Monday, 28 March 2016

क्रांतिकारी बनना आसान नहीं...

Image result for krantikari imageअक्सर हमें एक सवाल परेशान करती है की हम क्रांतिकारी किसे कहें? उसे जो हथियार के दम पर गुलाम बनाने वालों को हथियार से ही दमन करता हो या उसे जिसने शांति से निहथ्थी भीड़ को आगे खड़ी करके गोलियां खिलवाई और दुश्मन की मलाई चाटते रहे| या उसे जो कई दशकों तक जेल की काल कोठारी में बंद रहकर देशप्रेम की पंक्तियाँ लिखी, कायरता को अपनी निडरता से हराया या यूँ कहें की पानी में रहकर मगरमच्छ से बैर किया| भारत वर्ष के इतिहास में हजारों क्रांतिकारी हुए जिन्हें ब्रिटिश हुकूमत न तो बंदूक से झुका पायी और न ही बाइबिल से| इन क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों को जैसे को तैसा पाठ पढ़ाकर नाकों दम कर रखा था| इन वीर सपूतों में सबसे पहला नाम वीर सावरकर का आता है| अंडमान के सेलुलर जेल में काले पानी की सजा काटना जीते-जी मर जाने जैसा है, फिर भी वे अंग्रेजों से देश को मुक्त करा डालने की प्रतिबद्धता नहीं छोड़ पाए| आज तो दो चाटें लगते ही लोग सब उगल देते हैं| शहीद भगत सिंह, राजगुरु, बोस, चन्द्रशेखर आजाद, जतिन दास, उद्धम सिंह जैसे क्रांतिकारी भले ही आज किताबों में गाँधी-नेहरु की तरह जगह नहीं बना पाए लेकिन, उनकी वीर गाथाएं आज भी देशप्रेम और राष्ट्रभक्ति की एक नई उन्माद पैदा कर देती है, जोश भर देती है| देश के लिए मर मिटना सिखाती है, गांधी और नेहरु से कई गुना ज्यादा|

भारत में पिछले 3-4 सालों में कई तथाकथित क्रांतिकारी पूर्णिमा की चाँद की तरह चमके और धीरे-धीरे कटते चले गए| इन क्रांतिकारियों ने गरीबी, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से देश को मुक्त कराने की अहिंसक कोशिश की| लेकिन बदले में उन्हें लाठियां मिली, जबरदस्ती अनशन तुडवा दिया गया, विरोध करने वालों को जेल में डाल दिया गया| और नतीजा ये हुआ की सत्ता की गर्मी से ये सारे क्रांति के पुतले मोम की तरह पिघल गए| इसी से सवाल खड़ा होता है की जब हमारी खुद की सरकार अनशन और अहिंसा से एक मनमाफिक जनलोकपाल तक नहीं दे पायी तो सोंचें पहले अहिंसा का कैसा कत्लेआम किया जाता होगा?

राष्ट्रवाद-देशप्रेम का पिटवां लोहे की तरह क्रांतिकारी पैदा तो हो रहे हैं, लेकिन देश का माहौल उन्हें राजनीति,लुट-खंसोंट के एक ऐसे ऐशागाह से गुजारती है की वो अपने विचार इसके मोह में बड़ा होते-होते मोम का बना डालता है| इनसब से बचकर गरीबी-भुखमरी से आजाद कराने के लिए एक क्रांतिकारी जैसे ही पनपता है वैसे ही देश को लूट रहे अलग-अलग म्यानों में एक सी धार वाली विचारधारा उसपर टूट पड़ती है और अस्तित्व तक ख़त्म कर देती है|

इसलिए मैंने कहा की क्रांतिकारी बनना इतना आसान कैसे है, जिन नेताओं को एक दिन ऐशो-आराम वाले जेल में रहले मात्र से तबियत ख़राब होने लगती है? काला पानी तो दूर इन्हें दिहारी मजदूरों के घरों में रख देना उससे भी बड़ी सजा होगी... अपनी ही बनाई नीतियों में घुटकर जियेंगे... तब पता चलेगा की भारत राष्ट्रराज्य की बनावट को संविधान के माध्यम से मनमाना बदलना कितना भारी पड़ता है...
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लेखक:- अश्वनी कुमार, पटना जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’(ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...


