05 April 2016

पंचायती राज मतलब रामराज्य – भाग2 @बिहार

हमने बिहार के पंचायत चुनावों में बंदूक के दम पर चुनाव लड़ते और जीतते उम्मीदवार देखे हैं| बंदूक के दम पर बूथ कैप्चरिंग होते देखी है तो वही गोलियों की तरतराहट के बीच वोगस वोटिंग और पुलिसकर्मियों को कोने में दुबकने की हकीकत देखी है| इन दबंगों की दबंगई रोकने के लिए सरकार ने वार्डवार, पंचायतवार हर एक पद के लिए आरक्षण की व्यवस्था की, जो प्रशंसनीय है| मुखिया के पद को दबंगों से छिनकर किसी पिछड़े या जनजातियों के हाथ में दिया गया| अब पुरुषों का वर्चस्व कम करने के ख्याल से अधिकतर पदों को महिला आरक्षित कर दिया गया है| बिहार के 2001 और 2006 का पंचायत चुनाव भारी अराजकता भरा रहा| 2001 का तो दृश्य थोडा ही याद है लेकिन 2006 चुनाव की तस्वीरें अभी भी मेरे जेहन में ताज़ा है की किस तरीके से कंधे में एके-47 टांगकर वोट मांगे जाते थे या हाथ में देशी-विदेशी राइफल लिए और कमर में चमचमाती सुनहरी गोलियां की बेल्ट पहने आठ-दस लोग चुनाव प्रचार के नाम पर आते और किसी ख़ास को ही वोट डालने का अनुरोध नहीं बल्कि, आदेश देकर जाते थे| ये कोई नक्सली नहीं थे लेकिन दबंग जरूर थे, दर्जनों हत्याओं के दोषी थे| चुनाव का परिणाम लोगों को पहले से पता होता था, नतीजा लोग उनलोगों से दुश्मनी मोल न लेकर वोट उन्हें ही दे देते थे|

अब की स्थितियां काफी बेहतर हुई है| दबंग हाथ में एके-47 की जगह जनता के सामने हाथ जोड़े नज़र आते है, विनती करते है| पहले चुनाव आते ही हत्या, रंगदारी की घटनाएं बढ़ जाती थी| बिहार में कानून का राज दिखता है, कहीं दिखे या न दिखे चुनावों में बेशक दिखता है| गुंडों के खिलाफ सिर्फ गुंडे ही चुनाव लड़ने का साहस दिखा पाते थे, लेकिन अब स्थितियां पलटी है, लोग बेहिचक नामांकन दाखिल करते हैं और बेख़ौफ़ चुनाव लड़ते हैं|

ग्राम पंचायत के मतदाता शहरी मतदाताओं की तुलना में काफी जागरूक नज़र आते हैं| शहर में राशन या तेल 3-4 महीने भी न बंटे तो लोग हल्ला नहीं करते, मगर गांवों में एक महीने की भी राशन कोई पचाने की सोंचें तो हंगामा मच जाता है, डीलरों पर शिकायत कर दी जाती है| मनरेगा, इंदिरा आवास या पेंशनों में धांधली तो जमकर होती है लेकिन, किसी का हक़ पचा पाना बेहद मुश्किल काम है| मतलब, निष्कर्ष निकलता है की देश के ग्रामीण इलाकों के मतदाता शहरी मतदाताओं की तुलना में ज्यादा सजग और जिम्मेदार हैं| शहरों में कोई अपने नेताओं को खरी-खोटी सुनाने से मतलब नहीं रखता जबकि गांवों में नेताओं के जाते ही महिलाएं अपने अधिकारों के लिए टूट पड़ती है और बदहाली का सारा गुस्सा निकालती है| चाहे वो स्कूलों का मसला हो या फिर योजनाओं का| ये बहुत अच्छी बात है की बिहार की ग्रामीण परिवेश की महिलाएं देश में सार्वधिक अनपढ़ होने के बावजूद भी अपने अधिकारों के लिए जागरूक हो रही है| पढ़ी-लिखी महिलाओं से काफी ज्यादा, जो एक शुभ संकेत है|
                                   
