15 May 2016

बेसुरी सी हो रही हमारी संगीत

भारतीय संस्कृति में शास्त्रीय संगीत का एक अहम स्थान है| भारतीय शास्त्रीय संगीत के बारे में तो ये भी कहा जाता है की रागों से पत्थर को भी मोम बनाया जा सकता है| भारतीय शास्त्रीय संगीत की ज्ञात इतिहास है की तानसेन को सुनने न केवल मानव बल्कि पशु-पक्षी और जानवर भी आया करते थे| तानसेन जैसा संगीतकार राग दीपक गाकर इतनी गर्मी पैदा कर देते थे की कमरे का सारा दीपक जल उठता था... उनके समय में जब राज्य के किसी भाग में सुखा या अकाल की स्थिति पैदा हो जाती थी तो तानसेन को भेजा जाता था| तानसेन में इतनी क्षमता थी की राग मल्हार गाके वर्षा करा दे, राग दीपक गाकर दीप जला दे और शीत राज से शीतलता पैदा कर दे| राग यमन, राग यमन कल्याण, राग भैरवी, ध्रुपद सरीखे रागों से न केवल रोगियों में आश्चर्यजनक सुधार होती थी बल्कि फसल भी तेज़ी से बढ़ने लगती और पशु दूध भी ज्यादा करने लगते थे| ये आज भी प्रमाणिक हैं...
Image result for indian traditional singing concert imageबनारस की ठुमरी, यूपी बिहार का चैता या राजस्थानी फोल्क की अपनी एक अलग पहचान है|

भारतीय संगीत की कला हमारे महान पूर्वजों से विरासत में मिली थी| पर आज भारतीय संगीत अपनी चमक खोता जा रहा है, उसे दिशा दिखाने वाले बॉलीवुड के ऐसे-ऐसे दिग्गज संगीतकार, गीतकार व गायक आ गए हैं जो अपनी हरकतों से भारतीय संगीत को लील जाने की मनोदशा लिए दिख रहे हैं| भारतीय संगीत लगभग अपनी आधी पहचान खो चूका है| जो बची-खुची है वो रंगमंच, थियेटरों में शास्त्रीय गायकी से ही है| हमारी संस्कृति, हमारी मनोदशा को पश्चिमी बना डालने की जिम्मेदारियों में हमारा बॉलीवुड काफी हद तक सफल भी हो रहा है| हिंदी फिल्मों में हिंदी से ज्यादा अंग्रेजी के बोल सुनाई देते हैं| हिंदी गानों में अंग्रेजी धुन बज रही है| झंकार, रीमिक्स और धूम-धडाके की महफ़िल लोगों के कुछ ज्यादा ही भाने लगी है| लोग जमकर थिरकते हैं, सीटियाँ बजाते हैं पर गाने को महसूस नहीं कर पाते| क्योंकि इन गानों में अंग्रेजी के अटपटे बोल और उसपर गिटार का झंकार संगीत की ऐसी-की-तैसी कर जाते हैं| ऐसा नहीं है की बॉलीवुड में भारतीय संगीत को जीवंत बनाए रखने गायक नहीं हैं| मन्ना डे, किशोर कुमार, रफ़ी, लता दीदी, आशा भोंसले, अनूप जलोटा, अनुराधा पौडवाल, कुमार सानु, अलका याग्निक......... जैसे संगीतकार बिना किसी प्रशिक्षण के बॉलीवुड में आकर असंख्यक लोगों के दिलों पर राज किया| लक्ष्मी कान्त प्यारेलाल की बोलों को लोग आज भी खुद पर महसूस कर पाते हैं| इनलोगों ने अपने-अपने वक्त में ऐसे-ऐसे सुपरहिट नगमें गाए हैं जो आज भी हर एक संगीत प्रेमी के रूह को छू जाती है| सबसे ख़ास बात ये है की इनके गायन में भारतीय शास्त्रीय संगीत की पूरी झलक मिलती है|

