Monday, 21 March 2016

समाज को खोखला करता तलाक का फैशन

एक अनजानी मासूम अजनबी सी लाडली अपनी जन्मभूमि को छोड़ किसी पराये घर में पराये व्यक्ति के साथ रहने जाती है, जहाँ उसका अपना कोई नहीं होता सिवाय रिश्तों के| लेकिन हम मर्द उस एहसास को कभी महसूस नहीं कर पाते चाहे वो कितना भी पढ़ा-लिखा हो, कितना भी समझदार क्यूँ न हो? एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत अगले कुछ ही सालों में तलाक के मामले में दुनिया के सभी देशों को पीछे छोड़ देगा यानी हमारा भारत सबसे ज्यादा तलाकशुदा आबादी वाला देश होगा, इसमें कोई शक नहीं| लोगों में अकेलेपन की आदत होने लगेगी नतीजा, की सामाजिक प्राणी कहा जाने वाला मनुष्य धीरे-धीरे अनसोशल होता जाएगा| उनके बच्चे अनाथों की तरह पलने लगेंगे| वो सब बाद में, पहले तो ये सोंचना होगा की भारत में बढती तलाक का प्रचलन किसकी देन है? इसकी जडें, इसके मूल हमारी किस चूक का परिणाम है? क्या हमारा भारत, हमारा समाज सचमुच में कहीं उसी आधुनिकतावाद का शिकार तो नहीं हो गया जिसकी भयावह कल्पना हमारे पूर्वज किया करते थे?

बिलकुल! देश के अन्य राज्यों की तुलना में महानगर की हैसियत रखने वाले राज्य व दिल्ली-मुंबई जैसे शहर तलाक-अलगाव के एक ऐसे भंवर में फंसे चले जा रहे हैं, जिसके कारण उनका भविष्य बर्बादी तक पहुँचने में तनिक भी देर नहीं लगाएगा| मॉडर्न लाइफस्टाइल, शराब, पार्टी, डांस, जुआ, प्यार, रोमांस की दुनिया उन्हें इतनी भाती है की उन्हें पता ही नहीं चलता की कब उनकी इस हंसती-खेलती परिवार में शक और धोखा शामिल हो गयी और वही अच्छी से लगने वाली दुनिया नीरस-उबाई लगने लगती है| अलगाव की वजह बन जाती है| अगर तलाक के बढ़ते मामलों में अधिकतर केसों की वजह देखें तो वह रिश्तों में विश्वासघात करने की शक होती है| और यही चलन महानगरों से धीरे-धीरे छोटे शहरों-गाँवों में तेज़ी से रफ़्तार पकड़ रही है|
Image result for divorce imagesहमारे हिन्दू समाज में शादियाँ भरोसे की नाजुक सी नींव पर टिकी होती है, जहाँ पति और पत्नी दोनों को समझदारी से कदम से कदम मिलकर चलते रहना होता है| रिश्तों में जरा सी चूक खासकर के आजकल के युवा वर्ग सहन नहीं कर पाते चाहे लड़का हो या लड़की| मुझे तो ऐसा लगता है की अगर देश में सचमुच कहीं असहिष्णुता बढ़ रही है तो वो परिवारों में! पति और पत्नी के बीच में| कोई किसी की जरा सी बात सुनने-समझने को तैयार नहीं है| कोई किसी से झुककर रिश्तों को बचाने में मर्द अपनी मर्दानगी और औरत अपनी बराबरी वाले नारों पर प्रश्न-चिन्ह लगा हुआ मानने लगती है|

