Tuesday, 23 June 2015

लोकतंत्र पार्टियों का खेल है...

हम सब के चेहते पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी संसद में चर्चा करते हुए अक्सर कहा करते थे की 'लोकतंत्र संख्या का खेल है'। लेकिन जिस अंधाधुँध तरीके से राजनीतिक पार्टियों की संख्या बढ़ रही है उससे तो लोकतंत्र पार्टियों का खेल लगती दिख रही है। चुनाव आयोग के आँकड़ों के अनुसार अकेले देश में 1761 निबंधित पार्टियाँ है, जबकि खुदरा दुकानों जैसी अनिबंधित पार्टियों की कुल संख्या 1706 है। हमारे संविधान निर्माताओं ने भारत को बहुदलीय प्रणाली वाला लोकतंत्र तो बना दिया, पर इस कुकरमुते जैसी फलने-फुलने वाली दलों पर लगाम लगाने की कोई व्यवस्था नहीं की। नतीजा... आज हालात ये हैं की आयकर विभाग की नजरों से बचने के लिए कई लोग दुकान सजाकर बैठ जाते हैं, तो कई अपना स्वार्थ सिद्ध करने को देश के लिए चिंतन में लगे रहते हैं। उन्हें उनके भोपुओं से होने वाली आम-जनता कि परेशानी से कोई मतलब नहीं, इलाके में अपनी बेहतर छवि के लिए वे कितना ही धन लुटाने को तैयार होते हैं। फिलहाल, कुछ इसी तरीके से हमारे इलाके में भी एक नई पार्टी खुली है 'राष्ट्रीय सदाबहार पार्टी' । ठेले, चाय, फुटपाथीयों, सब्जीवालों की पार्टी 'राष्ट्रीय सदाबहार पार्टी'। अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे इस दल के घोषणापत्र को पढ़कर मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ। वही रटी-रटाई बातें, लोकलुभावन वादे व उन सब में छिपी अपनी सरकार बनाने के ख्वाब। पर इन सब में नया क्या? हमें पिछले 63 सालों से गरीबी मुक्त, सुख-सुविधा युक्त भारत के सपने दिखाए जा रहे हैं, लेकिन इसे हकीकत बनाने का सपना हमें कौन दिखायेगा? बिहार की वास्तविक हकीकत से हम सभी भलीभाँति परिचित हैं। सदाबहार पार्टी कहती है, हम 24 घंटे बिजली देंगे, महिलाओं के लिए 50 फीसदी आरक्षण का प्रावधान करेंगे, हम बिहार से भ्रष्टाचार हटा देंगे, हम फल, सब्जी, पानवाले, फुटपाथीयों के लिए दुकान का इंतजाम कर देंगे। लेकिन करेंगे कहाँ से? ये वादा तो हर राजनीतिक पार्टी करती है। दिल्ली में केजरीवाल ऐसे रटे-रटाये मुद्दों से सत्ता में नहीं पहुँचे! चुनाव लड़ने से पहले अन्ना आंदोलन से जुड़े, उन्होंने कितनी ही बार जेल की सैर की। भ्रष्टाचार, बिजली, पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं के ऊपर विश्वसनीय वायदा करके उन्होंने दिल्ली की जनता के बीच अपनी अच्छी पैठ बना ली थी। नतीजा? आज वो सत्ता तक पहुँच चुके हैं। लेकिन, अगर हम 'सदाबहार पार्टी' को देखें तो नाम के अतिरिक्त इनमें कोई ऐसी बात नहीं, जिससे ये जनता में लोकप्रिय हो सकें। इस पार्टी राष्ट्रीय अध्यक्ष उस क्षेत्र से चुनाव लड़ने वाले हैं, जहाँ बिहार-विधान सभा में विपक्ष के नेता 'नंदकिशोर यादव' की लोकप्रियता जनता के बीच चरम पर है। वे 1995 से अबतक अजेय हैं। दूसरी तरफ ओमप्रकाश यादव की शख्सियत उस ऊँचाई पर भी नहीं है, जो किसी पार्टी के अध्यक्ष में होनी चाहिए। न तो उन्होंने क्षेत्र के लिए कोई जनसेवा की है और ना ही कोई ऐसा काम कराया, जिससे मतदाता अपने नेता की छवि उनमें देख सके। हर राजनीतिक दल के अध्यक्ष, महासचिव खुद को क्रांतिकारी मानकर मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री के गुण खुद में देखने लगते हैं। ऐसे कुल मिलाकर देखा जाए तो, ये बहुत अच्छी बात है की हमारे इलाके से भी एक नेता उठ खड़ा हुआ है जो संभव है की हमारे अधिकारों के लिए लडेगा। इनकी पार्टी अगर अन्य दलों से कुछ अलग करती जैसे :- घोषणापत्र के स्त्रोतों का पता बताता, चुनाव सुधार, राईट टू रिकाल जैसी ज्वलंत मुद्दों पर अपनी मजबूत इच्छाशक्ति को जनता के बीच ले जाता तो ज्यादा बेहतर होता। ऐसा क्यों होता है की चुनाव के वक्त गरीबी, भुखमरी, जातिवाद को मुद्दा बनाकर वोट बैंक की तलाश की जाती है? जबकि पानी के मोटे पाइपों, सुरंगों और फुटपाथों पर तो गुजर-बसर करते लोग विकास के आँकड़ों के जीवंत कार्टून हैं। आखिर कार्टून बना किसने रखा है... हम सब जानते हैं..... लेखक - अश्विनी कुमार, जो एक स्वतंत्र टिप्पणीकार बनना चाहता है... लेकिन अभी उसकी इतनी हैसियत नहीं की वह अपने विचारों को खुलेआम प्रकट कर सके। शायद इसीलिए हमें यह ब्लाग बनाना पड़ा.....

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