Friday, 27 May 2016

सडकें कुछ कहती है...

इंसानों को किसी तय गंतव्य तक पहुँचाने वाली सडकें अपनी हालत के अतिरिक्त कभी चर्चा में नहीं आ पाती| पर हाँ, अपने बदलते नामों की वजह से वह भी शायद खुद को कम्युनल या सेक्युलर सा फिल करती होगी या फिर हजारों नेताओं की तरह किस पार्टी का समर्थक बनूँ की दुविधा उसे परेशान करती होगी| सडकें भी सोंचती होंगी की अगर इस पार्टी की सरकार आ गई तो मेरी हालत बेहतर हो जायेगी| कोई होगा जो मेरे किनारे पर पड़ी इन धूलों को साफ़ करवा देगा या मेरे किनारे लगे पेड़ों को न काटने की गारंटी देगा| सड़क बनवाना किसी भी इंसान के लिए सबसे मलाईदार काम माना जाता है| छोडिये इन बातों को क्यूंकि मैं कुछ ज्यादा ही पॉलिटिकल होता जा रहा हूँ|

देश भर में किसी भी मुद्दे पर किसी ख़ास पार्टी का चमचा उस पार्टी की सड़ांध मारती विचारधारा को बुलंद करने इसी सड़क पर उतर जाता है| अपने मालिक के प्रति भक्ति दिखानी हो, वफ़ादारी साबित करनी हो या दिखावा करना हो तो सड़कों से बेहतर स्थान तो कोई हो ही नहीं सकता| तोड़फोड़ होना, आगजनी होना सचमुच का सड़क होने का सबसे बड़ा प्रमाण है| लोग ये क्यूँ भूल जाते हैं की देश की यही सडकें हमारे स्वतंत्रता सेनानियों का प्रतिक है| लाला लाजपत राय पर लाठियां बरसाना, पीर अली की फांसी, आजाद का शहीद होना या फिर शांतिपूर्वक प्रदर्शन करनेवालों पर पुलिस की गुंडई का प्रत्यक्ष गवाह रही है, हमारी ये सडकें| इसका मजहब भी पता नहीं चलता| सड़कों पर कीर्तन होते हैं तो तमाज भी पढ़ा जाता है| मूर्ति विसर्जन भी होता है, ताजिया भी निकलती है, जीसस की मोमबती लेकर भी चला जाता है तो वहीँ वाहे गुरु जी की प्रभात फेरी भी निकाली जाती है|

Image result for roads india imageसडकें हम से बहुत कुछ कहती है| यूँ फर्राटे भरता ट्रक, अमीरों को लेकर बेहताशा भागती कारें, आम आदमियों को पहुँचाने जाती बसें और गरीबों की साईकिल को अपने ऊपर से बिना किसी भेदभाव के एक समान सुविधा देती है ये सड़क| सड़कों के लिए अमीरी और गरीबी का फर्क बस इतना है की सडकें अपनी सोंधी मिट्टी की खुशबु का अहसास गरीब को ही कराती है, उसे धुल भरी झोंकें बिना उफ़ किये खा लेने लायक बना देती है| और इस तरह से सडकें इन गरीबों को अपने ढंग से तरासती है, अमीरों से कहीं ज्यादा|

सड़कों पर सबकुछ बिकता है| कानून के रखवालों का ईमान, मजबूरी का जिस्म, गरीबी की मेहनत, दिखावे का प्यार, अमीरों का पैसा सबकुछ ख़रीदा जा सकता है, पर भावनाएं नहीं| क्यूंकि इसी सड़क के किसी चौराहे पर पसीने से तर-बतर, बास मारती और फटे से कपडे पहनकर चिलचिलाती धुप में नंगी जमीन पर कटोरे के साथ कोई बैठा होता है और उसी वक्त किसी कारों की खिडकियों के अन्दर से कोई कुत्ता मजे से गाने की धुन पर थिरकता चला जाता है...और वो गरीब...

लेखक:- अश्वनी कुमार (ज्यादा नहीं लिखा पाया पर ये मेरी दरभंगा यात्रा के अनुभवों को एक अलग तरीके से लिखी अभिव्यक्ति है...)