नतीजा क्या हो रहा है? साल दर साल घर के झगडे आँगन से निकलकर समाज में जाने की जगह कोर्ट पहुँच रहे हैं| समाधान निकालने की जगह एक-दूसरे को देख लेने और सबक सिखाने की महत्वकांक्षा समाज को बर्बाद कर रही है| आजकल की मॉडर्न लड़कियां आधुनिकता और संवेदनहीनता के मसले पर लड़कों से कई गुना आगे जा चुकी है| आधुनिकता के नाम पर या बराबरी के नाम पर खुद को घर का खलीफा घोषित कर लेती है| सास की ताने सुनने की जगह परिवार वालों को दहेज़-उत्पीडन में फंसा डालने की आजादी का अश्लील जश्न मनाती है| पतियों को अपना गुलाम बनाकर रखना चाहती है या वो चाहती है की उसका पति हर काम उसकी मर्जी से करे, उसकी पसंद की बात हो| समाज के लिए खतरा बनते इन लोगों को सबक सिखाने की जरूरत और प्रतिबधता दिखाने में हमारी कोर्ट या सरकार अबतक असफल साबित हो रही है|

फिर भी हम उन मासूम महिलाओं के ऊपर हो रही अत्याचार को तो नज़रंदाज़ नहीं कर सकते, जिनकी गलती सिर्फ इतनी होती है की वो भारत के उन्हीं 40 करोड़ आबादी में पैदा हुई जो दहेज़ में घर, गाडी क्या देना एक शौचालय भी बनवा पाने का हैसियत नहीं रखता| ऐसा नहीं है की हर घरेलु झगड़ों में सिर्फ महिलायें ही दोषी होती है| समाज में मैंने अबतक अपने जीवन के 19 वसंत की अनुभवहीन अवधि बिताई है फिर भी काफी कुछ देखा और सिखा है| मैंने समाज में बहुत सी नारियों को देखा जिन्होंने दुसरे का घर बर्बाद कर रखा था और कई मर्दों को भी देखा जिन्होंने अपनी पत्नी का जीना दूभर कर रखा था| लेकिन हैरानी ये थी की हर एक ऐसे बिगरैल पतियों की डोर किसी न किसी महिला के हाथ में जरूर थी जो उसे मनचाहे तरीके से नचा लेती थी|

मुश्किल ये है की देश में तलाक का बढ़ता प्रचलन मिडिल क्लास परिवारों को ज्यादा खोखला बना रहा है| अमीर तो गुज़ारे-भत्ते देकर आसानी से समस्या का हल निकाल लेते हैं और गरीब के पास भारत की इन खर्चालू अदालतों में पैसे बहाने की हैसियत ही नहीं तो वो दूसरा मार्ग अपना लेते हैं| पर मध्यम वर्ग कहाँ जाए? पति और पत्नी की लड़ाई में दोनों परिवार आपस में इतने उलझ जाते हैं की दहेज़ उत्पीडन, घरेलु हिंसा, भरन पोषण, तलाक सहित कई मुकदमें एक के बाद एक दर्ज करा दिए जाते हैं| पर अंत में अधिकतर को समाज के पंचायत में ही फैसले करने पड़ते हैं|

इसलिए अपने सार्थक भविष्य के लिए जिन्दगी में आने वाली कुछ गलत फहमियों को कोर्ट कचहरी के बजाये समाज में लाकर उसका हल निकला जाए तभी उसे समझदार माना जाएगा और समाज की भी ये जिम्मेदारी है की ऐसे मसलों पर निचले स्तर पर सुलझा देने की कोशिश करें| किसी के लिए सोंचे या न सोंचे लेकिन कुछ गलत करने से पहले अपने बच्चों के बारे में जरूर सोंचे| जो नहीं सोचता वो अपने वंश, अपने औलाद का सबसे बड़ा दुश्मन है...जाहिल है... गंवार है... (ये पति और पत्नी दोनों के लिए है)


लेखक:- अश्वनी कुमार, पटना जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’(ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...


2 comments:

  1. आप ने सही लिखा है ,मथ्म परिवार ही ज्यादा परेशान हैं।

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  2. आप ने सही लिखा है ,मथ्म परिवार ही ज्यादा परेशान हैं।

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