पंचायत चुनाव में पिछड़ों और जनजातियों के लिए लागू आरक्षण व्यवस्था का कोई सार्थक परिणाम नहीं निकल पाया है| दबंग निचली जातियों के उम्मीदवारों को खड़ा कराकर उनके लिए अपना वोट मांगते है, पैसे खर्च करते है| मतलब की उसे उसके जितने के बाद असली मुखिया वही रहे और पंचायतों की विकास योजनायों की मलाई चाटते रहे, ठेके में दलाली कमाते रहे| इन रबर स्टाम्प प्रतिनिधियों को हमेशा एक नीच का तगमा लगा रहेगा और वो इसलिए की पंचायत के लोग किसी काम के लिए उस बेचारे के पास न जाकर उनके मालिक के पास जाता हैं, मतलब उनकी कोई हैसियत नहीं| कुल मिलाकर इन गरीबों-शोषितों के लिए मुक्ति का कोई मार्ग नहीं| इसलिए सरकार पंचायतों में आरक्षण व्यवस्था को कड़ाई से लागू कराये| हकीकत की जांच-पड़ताल करे...

Image result for panchayat chunav bihar imageजो हो, बिहार के ग्रामीण मतदाता अब अपनी मर्जी की करने लगे हैं| ग्राम सभाओं में बेबाकी से योजनाओं की गुणवत्ता-तौर तरीकों की आलोचना करते हैं, सुझाव देते हैं और सामाजिक योजनाओं का लाभ उठाने के लिए बेहद सजग दिखते हैं| जरूरत है की ग्राम सभाओं में जनभागीदारी को बढाया जाए| इसलिए कहा जा सकता है की पंचायती राज व्यवस्था को सुदृढ़ और व्यापक बनाने के लिए सरकार को पंचायती राज संरचना पर ज्यादा ध्यान देना होगा ताकि कम-से-कम पंचायतों के रामराज्य न सही अच्छे दिन तो आयें...

(ये मेरे निजी अनुभव हैं क्यूंकि मेरा परिवार पंचायती राजनीति में खासी सक्रिय रहा है... वार्ड मेम्बर, पैक्स, पंच और उपसरपंच जैसे पदों को हमने शोभित किया है)
लेखक:- अश्वनी कुमार, पटना जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’(ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...



पंचायती राज मतलब राम-राज्य

Image result for panchayat chunav bihar imageमहात्मा गाँधी का देश को पंचायती राज व्यवस्था के माध्यम से राम राज्य प्रदान करने का सपना हकीकत नहीं ले पाया| भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री प० जवाहरलाल नेहरु ने राजस्थान के नागौर जिले में 2 अक्टूबर 1959 को पंचायती राज व्यवस्था की नींव रखी थी| यूँ तो देश में पंचायत व्यवस्था सदियों पुरानी थी| पेड़ों ने नीचे बैठकर गाँव की समस्यायों को आम सहमति से हल कर देना पंचायत की खासियत होती थी| लेकिन उसे संविधानिक और कानूनी रूप दिया जाना देश के तमाम शुभचिंतकों को झूमा गई थी| पर पंचायत व्यवस्था के 57 साल बाद भी देश की ग्रामीण आबादी उन सारी समस्याओं को झेल रही है जिसके निवारण के लिए इस व्यवस्था का जन्म हुआ था, सपने देखे गए थे| बलवंत राय मेहता समिति ने पंचायतों को त्रिस्तरिय मॉडल में ढालने का सुझाव दिया था, जिसमें ग्राम पंचायत, प्रखंड और जिला आता है| नेताओं ने इस व्यवस्था में अपनी सहूलियत के हिसाब जो परिवर्तन किया वही मूल समस्या की जड़ है, पंचायती राज की असफलता के कारण है|