Sunday, 15 May 2016

बेसुरी सी हो रही हमारी संगीत

भारतीय संस्कृति में शास्त्रीय संगीत का एक अहम स्थान है| भारतीय शास्त्रीय संगीत के बारे में तो ये भी कहा जाता है की रागों से पत्थर को भी मोम बनाया जा सकता है| भारतीय शास्त्रीय संगीत की ज्ञात इतिहास है की तानसेन को सुनने न केवल मानव बल्कि पशु-पक्षी और जानवर भी आया करते थे| तानसेन जैसा संगीतकार राग दीपक गाकर इतनी गर्मी पैदा कर देते थे की कमरे का सारा दीपक जल उठता था... उनके समय में जब राज्य के किसी भाग में सुखा या अकाल की स्थिति पैदा हो जाती थी तो तानसेन को भेजा जाता था| तानसेन में इतनी क्षमता थी की राग मल्हार गाके वर्षा करा दे, राग दीपक गाकर दीप जला दे और शीत राज से शीतलता पैदा कर दे| राग यमन, राग यमन कल्याण, राग भैरवी, ध्रुपद सरीखे रागों से न केवल रोगियों में आश्चर्यजनक सुधार होती थी बल्कि फसल भी तेज़ी से बढ़ने लगती और पशु दूध भी ज्यादा करने लगते थे| ये आज भी प्रमाणिक हैं...
Image result for indian traditional singing concert imageबनारस की ठुमरी, यूपी बिहार का चैता या राजस्थानी फोल्क की अपनी एक अलग पहचान है|

भारतीय संगीत की कला हमारे महान पूर्वजों से विरासत में मिली थी| पर आज भारतीय संगीत अपनी चमक खोता जा रहा है, उसे दिशा दिखाने वाले बॉलीवुड के ऐसे-ऐसे दिग्गज संगीतकार, गीतकार व गायक आ गए हैं जो अपनी हरकतों से भारतीय संगीत को लील जाने की मनोदशा लिए दिख रहे हैं| भारतीय संगीत लगभग अपनी आधी पहचान खो चूका है| जो बची-खुची है वो रंगमंच, थियेटरों में शास्त्रीय गायकी से ही है| हमारी संस्कृति, हमारी मनोदशा को पश्चिमी बना डालने की जिम्मेदारियों में हमारा बॉलीवुड काफी हद तक सफल भी हो रहा है| हिंदी फिल्मों में हिंदी से ज्यादा अंग्रेजी के बोल सुनाई देते हैं| हिंदी गानों में अंग्रेजी धुन बज रही है| झंकार, रीमिक्स और धूम-धडाके की महफ़िल लोगों के कुछ ज्यादा ही भाने लगी है| लोग जमकर थिरकते हैं, सीटियाँ बजाते हैं पर गाने को महसूस नहीं कर पाते| क्योंकि इन गानों में अंग्रेजी के अटपटे बोल और उसपर गिटार का झंकार संगीत की ऐसी-की-तैसी कर जाते हैं| ऐसा नहीं है की बॉलीवुड में भारतीय संगीत को जीवंत बनाए रखने गायक नहीं हैं| मन्ना डे, किशोर कुमार, रफ़ी, लता दीदी, आशा भोंसले, अनूप जलोटा, अनुराधा पौडवाल, कुमार सानु, अलका याग्निक......... जैसे संगीतकार बिना किसी प्रशिक्षण के बॉलीवुड में आकर असंख्यक लोगों के दिलों पर राज किया| लक्ष्मी कान्त प्यारेलाल की बोलों को लोग आज भी खुद पर महसूस कर पाते हैं| इनलोगों ने अपने-अपने वक्त में ऐसे-ऐसे सुपरहिट नगमें गाए हैं जो आज भी हर एक संगीत प्रेमी के रूह को छू जाती है| सबसे ख़ास बात ये है की इनके गायन में भारतीय शास्त्रीय संगीत की पूरी झलक मिलती है|

याद है, आज से कुछ साल पहले ए० आर० रहमान को संगीत के लिए ऑस्कर पुरस्कार मिला था| उस वक्त हम सभी गर्व से सीना चौड़ा कर कहते थे की हमारे देश के एक लाल ने ऑस्कर जीता है| पर अब मुझे महसूस होता है की मैं गलत था| क्या रहमान को ऑस्कर पुरस्कार भारतीय संगीत के लिए मिला था? नहीं| क्योंकि वो पुरस्कार अच्छे संगीत के लिए नहीं दिया गया था बल्कि उसमें पश्चिमी संगीत को मिलाया गया था इसलिए उसके जूरी को वो पसंद आया| यानी की भारतीय संगीत कितना भी बेहतर क्यूँ न हो , ऑस्कर लेना है तो हमें पश्चिमी संगीत को अपनाना होगा| उनके जैसा गिटारों की बेसुरे झंकारों पर हमें गाना होगा|