Shameful for our MP (Shatrughan Sinha)

Mr. Shatrughan sinha has elected Second times from Patna Sahib Constituency in 2014.  Mr. Sinha consists of very charmful, dashing & glamorous personality towards people especially bihar.  When he had elected as Member of Parliament in 2009, the majority of voters asked for development in their respected locality and otherwise loud the voice of people in parliament for plight of people’s living condition.  In that 1st tenure, he had rarely visited his constituency, also he didn’t try to build any project in their area.  I often watch the proceeding of Loksabha but, except one or two times, Mr. Sinha didn’t seems to be serious for his constituency.  Meanwhile, the responsible voters tried to paste his missing poster but, Mr. Sinha didn’t have any effect of that.

The storm of Modi in 2014, I don’t know, sinha how to manage or get 2nd time ticket from BJP at same constituency?  Where his image as a MP was negative.  The large No. of voters had astonished by the decision of BJP.  Because 1st tenure of sinha is too worst in the comparison of neighbor area’s MP.  However in 2014, Shatrudhna Sinha again elected MP, not at the power of himself but in the name of Narendra Modi.
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Two and half years passed without fulfilled any promises of Sinha.  Patna Sahib seem to be an orphan constituency in Loksabha.  An MP should careful for their people, but patna sahib have no voice in Loksabha, carefulness is far behind.  No one care for it.  Why should others look at it?  Because their MP often seen as sleepy posture in parliament, rare visits his area and rare arrival at parliament session.  whenever he is in any programme at patna sahib then, he always tells filmy dialogue ‘Khaamosh’.  But, In parliament, Mr. Sinha seemed to be smell a snake.  So, we are not appreciate the work of our mp till now.

Shatrughan Sinha is seems to be at proudy stance.  He is being expressed that type of insensitiveness for their people, he will pay for this.  No one party can save him by defeat, also BJP.  Voters had choosen for work, not for waste time or money.


Writer:- Ashwani kumar, who regret for casted his vote like that insensitive mp…

Monday, 21 March 2016

समाज को खोखला करता तलाक का फैशन

एक अनजानी मासूम अजनबी सी लाडली अपनी जन्मभूमि को छोड़ किसी पराये घर में पराये व्यक्ति के साथ रहने जाती है, जहाँ उसका अपना कोई नहीं होता सिवाय रिश्तों के| लेकिन हम मर्द उस एहसास को कभी महसूस नहीं कर पाते चाहे वो कितना भी पढ़ा-लिखा हो, कितना भी समझदार क्यूँ न हो? एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत अगले कुछ ही सालों में तलाक के मामले में दुनिया के सभी देशों को पीछे छोड़ देगा यानी हमारा भारत सबसे ज्यादा तलाकशुदा आबादी वाला देश होगा, इसमें कोई शक नहीं| लोगों में अकेलेपन की आदत होने लगेगी नतीजा, की सामाजिक प्राणी कहा जाने वाला मनुष्य धीरे-धीरे अनसोशल होता जाएगा| उनके बच्चे अनाथों की तरह पलने लगेंगे| वो सब बाद में, पहले तो ये सोंचना होगा की भारत में बढती तलाक का प्रचलन किसकी देन है? इसकी जडें, इसके मूल हमारी किस चूक का परिणाम है? क्या हमारा भारत, हमारा समाज सचमुच में कहीं उसी आधुनिकतावाद का शिकार तो नहीं हो गया जिसकी भयावह कल्पना हमारे पूर्वज किया करते थे?