याद है, आज से कुछ साल पहले ए० आर० रहमान को संगीत के लिए ऑस्कर पुरस्कार मिला था| उस वक्त हम सभी गर्व से सीना चौड़ा कर कहते थे की हमारे देश के एक लाल ने ऑस्कर जीता है| पर अब मुझे महसूस होता है की मैं गलत था| क्या रहमान को ऑस्कर पुरस्कार भारतीय संगीत के लिए मिला था? नहीं| क्योंकि वो पुरस्कार अच्छे संगीत के लिए नहीं दिया गया था बल्कि उसमें पश्चिमी संगीत को मिलाया गया था इसलिए उसके जूरी को वो पसंद आया| यानी की भारतीय संगीत कितना भी बेहतर क्यूँ न हो , ऑस्कर लेना है तो हमें पश्चिमी संगीत को अपनाना होगा| उनके जैसा गिटारों की बेसुरे झंकारों पर हमें गाना होगा|

सवाल है, ऑस्कर हमें क्यूँ चाहिए? क्या विदेशियों को रागों, धुनों या शास्त्रीय गायन की रत्ती भर भी जानकारी है? फिर भी हम विदेशियों से अपने गायन पर ठप्पा लगाने को बेताब क्यूँ रहते हैं? ये तो ठीक वैसी ही बात है की अनपढ़ पढ़े लोगों की पढाई को सही या गलत ठहराए|  संगीत मां सरस्वती की देन है, किसी मानव की नहीं| फिर भी ऑस्कर मिलने के बाद हम कितने खुश हो रहे थे की जैसे मालिक ने हमें पुरस्कार दे दिया........ चाहे बात रिकार्डों की हो, नोबेल की हो, गिनीज़ रिकॉर्ड की हो या फ़ोर्ब्स-टाइम्स की सूची में आने की, इसकी हकीकत है की हम उनसे ठप्पा लगाने को लक्ष्य मान लेते हैं जिनकी सभ्यता-संस्कृति भारत को देखकर सीखी और बड़ी हुई| मतलब साफ़ है की हम अभी भी खुद को गुलामियत वाली मानसिकता से उबार नहीं पाए हैं|

संगीत किसी की विरासत नहीं हो सकती| चाहे वो बॉलीवुड हो या हॉलीवुड या कोई और| मुझे तो भारतीय संगीत की असली सोंधी खुशबु लोक गीतों से मिलती है| भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में इतने तरह के लोक गीत और इतने प्रकार के रागों में गाए जाते हैं की अगर हमारी फ़िल्मी दुनिया उसे समझ जाए तो भारतीय संगीत का कायाकल्प हो जाएगा| पर ऐसा हो भी नहीं सकता क्यूंकि देश का एक बड़ा युवा वर्ग घोड़े जैसे बालों में बेढंगे और बेसिर-पैर के गानों पर मिर्गी वाले डांस को ही असली टैलेंट समझते हैं| मेडोना, जस्टिन बिबर, शकीरा, लेडी गागा जैसे गायक इनके आदर्श हैं, जिनके यहाँ संगीत का मतलब बस गला फाड़कर चिल्ला देना भर होता है..... इसलिए कोई उम्मीद न करना ही बेहतर होगा फिर भी उम्मीद पर दुनिया कायम है और रहेगी.....

Image result for singing concert imageलेखक:- अश्वनी कुमार, पटना जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’(ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...Image result for singing concert image


12 May 2016

क्या इतिहास को छेड़ना जायज है?