सवाल है, ऑस्कर हमें क्यूँ चाहिए? क्या विदेशियों को रागों, धुनों या शास्त्रीय गायन की रत्ती भर भी जानकारी है? फिर भी हम विदेशियों से अपने गायन पर ठप्पा लगाने को बेताब क्यूँ रहते हैं? ये तो ठीक वैसी ही बात है की अनपढ़ पढ़े लोगों की पढाई को सही या गलत ठहराए|  संगीत मां सरस्वती की देन है, किसी मानव की नहीं| फिर भी ऑस्कर मिलने के बाद हम कितने खुश हो रहे थे की जैसे मालिक ने हमें पुरस्कार दे दिया........ चाहे बात रिकार्डों की हो, नोबेल की हो, गिनीज़ रिकॉर्ड की हो या फ़ोर्ब्स-टाइम्स की सूची में आने की, इसकी हकीकत है की हम उनसे ठप्पा लगाने को लक्ष्य मान लेते हैं जिनकी सभ्यता-संस्कृति भारत को देखकर सीखी और बड़ी हुई| मतलब साफ़ है की हम अभी भी खुद को गुलामियत वाली मानसिकता से उबार नहीं पाए हैं|

संगीत किसी की विरासत नहीं हो सकती| चाहे वो बॉलीवुड हो या हॉलीवुड या कोई और| मुझे तो भारतीय संगीत की असली सोंधी खुशबु लोक गीतों से मिलती है| भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में इतने तरह के लोक गीत और इतने प्रकार के रागों में गाए जाते हैं की अगर हमारी फ़िल्मी दुनिया उसे समझ जाए तो भारतीय संगीत का कायाकल्प हो जाएगा| पर ऐसा हो भी नहीं सकता क्यूंकि देश का एक बड़ा युवा वर्ग घोड़े जैसे बालों में बेढंगे और बेसिर-पैर के गानों पर मिर्गी वाले डांस को ही असली टैलेंट समझते हैं| मेडोना, जस्टिन बिबर, शकीरा, लेडी गागा जैसे गायक इनके आदर्श हैं, जिनके यहाँ संगीत का मतलब बस गला फाड़कर चिल्ला देना भर होता है..... इसलिए कोई उम्मीद न करना ही बेहतर होगा फिर भी उम्मीद पर दुनिया कायम है और रहेगी.....

Image result for singing concert imageलेखक:- अश्वनी कुमार, पटना जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’(ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...Image result for singing concert image


Thursday, 12 May 2016

क्या इतिहास को छेड़ना जायज है?


हरियाणा के बाद राजस्थान के स्कूली पाठ्यपुस्तकों में जिस तरीके से छेड़छाड़ के आरोप लगाए गए, क्या वो जायज है? चूँकि वहां बीजेपी का शासन है ऐसे में तो विपक्षी कांग्रेस स्वाभाविक रूप से हर एक मुद्दे पर आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति बेशक करेगी| पर हमें इस मुद्दे को बिलकुल निष्पक्षता और गंभीरता से सोंचना होगा, क्यूंकि ये भारतवर्ष के इतिहास उसके आस्तित्व से जुड़ा मसला है| पिछले दो सालों में देश की शिक्षा का भगवाकरण करने के बहुत सारे चर्चे हुए, हंगामा हुआ, वामपंथी इतिहासकारों की मंशा पर भी सवाल उठाये गए तो वहीँ अवार्ड छीन लिए जाने की भी बातें की गयी| कभी अकबर को महान बताने की राजनीति की जाती है तो कभी महाराणा प्रताप को| कहीं महिषासुर की जाति बता डाली गयी तो कहीं किसी ने सम्राट अशोक को अपनी जाति का घोषित कर लिया| औरंगजेब रोड पर बवाल हुआ तो वहीँ गुरुग्राम को न स्वीकारने का प्रदर्शन चला| पर इसमें नया क्या था? कल सत्ता में कांग्रेस जो कर रही थी वो आज बीजेपी कर रही है| उसे भी सत्ता हासिल करने का इन्तजार कर लेना चाहिए फिर वो अपने अनुसार किसी बाबर, टीपू सुल्तान या जहाँगीर को भी महान घोषित करती रहेगी...