पंचायती राज व्यवस्था पुरातन भारतीय संस्कृति की नींव रही है| अंग्रेजों ने अदालतों और आईपीसी के माध्यम से इस नींव को ही तोड़ दिया, नतीजा हुआ की त्वरित और सटीक न्याय करने वाला ग्राम पंचायत- ग्राम कचहरी हासिये पर चला गया| गरीब और अनपढ़ लोग अंग्रेजों के झांसे में आकर अदालतों का चक्कर काटने लगे| बता दूँ की आईपीसी की ड्राफ्टिंग करने वाले मैकोले ने कहा था की भारतीय मुकदमों के फैसले तो होंगे लेकिन न्याय नहीं मिलेगा, तभी हमारा शासन मजबूती से भारत के ऊपर टिका रहेगा| और आज हम देख रहे है की सचमुच अदालत का एक निर्णय सुनने के लिए पूरा जीवन भी कम पड़ जाता है, फिर भी लोगों को न्याय नहीं मिलता|

अब सवाल है की हमारी सरकारों ने तो रामराज्य के नारे के साथ पंचायती व्यवस्था को बखूबी शक्ति प्रदान की है, फिर भी ऐसा क्यूँ हो रहा है की देश की ग्रामीण आबादी न्याय तो दूर बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रही है, ग्रामीण परिवेश आधुनिकतावाद के झमेले में पड़कर गन्दा होता जा रहा है या फिर ग्राम पंचायत के प्रतिनिधियों में भी नेताओं वाली मौकापरस्ती के गुण आने लगे है? क्या ऐसे आयेगा रामराज्य? ग्राम पंचायतों के सामुदायिक विकास के लिए मुखिया या प्रधान पद का गठन कर देने से या न्याय के लिए सरपंच का पद बना देने के बाद भी ग्रामवासियों की परेशानियाँ जस-की-तस बनी है| पंचायत का डीएम कहे जाने वाला मुखिया की एक बीडीओ भी नहीं सुनता| सरपंच के फैंसलों को अदालतों में उतनी अहमियत नहीं दी जाती जितनी की मिलनी चाहिए, यहाँ तक की एक सामान्य पुलिसकर्मी भी खुद को सरपंच से काफी ऊपर मानता है| पंचायत के लोग अपने लिए मुखिया या प्रधान तो चुन लेते हैं, लेकिन क्या वो अगले 5 साल के लिए पंचायत के प्रति उत्तरदायी होता है? नहीं! क्या सरपंच बिना किसी भेदभाव के या त्वरित न्याय देने के लिए बाध्य है? नहीं!

अक्सर जब भी राईट टू रिकॉल की बात आती है तो शासन विधायी क्षेत्रों की बड़ी आबादी की फजीहत दिखाकर पल्ले झाड लेती है, लेकिन ग्राम स्तर पर राईट तो रिकॉल लागू कराना बेहद आसान है| अगर किसी पंचायत का मुखिया, सरपंच या पंचायत समिति अपने दायित्वों से पंचायत को संतुष्ट नहीं कर पाते हों तो जनता को उन्हें हटाकर दूसरा निर्वाचित करने का अधिकार होना चाहिए| ऐसी व्यवस्था से प्रतिनिधियों में जनता का खौफ बनेगा, गलत न होने देने का दबाव रहेगा| पंचायत चुनाव में रुपये-पैसों की बर्बादी पर हद तक रोक लगेगी क्यूंकि उन्हें पता होगा की गलत तरीके से पैसे कमाने पर वो अपना पद गंवा देगा| महत्वपूर्ण है की जनता शिक्षित प्रतिनिधियों को ही चुनने में दिलचस्पी दिखाएगी, जो की उनके मानदंडों पर खरा उतरे| पर सरकार ऐसा करना नहीं चाहती, क्यूंकि असल में उसे रामराज्य लाना ही नहीं है...