हरियाणा के बाद राजस्थान के स्कूली पाठ्यपुस्तकों में जिस तरीके से छेड़छाड़ के आरोप लगाए गए, क्या वो जायज है? चूँकि वहां बीजेपी का शासन है ऐसे में तो विपक्षी कांग्रेस स्वाभाविक रूप से हर एक मुद्दे पर आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति बेशक करेगी| पर हमें इस मुद्दे को बिलकुल निष्पक्षता और गंभीरता से सोंचना होगा, क्यूंकि ये भारतवर्ष के इतिहास उसके आस्तित्व से जुड़ा मसला है| पिछले दो सालों में देश की शिक्षा का भगवाकरण करने के बहुत सारे चर्चे हुए, हंगामा हुआ, वामपंथी इतिहासकारों की मंशा पर भी सवाल उठाये गए तो वहीँ अवार्ड छीन लिए जाने की भी बातें की गयी| कभी अकबर को महान बताने की राजनीति की जाती है तो कभी महाराणा प्रताप को| कहीं महिषासुर की जाति बता डाली गयी तो कहीं किसी ने सम्राट अशोक को अपनी जाति का घोषित कर लिया| औरंगजेब रोड पर बवाल हुआ तो वहीँ गुरुग्राम को न स्वीकारने का प्रदर्शन चला| पर इसमें नया क्या था? कल सत्ता में कांग्रेस जो कर रही थी वो आज बीजेपी कर रही है| उसे भी सत्ता हासिल करने का इन्तजार कर लेना चाहिए फिर वो अपने अनुसार किसी बाबर, टीपू सुल्तान या जहाँगीर को भी महान घोषित करती रहेगी...

आरोप पहले भी लगते रहे हैं की कांग्रेसी और वामपंथी विचारधारा के तमाम इतिहासकारों ने देश पर अपनी मनोदशा से राय थोपी, अपने-अपने राजनीतिक फायदे के लिए अपनी-अपनी सहूलियत के अनुसार इतिहास को बदला| अगर यह सच है तो इसलिए भी ये और महत्वपूर्ण हो जाता है क्यूंकि हमारा भविष्य (बच्चे) उस वामपंथी इतिहासकारों के लिखे गए इतिहास को पढ़कर क्या वो एक निष्पक्ष नागरिक बन पायेगा? क्या वो इन इतिहासों से परे की सच्चाई जान पायेगा? या वो भी बड़ा होकर इस भंवर में फंसा रहेगा की अकबर एक महान प्रतापी राजा था, औरंगजेब एक निरंकुश लेकिन न्यायप्रिय शासक था या फिर वीर सावरकर, भगत सिंह, खुदीराम बोस, सुभाषचंद्र बोस देशद्रोही थे क्यूंकि वे गाँधी-नेहरु के आदर्शों की अवहेलना करते थे| ये सच है की देश में शासन के दौरान राष्ट्रहित से परे होकर हर चीज को अपने राजनीतिक फायदे के लिए बदल डालना कांग्रेस की ही सिखाई नियति है| मुझे याद है की इतिहास के किताबों में गाँधी-नेहरु-इंदिरा और राजीव की शख्सियत से एक-तिहाई आधुनिक इतिहास की किताबें भरी होती थी| बची हुई पन्नों में अन्य नेताओं का संक्षिप्त विवरण मात्र होता था|

राजस्थान के स्कूली पाठ्यक्रम में नेहरु को नजरअंदाज किया जाना गलत है| नेहरु ने चाहे कितनी ही त्याग की हो या धूर्तता की हो, फिर भी हमारे नौनिहालों को भारत के आधुनिक इतिहास की तो कम से कम सच्ची जानकारी मिले| प्राचीन इतिहास की विश्वसनियता हमेशा संदेह के दायरे में रही है| क्योंकि वे सारे इतिहास अंग्रेजी-आक्रमणकारी विचारधारा के लोगों द्वारा लिखा गया है जो इतिहास क्या, हमारे धर्म, आस्था, समाज और यहाँ तक की हमारे आचार-विचार को भी सही ढंग से नहीं जानते| इसलिए हमारी सरकार को आधुनिक इतिहास के मसले पर गंभीर होना होगा बिना किसी पूर्वाग्रह के| यदि किताबों में नेहरु की आजादी के लिए किये गए संघर्ष का जिक्र हो तो उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद की तमाम गलत निर्णयों का देश पर क्या प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, वो भी सम्मलित हो?