आरोप पहले भी लगते रहे हैं की कांग्रेसी और वामपंथी विचारधारा के तमाम इतिहासकारों ने देश पर अपनी मनोदशा से राय थोपी, अपने-अपने राजनीतिक फायदे के लिए अपनी-अपनी सहूलियत के अनुसार इतिहास को बदला| अगर यह सच है तो इसलिए भी ये और महत्वपूर्ण हो जाता है क्यूंकि हमारा भविष्य (बच्चे) उस वामपंथी इतिहासकारों के लिखे गए इतिहास को पढ़कर क्या वो एक निष्पक्ष नागरिक बन पायेगा? क्या वो इन इतिहासों से परे की सच्चाई जान पायेगा? या वो भी बड़ा होकर इस भंवर में फंसा रहेगा की अकबर एक महान प्रतापी राजा था, औरंगजेब एक निरंकुश लेकिन न्यायप्रिय शासक था या फिर वीर सावरकर, भगत सिंह, खुदीराम बोस, सुभाषचंद्र बोस देशद्रोही थे क्यूंकि वे गाँधी-नेहरु के आदर्शों की अवहेलना करते थे| ये सच है की देश में शासन के दौरान राष्ट्रहित से परे होकर हर चीज को अपने राजनीतिक फायदे के लिए बदल डालना कांग्रेस की ही सिखाई नियति है| मुझे याद है की इतिहास के किताबों में गाँधी-नेहरु-इंदिरा और राजीव की शख्सियत से एक-तिहाई आधुनिक इतिहास की किताबें भरी होती थी| बची हुई पन्नों में अन्य नेताओं का संक्षिप्त विवरण मात्र होता था|

राजस्थान के स्कूली पाठ्यक्रम में नेहरु को नजरअंदाज किया जाना गलत है| नेहरु ने चाहे कितनी ही त्याग की हो या धूर्तता की हो, फिर भी हमारे नौनिहालों को भारत के आधुनिक इतिहास की तो कम से कम सच्ची जानकारी मिले| प्राचीन इतिहास की विश्वसनियता हमेशा संदेह के दायरे में रही है| क्योंकि वे सारे इतिहास अंग्रेजी-आक्रमणकारी विचारधारा के लोगों द्वारा लिखा गया है जो इतिहास क्या, हमारे धर्म, आस्था, समाज और यहाँ तक की हमारे आचार-विचार को भी सही ढंग से नहीं जानते| इसलिए हमारी सरकार को आधुनिक इतिहास के मसले पर गंभीर होना होगा बिना किसी पूर्वाग्रह के| यदि किताबों में नेहरु की आजादी के लिए किये गए संघर्ष का जिक्र हो तो उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद की तमाम गलत निर्णयों का देश पर क्या प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, वो भी सम्मलित हो?

Image result for modern history of india imageशांति-पंचशील-गुटनिरपेक्षता का डंका बजाते-बजाते गलत नीतियों के कारण चीन से हारे ये भी पुस्तक में हो| इंदिरा का महिमामंडन हो तो ये भी बताया जाए की लोकतंत्र का गला किसने घोंटने की कोशिश की? और उसमें किन-किन नेताओं ने अपनी रोटियाँ सेंककर राजनीति की दूकान खोल ली? ऐसा नहीं है की किताबों में सारी सच्चाई सिर्फ कांग्रेस के लिए हो बल्कि हर उस दल, उस नेता, उस शख्सियत के लिए हो जिसने अपनी प्रतिभा से देश का मान बढाया हो या कारनामों से देश को बदनाम किया हो|

ऐसे में सिर्फ किताबों से नाम हटने पर इतना हल्ला है, अगर सच्चाई लिख दी गयी तो सारे प्रदर्शन करने वाले मुंह छुपाते नजर आयेंगे| इसलिए जरूरत है की सरकार एक निष्पक्ष आयोग बनाकर देशभर की स्कूली किताबों की समीक्षा कराये और उसमें जरूरत के हिसाब से परिवर्तन हो| नहीं तो अगले कुछ सालों में देश का भविष्य किताबों की जगह “इंसाल्लाह.... के साथ किसी ख़ास पार्टी की बर्बादी के नारे लगाता फिरेगा...  क्या नहीं?
                                           
लेखक:- अश्वनी कुमार, पटना जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’(ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...