बिलकुल उसी तरह पंचायत के जज यानी सरपंच विभिन्न वार्डों के पंचों की सलाह पर छोटी-छोटी झगड़ों को निचले स्तर पर त्वरित और सटीक सुनवाई करे तो अदालतों पर से काफी बोझ हटेगा| गलत करने से लोग डरेंगे, क्योंकि कानून भले ही अँधा है, मगर गाँव अँधा नहीं होता, लोग अंधे नहीं होते| कोर्ट-कचहरी के डर से आम इंसान इन मामलों में अपनी गवाही नहीं देता लेकिन वही गवाह ग्राम-कचहरी के सामने बेबाकी से अपनी राय देता है| इसके लिए हर पंचायत के अधीन एक पुलिस थाने को होना चाहिए|

ग्रामीण स्तर पर सरकार खुद टैक्स वसूलने के बजाए प्रधान या मुखिया को ये अधिकार दे| इससे टैक्स चोरी लगभग शून्य हो जायेगी क्यूंकि उन्हें पंचायत के अधिकतर रईसों की कमाई का अंदाजा होता है| लेकिन ये सब तभी सफल होगा जब जनता को अधिकार मिलेंगे| ग्राम सभा में लोगों को बिना डरे प्रतिनिधियों को गलत के विरुद्ध खरी-खोटी सुनाने का साहस देना होगा| इनसब के लिए सरकार को पहले बंदूक की नली से सत्ता तक पहुँचने वाले गुंडों से भिड़ना होगा... तभी वाकई कम से कम पंचायतों में रामराज्य नहीं तो अच्छे दिन आ सकते हैं... ( पंचायत चुनाव में गुंडों के प्रभाव की चर्चा अगले अंक में करेंगे)
                          
Image result for panchayat chunav bihar imageलेखक:- अश्वनी कुमार, पटना जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’(ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...


01 April 2016

शराबियों को कौन रोकेगा@बिहार?

सुरा एवं सुंदरी दो चीजें अनादी काल से राजा-महाराजा व धनपतियों के लिए मनोरंजन का सर्वोतम साधन रहा है| मदिरा ने घनानंद जैसे शक्तिशाली राजा को भी अंपने नशे में इतना चूर कर दिया की वह सबकुछ खो बैठा| खैर ये सब तो इतिहास की ज्ञात हकीकत है की शराब पहले अहंकार को जन्म देती है और फिर अच्छे-अच्छों को नष्ट कर देती है| फिर भी तो हम 21वीं सदी में जी रहे हैं, जहाँ शराब इंसान से वो सब कुछ करवा रही है जो हमारे समाज को चंद वर्षों में बर्बाद कर के रख देखा| थोड़ी सी मस्ती के लिए शराब क्या यहां चरस, गांजा, हेरोइन, स्मैक, सिंथेटिक जैसे कई अत्याधुनिक नशाओं से मुर्ख मानव अपना अस्तित्व ख़त्म करने पर तुला है| जिसके कारण हमारा समाज टूट रहा है, संबंध बिखर रहे हैं, घरेलु झगडें बढ़ते जा रहे हैं और नशा इन्सान की सोंचने-समझने की शक्ति लीलती जा रही है| नतीजा क्या हो रहा है? इंसान के अन्दर क्रूरता, निर्दयता बढती जा रही है और वह जरा-जरा सी बात पर हत्याएं करने लगा है, बीबी-बच्चों को घर से बाहर करने लगा है| ऐसा नहीं है की ये सारी चीजें एकदम अभी शुरू हुई, क्योंकि शराब का प्रचलन तो काफी पुराना है| फिर भी सोंचना होगा की हम इंसानों को नशासेवन इतना मदहोश क्यूँ कर दे रहा है की हमारी इंसानियत, हमारी विरासत खतरे में पड़ने लगी है? इसमें गलती किसकी है, शराब बेचने वाले में या पिने वाले में?

Image result for wine prohibition imageबिहार में 1 अप्रैल से शराबबंदी की घोषणा हुई है| मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने कार्यकाल में कई सराहनीय व प्रभावी कदम उठाये हैं, लेकिन एक महिला की आवाज पर उन्होनें शराबबंदी की घोषणा करके राज्य, समाज और परिवारों के हित में असाधारण निर्णय लिया है| मैं बिहार के अतीत में नहीं जाना चाहता की भठीयां किसने खुलवाई या किसने शराब को गाँव-गाँव में प्रचलित बनाया? पर सवाल ये है की क्या बिहार जैसे पिछड़े व अशिक्षित राज्य में इसे लागू करा पाना संभव है? ऐसा इसलिए की एक आंकड़ों के अनुसार बिहार की कुल आबादी के 54% लोग व 4% औरतें नशे के आदि हैं| चौंकाने वाली रिपोर्ट है की 18 से 35 वर्ष के 65% युवा किसी न किसी नशे का शिकार हैं| हमारे 6 फीसदी नौनिहाल मजे से हर फ़िक्र को धुएं में उड़ाते चले जा रहे हैं| परेशानी ये की नशे का सेवन करने वालों में 48 फीसदी लोग शिक्षित हैं तो 52 फीसदी अशिक्षित| यानी शिक्षित भी आदतों से खुद को अनपढ़ घोषित करने को बेताब हैं...