Image result for modern history of india imageशांति-पंचशील-गुटनिरपेक्षता का डंका बजाते-बजाते गलत नीतियों के कारण चीन से हारे ये भी पुस्तक में हो| इंदिरा का महिमामंडन हो तो ये भी बताया जाए की लोकतंत्र का गला किसने घोंटने की कोशिश की? और उसमें किन-किन नेताओं ने अपनी रोटियाँ सेंककर राजनीति की दूकान खोल ली? ऐसा नहीं है की किताबों में सारी सच्चाई सिर्फ कांग्रेस के लिए हो बल्कि हर उस दल, उस नेता, उस शख्सियत के लिए हो जिसने अपनी प्रतिभा से देश का मान बढाया हो या कारनामों से देश को बदनाम किया हो|

ऐसे में सिर्फ किताबों से नाम हटने पर इतना हल्ला है, अगर सच्चाई लिख दी गयी तो सारे प्रदर्शन करने वाले मुंह छुपाते नजर आयेंगे| इसलिए जरूरत है की सरकार एक निष्पक्ष आयोग बनाकर देशभर की स्कूली किताबों की समीक्षा कराये और उसमें जरूरत के हिसाब से परिवर्तन हो| नहीं तो अगले कुछ सालों में देश का भविष्य किताबों की जगह “इंसाल्लाह.... के साथ किसी ख़ास पार्टी की बर्बादी के नारे लगाता फिरेगा...  क्या नहीं?
                                           
लेखक:- अश्वनी कुमार, पटना जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’(ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...

04 May 2016

जन्मदिन मुबारक हो...

मेरी जिन्दगी में आज 20वें वसंत की आगमन हो गई| बचपन जिया, खेला, कूदा, मौज मस्ती की लेकिन उससे ज्यादा पढाई की| मैंने अपनी जिन्दगी कड़े अनुशासन में जिया| 7-8 साल की अवस्था में यहाँ मेरे स्कूल में साथ पढने वाले दोस्त शाम होते ही बैट-बॉल लेकर खेतों में खेलने चले जाते थे वहीँ मैं अपने दूकान के चबूतरे पर बैठकर कुछ वैसी ही आजादी पाने का सपना देखता था| मेरा भी मन करता की मैं भी अन्य दोस्तों की तरह गाँव के किनारे बहने वाली नदी में गोते लगाऊं, खेतों में मोटरगाड़ी की मुद्रा में दौडू या उनकी ही तरह पतंग उडाऊं और फोटो-गोली खेलूं| पर बचपन में मुझे खेलने या टीवी देखने की बिलकुल भी आजादी नहीं मिली| उस वक्त तो मेरी हालत और भी खराब हो जाती थी, जब टीवी पर शक्तिमान, जूनियर जी जैसे धारावाहीक आ रहे होते थे और मैं मन मसोस कर रह जाता था|
                                                                           
ये सब मेरे दादाजी के कठोर अनुशासन के नियम थे| कक्षा सात से ही वे मुझे 3 बजे रोज सुबह उठा देते चाहे गर्मी हो या सर्दी और पढने को कहते| नियम ऐसे थे की न उठो तो नींद में ही चप्पलों की बौछार हो जाती| नतीज़न डर से एक ही आवाज में उठकर लालटेन जलाकर मुझे पढना पड़ता| कुछ और भी सख्त नियम थे जैसे की भोर लिखना नहीं बल्कि पढना है वो भी बोलकर| पढ़ते समय दिवार के सहारे टिककर नहीं बैठना है, तकिया लेकर नहीं पढना है, क्यूंकि मेरे दादाजी के अनुसार ये सारी विश्राम की मुद्रा ला देती है| बहुत सख्त अनुशासन में मैंने अपना 14 साल जिया| सारी बातें बताना संभव नहीं| क्यूंकि मेरी जिन्दगी का बड़ा हिस्सा सरकारी स्कूलों के कमरों और लालटेन की रोशनी के बीच एक मीठी एहसास सी  रही| कभी अमीर बन पाने का ख्वाब भी नहीं देखा, बस हाई स्कूल तक हाफ पैंट में ही कपडे के झोले में किताब लेकर पढने जाता रहा|