बिलकुल! देश के अन्य राज्यों की तुलना में महानगर की हैसियत रखने वाले राज्य व दिल्ली-मुंबई जैसे शहर तलाक-अलगाव के एक ऐसे भंवर में फंसे चले जा रहे हैं, जिसके कारण उनका भविष्य बर्बादी तक पहुँचने में तनिक भी देर नहीं लगाएगा| मॉडर्न लाइफस्टाइल, शराब, पार्टी, डांस, जुआ, प्यार, रोमांस की दुनिया उन्हें इतनी भाती है की उन्हें पता ही नहीं चलता की कब उनकी इस हंसती-खेलती परिवार में शक और धोखा शामिल हो गयी और वही अच्छी से लगने वाली दुनिया नीरस-उबाई लगने लगती है| अलगाव की वजह बन जाती है| अगर तलाक के बढ़ते मामलों में अधिकतर केसों की वजह देखें तो वह रिश्तों में विश्वासघात करने की शक होती है| और यही चलन महानगरों से धीरे-धीरे छोटे शहरों-गाँवों में तेज़ी से रफ़्तार पकड़ रही है|
Image result for divorce imagesहमारे हिन्दू समाज में शादियाँ भरोसे की नाजुक सी नींव पर टिकी होती है, जहाँ पति और पत्नी दोनों को समझदारी से कदम से कदम मिलकर चलते रहना होता है| रिश्तों में जरा सी चूक खासकर के आजकल के युवा वर्ग सहन नहीं कर पाते चाहे लड़का हो या लड़की| मुझे तो ऐसा लगता है की अगर देश में सचमुच कहीं असहिष्णुता बढ़ रही है तो वो परिवारों में! पति और पत्नी के बीच में| कोई किसी की जरा सी बात सुनने-समझने को तैयार नहीं है| कोई किसी से झुककर रिश्तों को बचाने में मर्द अपनी मर्दानगी और औरत अपनी बराबरी वाले नारों पर प्रश्न-चिन्ह लगा हुआ मानने लगती है|

नतीजा क्या हो रहा है? साल दर साल घर के झगडे आँगन से निकलकर समाज में जाने की जगह कोर्ट पहुँच रहे हैं| समाधान निकालने की जगह एक-दूसरे को देख लेने और सबक सिखाने की महत्वकांक्षा समाज को बर्बाद कर रही है| आजकल की मॉडर्न लड़कियां आधुनिकता और संवेदनहीनता के मसले पर लड़कों से कई गुना आगे जा चुकी है| आधुनिकता के नाम पर या बराबरी के नाम पर खुद को घर का खलीफा घोषित कर लेती है| सास की ताने सुनने की जगह परिवार वालों को दहेज़-उत्पीडन में फंसा डालने की आजादी का अश्लील जश्न मनाती है| पतियों को अपना गुलाम बनाकर रखना चाहती है या वो चाहती है की उसका पति हर काम उसकी मर्जी से करे, उसकी पसंद की बात हो| समाज के लिए खतरा बनते इन लोगों को सबक सिखाने की जरूरत और प्रतिबधता दिखाने में हमारी कोर्ट या सरकार अबतक असफल साबित हो रही है|

फिर भी हम उन मासूम महिलाओं के ऊपर हो रही अत्याचार को तो नज़रंदाज़ नहीं कर सकते, जिनकी गलती सिर्फ इतनी होती है की वो भारत के उन्हीं 40 करोड़ आबादी में पैदा हुई जो दहेज़ में घर, गाडी क्या देना एक शौचालय भी बनवा पाने का हैसियत नहीं रखता| ऐसा नहीं है की हर घरेलु झगड़ों में सिर्फ महिलायें ही दोषी होती है| समाज में मैंने अबतक अपने जीवन के 19 वसंत की अनुभवहीन अवधि बिताई है फिर भी काफी कुछ देखा और सिखा है| मैंने समाज में बहुत सी नारियों को देखा जिन्होंने दुसरे का घर बर्बाद कर रखा था और कई मर्दों को भी देखा जिन्होंने अपनी पत्नी का जीना दूभर कर रखा था| लेकिन हैरानी ये थी की हर एक ऐसे बिगरैल पतियों की डोर किसी न किसी महिला के हाथ में जरूर थी जो उसे मनचाहे तरीके से नचा लेती थी|