Image result for wine prohibition imageक्या ऐसे बढेगा हमारा बिहार? क्या शराब पर निर्भरता से हमारी GDP तरक्की कर रही है या उससे होनेवाली बिमारियों पर सरकार खर्च करके जीडीपी कमजोर कर रही है? तमाम सवाल हैं| जनता को सरकार से सवाल पूछने का बेशक हक़ है, क्यूंकि पिछले दिनों इसी तरह से गुटखे पर भी प्रतिबन्ध लगे थे पर आज भी गुटखे की बिक्री खुलेआम है| लेकिन नीतीश कुमार ने ये फैसला करके नशेरियों से ज्यादा शराब कारोबारियों से जो पंगा लिया है वो कोई साधारण बात नहीं है| नीतीश कुमार के लिए आने वाले दिन आसान नहीं होंगें| शराबबंदी से ज्यादा शराबियों के लत को छुड़ाना लगभग असंभव सा काम होगा| बिहार के ग्रामीण इलाकों में प्रतिबन्ध लगा दिए जाने से मुझे नहीं लगता की शराबियों को बहुत ज्यादा परेशानी होगी या फिर शराब मिलना ही बंद हो जाएगा| गांवों में लोग महुआ आदि चीजों से आसानी से घर में ही देशी शराब बना लेते हैं और मज़े से महीनों तक पीते हैं|

शराब बंद कराने की पूरी जिम्मेवारी पुलिस पर सौंपकर सरकार अपने कर्तव्यों से इतिश्री न करे| क्योंकि पुलिस की कार्यप्रणाली हमेशा संदिग्ध रही है, वसूली करने वाली की रही है या माफियाओं के लिए काम करने वाली रही है| अगर सरकार ये सोंचती है की वो फाँसी, उम्रकैद, जुर्माना आदि के दम पर शराबियों की लत छुडवा सकती है तो ये मुर्खता है| डंडे की जोर पर शरीर को तकलीफ पहुंचाई जा सकती है मगर मन-मस्तिष्क को नहीं| क्योंकि फाँसी, उम्रकैद या जुर्माने जैसे कई सजा कानून में पहले से चलन में है फिर भी आजतक मर्डर, रेप, अपहरण, रंगदारी, धमकी या छेड़खानी की घटनाओं में क्या जरा भी कमी आई है? नहीं! बल्कि, इनकी रफ़्तार तो चीते की चाल जैसी है...
                                    
इसलिए ये कहना मुश्किल है की पुलिस की लाठी या जेल के डर से कोई अपनी आदत बदल डाले, असंभव है| क्योंकि जेल में भी तो हर चीज (नशा) का व्यापक इंतजाम होता है... सरकार जहाँ ले जाए लेकिन कुत्ते की दूम की तरह इंसान की लत सीधी हो ही नहीं सकती| फिर भी इतना साहसिक फैसला लेने के लिए नीतीश कुमार जी को मेरा सॉल्युट...


लेखक:- अश्वनी कुमार, पटना ( आशा करता हूँ की शराब बंद सफल हो, इससे ग्रामीण महिलाओं की सामाजिक स्थिति सुधरेगी, उनके बच्चों का भविष्य सुरक्षित होगा और उनकी आर्थिक स्थिति पहले से बेहतर होगी...)

28 March 2016

क्रांतिकारी बनना आसान नहीं...

