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21 January 2017

ट्रंप युग का आगमन

दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति की सत्ता अब औपचारिक तौर पर डोनाल्ड ट्रंप के हाथों में आ गयी है| अमेरिकी राजनीति के शिखर पर एक ऐसा व्यक्ति काबिज हुआ है जो न तो देश के प्रबुद्ध मीडिया वर्ग को स्वीकार्य है और न ही बड़ी पढ़ी-लिखी और गंभीर आबादी को| डोनाल्ड ट्रंप की अस्पष्ट नीतियाँ, इस्लाम को अमेरिका से बाहर करने की प्रतिबद्धता और गैरजरूरी आर्थिक-राजनीतिक बयानबाजी उन्हें सत्ता तक पहुंचा गयी| ये हकीकत कई मायनों में भारत के 2014 चुनावों के वक्त मोदी लहर की पुरान्वृति कही जा सकती है|

डोनाल्ड ट्रंप के चुनावी अभियानों में इस्लामी आतंकवाद और कट्टरपंथी विचारधारा को नेस्तनाबूत करने की उनकी सोच वर्तमान वैश्विक माहौल से प्रेरित है| अमेरिका सहित तमाम पश्चिमी देश आईएसआइएस व अन्य इस्लामिक आतंकवादी संगठनों के मचाये उत्पात से सहमा था| ऐसे वक्त में अमेरिका जैसी महाशक्ति के राजनीतिक-आर्थिक हालातों को नज़रअंदाज कर खुलेआम इस्लामी आतंकवाद को चुनौती देना ट्रंप को प्रचलित बना गया| मतलब, अमेरिकी जनता के लिए अब आर्थिक चुनौतियों से बढ़कर आतंकवाद का डर ज्यादा महत्वपूर्ण बन गया है| ट्रंप जैसी शख्सियत का उदय 21वीं सदी को या तो सबसे बड़ा वैश्विक सुधार के लिए जाना जाएगा या फिर वैश्विक उथल-पुथल का जिम्मेदार| वक्त और हालात जैसे भी हों पर ट्रंप प्रशासन का ज्यादातर ध्यान अमेरिकियों के लिए ही होगा| अगर ऐसा हुआ तो दुनिया भर के देशों से अमेरिका का प्रभाव निश्चित तौर पर घटेगा और चीन जैसे देशों की मनमानी से सामरिक टकराव जैसी स्थितियों से इंकार भी नहीं किया जा सकता|

दूसरी तरफ सीरिया, लीबिया, मिस्र या अफगानिस्तान जैसे देशों के आतंकवाद पर अमेरिका को बेहद सावधानी से काम करना होगा| क्योंकि इन देशों में पनपे आइएसआइएस और तालिबान जैसे संगठन अमेरिका, रूस सहित पश्चिमी देशों के अथक प्रयास के बाद भी कुछ भी बिगाड़ा न जा सका है| अब देखना होगा की ट्रंप इन संगठनों के आस्तित्व पर कितना भारी पड़ पाते हैं| या उनकी कार्यकुशलता सिर्फ अमेरिका को आतंकवाद से मुक्त रखने को है ये वक्त बतायेगा|

भारत के प्रति ट्रंप की नीति में उदारवाद की झलक थोड़ी बहुत तो मिली है| अमेरिकी-हिन्दुओं के संबोधन में ‘आई लव हिन्दू’, ‘आई लव इंडिया’ जैसे शब्द और मोदी की नीतियों का समर्थन, शायद उनके कार्यकाल में भारत-अमेरिका संबंधों को एक नई ऊंचाई पर ले जाए| भारत को अपने आर्थिक हितों के साथ-साथ ट्रंप की चीन विरोधी नीतियों से चीन को भी साधना होगा और आतंकवाद पर उनके रुख से पाकिस्तान को भी| अब देखना ये होगा की नरेन्द्र मोदी भारत के हितों के लिए ट्रंप का कितना समर्थन हासिल कर पाते हैं|

डोनाल्ड ट्रंप ने ‘मेड इन इंडिया’ की तरह ‘मेड इन अमेरिका’ का नारा दिया| जो खुले तौर पर अमेरिकियों के लिए चीनी सामानों पर निर्भरता कर करने के स्पष्ट संकेत हैं| दक्षिण चीन सागर पर चीन की दादागिरी से अमेरिका टकराव के मुड में दिख भी रहा है| जापान, फिलीपिंस, ताइवान व दक्षिण कोरिया भी इस मुद्दे पर चीन से परेशान रहा है| ऐसे में भारत को चाहिए की किसी तरह इन सारे देशों को एक साथ जोड़कर अमेरिका के साथ चीनी आयात को कम करने के लिए आपसी सहयोग की संधि बनाए| ऐसी स्थिति में चीन की अर्थव्यवस्था बुरी तरह लड़खड़ा जायेगी| जिस कारण दुनिया की आर्थव्यवस्था से चीन की गैरजिम्मेदाराना नीतियाँ अपेक्षाकृत प्रभावहीन हो सकती है|

Image result for donald trump against islam imageइस तरह अमेरिका के नए राष्ट्रपति के रूप में डोनाल्ड ट्रंप का आगमन उम्मीदों का मेघ लेकर आया है| इन बादलों में किसी को कुछ दिख नहीं रहा है| कितना पानी बरसेगा या सिर्फ मोर नाचने के बादल हैं ये भी वक्त बतायेगा| हवा चलेगी, मेघ उड़ेंगे तो शायद कुछ अंदाजा लग पायें| फिर भी ट्रंप से रूस को भी उम्मीद है, भारत को भी उम्मीद है और वैश्विक शांति बहाली की भी|
हो सकता है ‘दारुल-ए-इस्लाम’ इस्लाम का राज कायम करने की मंशा बदल जाए| नहीं बदली तो वो समझ जाएँ की ये सहिष्णुता की बात करने वाले ट्रंप नहीं बल्कि इस्लाम विरोध के झंडाबरदार डोनाल्ड ट्रंप हैं..... मान जाओ.... नहीं तो आस्तित्व के लिए संघर्ष करोगे...

लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...