मुश्किल ये है की देश में तलाक का बढ़ता प्रचलन मिडिल क्लास परिवारों को ज्यादा खोखला बना रहा है| अमीर तो गुज़ारे-भत्ते देकर आसानी से समस्या का हल निकाल लेते हैं और गरीब के पास भारत की इन खर्चालू अदालतों में पैसे बहाने की हैसियत ही नहीं तो वो दूसरा मार्ग अपना लेते हैं| पर मध्यम वर्ग कहाँ जाए? पति और पत्नी की लड़ाई में दोनों परिवार आपस में इतने उलझ जाते हैं की दहेज़ उत्पीडन, घरेलु हिंसा, भरन पोषण, तलाक सहित कई मुकदमें एक के बाद एक दर्ज करा दिए जाते हैं| पर अंत में अधिकतर को समाज के पंचायत में ही फैसले करने पड़ते हैं|

इसलिए अपने सार्थक भविष्य के लिए जिन्दगी में आने वाली कुछ गलत फहमियों को कोर्ट कचहरी के बजाये समाज में लाकर उसका हल निकला जाए तभी उसे समझदार माना जाएगा और समाज की भी ये जिम्मेदारी है की ऐसे मसलों पर निचले स्तर पर सुलझा देने की कोशिश करें| किसी के लिए सोंचे या न सोंचे लेकिन कुछ गलत करने से पहले अपने बच्चों के बारे में जरूर सोंचे| जो नहीं सोचता वो अपने वंश, अपने औलाद का सबसे बड़ा दुश्मन है...जाहिल है... गंवार है... (ये पति और पत्नी दोनों के लिए है)


लेखक:- अश्वनी कुमार, पटना जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’(ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...


Friday, 11 March 2016

महिला हिमायती बनने का ढोंग मत रचो...

अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर देश और दुनिया के तमाम अखबार महिला सशक्तिकरण पर अपने विचारों के माध्यम से ढोंग रचाते नज़र आये| क्या अखबार, क्या मीडिया, क्या फेसबुक सब पर महिलाओं के लिए कसीदे पढ़े जा रहे थे, उनकी बेहतरी के लिए आवाज उठाने का दिखावा कर रहे थे| वैसे लोगों को भी आवाज उठाते देखा जो हर सुन्दर और हकीकत सी दिखने वाली प्रोफाइल पिक्चर पर फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजते है|  नेताओं की बात सुनी तो हर बार की इस बार भी लगा की अब हमारे भारत को महान बनने में देर नहीं लगेगी| लेकिन अगले चैनल पर गया तो मेरी सारी उम्मीदें हर बार की तरह इस बार भी धराशाई हो गयी, इसलिए की वो चैनल ये दिखा रहा था की एक बार दिग्विजय सिंह किस तरह से एक महिला सांसद को देखकर कह रहे थे की क्या टंच माल है| ये कुछ उसी तरह है की महिलाओं की बेहतरी का जिम्मेदार इंसान ही उसकी मजबूरी का फायदा उठाता हो, उसका नाम क्या बताना? नेता तो नाम से बदनाम हैं असली मज़ा तो दिन के उजाले में तोंद के सहारे कुकर्म छिपाने वाले अफसर उठाते हैं|