Image result for krantikari imageअक्सर हमें एक सवाल परेशान करती है की हम क्रांतिकारी किसे कहें? उसे जो हथियार के दम पर गुलाम बनाने वालों को हथियार से ही दमन करता हो या उसे जिसने शांति से निहथ्थी भीड़ को आगे खड़ी करके गोलियां खिलवाई और दुश्मन की मलाई चाटते रहे| या उसे जो कई दशकों तक जेल की काल कोठारी में बंद रहकर देशप्रेम की पंक्तियाँ लिखी, कायरता को अपनी निडरता से हराया या यूँ कहें की पानी में रहकर मगरमच्छ से बैर किया| भारत वर्ष के इतिहास में हजारों क्रांतिकारी हुए जिन्हें ब्रिटिश हुकूमत न तो बंदूक से झुका पायी और न ही बाइबिल से| इन क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों को जैसे को तैसा पाठ पढ़ाकर नाकों दम कर रखा था| इन वीर सपूतों में सबसे पहला नाम वीर सावरकर का आता है| अंडमान के सेलुलर जेल में काले पानी की सजा काटना जीते-जी मर जाने जैसा है, फिर भी वे अंग्रेजों से देश को मुक्त करा डालने की प्रतिबद्धता नहीं छोड़ पाए| आज तो दो चाटें लगते ही लोग सब उगल देते हैं| शहीद भगत सिंह, राजगुरु, बोस, चन्द्रशेखर आजाद, जतिन दास, उद्धम सिंह जैसे क्रांतिकारी भले ही आज किताबों में गाँधी-नेहरु की तरह जगह नहीं बना पाए लेकिन, उनकी वीर गाथाएं आज भी देशप्रेम और राष्ट्रभक्ति की एक नई उन्माद पैदा कर देती है, जोश भर देती है| देश के लिए मर मिटना सिखाती है, गांधी और नेहरु से कई गुना ज्यादा|

भारत में पिछले 3-4 सालों में कई तथाकथित क्रांतिकारी पूर्णिमा की चाँद की तरह चमके और धीरे-धीरे कटते चले गए| इन क्रांतिकारियों ने गरीबी, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से देश को मुक्त कराने की अहिंसक कोशिश की| लेकिन बदले में उन्हें लाठियां मिली, जबरदस्ती अनशन तुडवा दिया गया, विरोध करने वालों को जेल में डाल दिया गया| और नतीजा ये हुआ की सत्ता की गर्मी से ये सारे क्रांति के पुतले मोम की तरह पिघल गए| इसी से सवाल खड़ा होता है की जब हमारी खुद की सरकार अनशन और अहिंसा से एक मनमाफिक जनलोकपाल तक नहीं दे पायी तो सोंचें पहले अहिंसा का कैसा कत्लेआम किया जाता होगा?

राष्ट्रवाद-देशप्रेम का पिटवां लोहे की तरह क्रांतिकारी पैदा तो हो रहे हैं, लेकिन देश का माहौल उन्हें राजनीति,लुट-खंसोंट के एक ऐसे ऐशागाह से गुजारती है की वो अपने विचार इसके मोह में बड़ा होते-होते मोम का बना डालता है| इनसब से बचकर गरीबी-भुखमरी से आजाद कराने के लिए एक क्रांतिकारी जैसे ही पनपता है वैसे ही देश को लूट रहे अलग-अलग म्यानों में एक सी धार वाली विचारधारा उसपर टूट पड़ती है और अस्तित्व तक ख़त्म कर देती है|

इसलिए मैंने कहा की क्रांतिकारी बनना इतना आसान कैसे है, जिन नेताओं को एक दिन ऐशो-आराम वाले जेल में रहले मात्र से तबियत ख़राब होने लगती है? काला पानी तो दूर इन्हें दिहारी मजदूरों के घरों में रख देना उससे भी बड़ी सजा होगी... अपनी ही बनाई नीतियों में घुटकर जियेंगे... तब पता चलेगा की भारत राष्ट्रराज्य की बनावट को संविधान के माध्यम से मनमाना बदलना कितना भारी पड़ता है...
Image result for krantikari image 
लेखक:- अश्वनी कुमार, पटना जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’(ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...