटल और कैशलेस इंडिया के सपने को हकीकत बनाने के लिए 4229 पदों को ख़त्म करके अब मात्र 14,023 रिक्तियां दिखाई जा रही है| मतलब साफ़ है की सरकार की मंशा सीधी तौर पर रेलवे को आईआरसीटीसी तथा अन्य कॉर्पोरेट दलालों को पूरी तरह सौंपने की दिखाई देती है| दूसरी तरफ रेलवे संसाधन की कमी का हवाला देकर नित्य नए नए किराये वृद्धि का प्रस्ताव देती रहती है लेकिन कर्मचारियों की नियुक्ति पर मौन साध लेती है| अभी हाल में अख़बार के रिपोर्टों के अनुसार केंद्र सरकार के विभिन्न दफ्तरों में 2 लाख से अधिक खाली पड़े क्लर्क ग्रेड की नौकरियां समाप्त कर दी गयी| मतलब, भविष्य में रोजगार और बेरोजगारी के मुद्दों पर युवाओं को रिक्तियां न होने का परमानेंट जबाब सरकार ने ढूढ निकला है|

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट है की सरकार का लक्ष्य 2020 तक राजकोषीय एवं राजस्व घटे को कम करने की है| इसका सबसे बेहतर उपाय युवाओं के हक़ को छिनकर नेताओं के गैर-जरूरी और अय्याश्बाजी पर जनता का पैसा उडाना है| गैर-आधिकारिक स्त्रोत के मुताबिक सरकार ने पिछले कुछ सालों में उधोगपतियों का लगभग 32 लाख करोड़ का कर्ज माफ़ किया| सच्चाई की पुष्टि के लिए तो हम युवाओं के पास न तो संसाधन है और न ही जनता की कमाई को लुटाने का खैराती अधिकार! फिर भी सरकार के रवैये से एक नजरिये में सच भी प्रतीत होता है| इसी तरह माल्या जैसे रईसों के 9,000 करोड़ रूपये लेकर भाग जाना सरकार की राजकोषीय और आर्थिक नीतियों के लिए एक मामूली घटना होती है जिसे समय-समय पर जनता के ऊपर नए-नए टैक्सों और अतिरिक्त सेस जोड़कर घाटे की पूर्ति कर ली जाती है|

सरकार की आर्थिक नीतियों में रोजगार की संभावनाओं की अनदेखी भविष्य में भयावह सामाजिक असमानताओं के ओर स्पष्ट तौर पर इशारा कर रही है| सरकारी विभाग कर्मचारियों और अधिकारियों की व्यापक कमी से हांफ रहा है, फिर भी सरकार रोज नये-नये स्कीमों को लादकर अपनी पीठ खुद थपथपा रही है| सरकार की नज़र में अर्थव्यवस्था में काफी तेज़ी से बढ़ रही है| सेंसेक्स काफी तेज़ी से नयी उचाईयां छू रहा है| रेटिंग एजेंसीयां भारत को एक बड़ी आर्थिक महाशक्ति भी मानने लग गया है| बस समस्या यही है की अगर सरकार नौकरियां जारी करने लगे तो अर्थव्यस्था चौपट हो जायेगी| फिजूलखर्ची बढ़ेगी, खजाने पर दबाब बढेगा! लेकिन नेताओं की वेतन-सुविधा वृद्धि आर्थिकी की रफ़्तार में गति लाती है!
हद है भाई जनता को चुतिया बनाने की!

अवसर की समानता के नाम पर सरकार ठेके पर नौकरियां देने लगी है| युवा नौकरी की तलाश में वक्त, समय और पैसा सब बर्बाद कर रहे हैं, लेकिन सरकार आर्थिक नाकेबंदी का हवाला देकर युवाओं का भविष्य बर्बाद कर दे रही है| अक्सर नौकरियां देने के मसले पर सरकारी अमला आंकड़ों का सहारा लेकर बड़ी आसानी से युवाओं को ये समझा देता है की सरकार पूरी तरह से उनकी रोजगार की जरूरतों की दिशा में काम कर रही है बस सपना देखते रहे! अक्सर नौकरियों को सरकारी खजाने पर बोझ समझा जाता है पर उसी खजाने का एक बड़ा हिस्सा नेताओं के वेतन, पेंशन और सुविधाओं पर गैर-जरूरी खर्च होता है|
कभी नेताओं, मंत्रियों की संख्या को आर्थिक बोझ क्यों नहीं माना जाता? अगर दफ्तरों में 50 फीसदी कर्मचारियों से ही जनता का काम चल सकता है तो फिर 50 फीसदी सांसद, मंत्रियों से सरकार क्यों नहीं चल सकती? एसी कमरों और होटलों में ही सरकारी बैठकें क्यों होती है? एक महीने लिए भी सांसद या विधायक बनने वालों को जनता के पैसे जीवन भर पेंशन देने का खैराती अधिकार सरकार को किसने दिया?

सवाल बेहद तीखे और गंभीर हैं| राजकोषीय घाटे की आड़ में जनता और युवाओं से चुतियागिरी करने का साहस उन्हें हमसे ही आता है| वे जिस लोकतंत्र और संविधान के हवाले हमारे भविष्य से खिलवाड़ करते हैं, उसे उसी की भाषा में उनकी राजनीतिक भविष्य को ठिकाने लगाना होगा|
नहीं तो एक दिन सारे युवा इन चोरों का गुलाम बनकर किसी पार्टी का झंडा कंधे पर ढोते नज़र आओगे... कभी अतिराष्ट्रवादी बनकर... तो कभी बाबा साहब और संविधान के झूठे रक्षक बनकर... तो कभी किसी के गुलाम बनकर हक़ छिनवाते रहोगे...
दलाल ही कहलाओगे और कुछ नहीं...

लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...


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