पर अब मैं अपनी स्थिति की तुलना करता हूँ तो पाता हूँ की मेरा भविष्य इन कठोर अनुशासनों के बल पर एक सही और संतुलित मार्ग पर मौजूद है| मैंने जिन्दगी की इन 19 बसंतों में काफी कुछ देखा, काफी कुछ सिखा और समझा| तमाम परीक्षाओं में सफल होने के सुखद एह्साह को करीब से देखा तो असफल होने का दुख भी झेला|
जिन्दगी में बहुत सी बाधाओं, अरचनों को बहुत हिम्मत से अपने परिवार को भिड़ते देखा तो मेरे अन्दर भी किसी मुसीबत से मुकाबला कर सकने का साकारात्मक आत्मविश्वास पैदा हुआ| झुककर रहना मुझे कभी मंजूर नहीं रहा| क्यूंकि अन्याय के विरुद्ध झुककर रहना कभी सिखा ही नहीं| अपनी इस छोटी सी जिन्दगी में कितने ही बदतमीज और कामचोर सरकारी सेवकों को सबक सिखाई| चाहे वो मेरे से कितना भी बड़ा क्यूँ न हो उसकी हर एक बदतमीजी का कलम के सहारे माकूल जवाब दिया| पर भाग्यशाली रहा की मेरे अंदर गद्दारी कभी नहीं आ पायी| लेकिन मेरी कमजोरी यह है की गुस्सा और जलन मेरे अंदर मौजूद है और वो हमेशा इस प्रयास में रहती है की उनके मित्र (गद्दारी, धूर्तता, क्रूरता, इर्ष्या) कब पनपे? पर ईमानदारी का मोल लगाना सीखना मेरे जीवन की सबसे बड़ी सीख रही| और मुझे विश्वास है की मैं जब तक लिखता रहूँगा, ईमानदारी, प्रेम, निडरता और दया को अपने अंदर से जाने नहीं दूंगा|

जिन्दगी कितना कुछ सिखाती है| वो पत्थर को भी तरासकर उसे मूल्यवान बना देती है| पर शर्त है की पत्थर भी गुणवान और मेहनती होना चाहिए| जिंदगी जब हमें तरासती है तो दर्द होता है, मुश्किलें आती है और काफी तकलीफ भी होती है लेकिन जो उसे झेल जाता है वही अन्य पत्थरों की बीच जगमगाने लगता है और फिर जौहरी उसे पहाड़ों से लाकर तिजोरी में रख देता है| फिर तो उसके मूल्य के क्या कहने! ठीक इसी तरह मैं भी परिणाम की चिंता किये बगैर अपना लक्ष्य हासिल करना चाहता हूँ, पर ये लालच मानती ही नहीं| और मैं सपने देखने लग जाता हूँ|
         “असफलताएं आईं थी मुझे विचलित करने लेकिन उसे मैंने यूँ ही ठुकरा दिया ये कहकर की तुम्हारी क्या औकात जो मेरी शख्सियत का फैसला तुम करो जिसके पास बदनामी के अलावे देने को कुछ है ही नहीं”

तो कुल मिलाकर जिंदगी के हर फैसले का एक मोल होता है और उससे ही उसकी नियति निर्धारित होती रहती है| मेरी नियति मुझे जहाँ लेकर जाए लेकिन मैं अपनी नियति को भाग्य के सहारे नहीं छोड़ सकता| मेहनत करता रहूँगा क्यूंकि मेहनत का मूल्य मिलते देखा है... बस कमी है तो मेरे सफल होने ही...


            || आप सभी को मेरे जन्मदिन पर मेरा चरणस्पर्श ||