Image result for women protection india imageमहिलाओं की इज्जत करें, उसे आत्मनिर्भर बनाएं, उसे लड़कों की तरह आजादी दें या महिला सशक्तिकरण, आत्मनिर्भरता, आत्मसम्मान, समान वेतन, वर्किंग वुमन जैसे शब्द किताबों और नेताओं की जुबानों की शोभा बनकर रह गयी है| अपने आसपास के माहौल में इन सारी शब्दों का कभी कहीं इस्तेमाल होते ही नहीं सुना| पिछले दिनों मैं इंटरनेट पर नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकडें देख रहा था, उसमें मैंने महिलाओं के प्रति ऐसे-ऐसे अमानवीय अपराधों के आंकडें पाए जिसे देखकर मुझे यकीन नहीं हुआ की क्या वाकई कोई ऐसा कर सकता है? लेकिन यह सच है... देश में महिला सुरक्षा से सम्बंधित सैंकड़ों क़ानून हैं पर किस काम के? अगर ये कानून वाकई सख्त है और महिलाओं को शोषण से न्याय दिलाती है, उसे हर तरीके की आजादी देती है तो क्यूँ आज भी महिला उत्पीडन के मामले साल दर साल बढ़ते ही जा रहे हैं?

इससे क्या साबित होता है? यही की हमारी अदालत कानून के माध्यम से इन दुराचारियों के मन में खौफ पैदा करने में असमर्थ है| दोषी कौन है? महिलाओं को पुरुषों पर इल्जाम लगाने से पहले खुद में सोंचना पड़ेगा की उसकी ऐसी हालत समाज की किस मानसिकता का परिणाम है और किन-किन तरीकों से उससे निजात पायी जा सकती है| महिला अधिकार के लिए संघर्ष कर रही वीरांगनाओं को सोंचना होगा उसे कुछ करना होगा| सबसे पहले अपने नीति-निर्माताओं को जबाबदेह बनाना होगा, उससे पूछना होगा की किसकी अनुमति से और किस मानसिकता से वे लोग विज्ञापनों में महिला बदन की नुमाइश करते हैं? अंग प्रदर्शन की इजाजत देते हैं ताकि आने वाली पीढ़ी का लक्ष्य लड़की पटाना हो?

आजकल की लडकियां भी कुछ कम नहीं| आधुनिकता की दौर में अंधे होकर वे भी मॉडर्न बनना चाहती है सुन्दर दिखना चाहती है जहाँ पब है, शराब है, नशा है, प्यार है, शक है तो धोखा भी है| जिस पश्चिमी सभ्यता का वो अन्धानुकरण कर रही है वहां की लड़कियां इस ब्लैक होल से बाहर निकलने के लिए भारत की तरफ देख रही है, जहाँ 85% से अधिक विवाहों का अंत तलाक है| अलग-अलग राजनीतिक मांगों के लिए अक्सर हाथ में तख्ते लेकर प्रदर्शन करने वाली महिलाओं को कभी ये क्यूँ नहीं सूझता की समाज में टीवी और फिल्मों में अश्लीलता जघन्य अपराधों की मूल जड़ है| ये सभी चीजें लड़कों को लड़कियों से कुछ पाने के लिए प्रेरित करते हैं, एक मकसद तैयार करते हैं जिसमें डर और शर्म जैसी कोई बात ही नहीं होती|

महिला हिमायती बनाने का ढोंग रचाने वालों से मुझे सख्त नफरत है, उससे भी ज्यादा उन लड़कियों से, जो सुन्दरता को अपना हथियार बनाकर अपना उल्लू सीधा करती है, लोगों को ठगती है, उसे बेवकूफ बनती है वही उसे गलत रास्ते पर लेकर जाने की जिम्मेदार होती है| चाहे बात पहनावे की हो या लोगों को हुस्न की आजमाइश करके रिझाने की| इनसब को ठोकर लगती है तो ठीक है फिर भी उन मासूमों की क्या गलती है जिसे दुनिया की समझ नहीं| अगर लोगों के मन में कानून का तनिक भी खौफ होता तो वो ऐसी हरकतें करने से पहले सौ बार सोंचते| शायद ये लोग इसलिए नहीं डरते क्योंकि इन्हें पता है की पेट किसका नहीं होता और भूख किसे नहीं लगती...  और यहाँ तो डाल-डाल पर भूखे ही बैठे हैं...
                                                             
लेखक:- अश्वनी कुमार, पटना जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’(ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...