11 August 2015

Radhe Maa : Disgrace for Hindu

Well, The no. of fraud ascetic and showing himself as a incarnation of god are rapidly growing day by day. First, saint Aasharam was acting as god and behind it, he was exploited many ladies even body harassment in the shelter of hinduttva. After that saint Rampal was bath with milk by his blind devotee. But, all of them who used hinduttva as a business, as a profession have punished by court and send to jail. However, Even large no. of hypocrites are also exist in that country and live in laxity. There is an example of ‘Radhe Maa’. Who is the different in the comparison of other Baba’s. She dances at the music of Bollywood. She lifted in the lap of devotee also kiss her. She wears goggles like as celebrity. So Finally, These are enforcing and symbolized in our modern hinduttva. The question rises upon it, why not so called ascetic travel in lax cars? Why not dancing on Filmi song? Is she not a common man?
                                                                 Although, For this incident, Radhe Maa is not an alone guilty. When devotee trust to feed red sweet besides green with ‘Samosa’ for change fate themselves and follow the twilight instruction of ‘Nirmal Baba’. Because, Foolness has not limit. Radhe maa has accused for dowry harassment, complaint filed by a lady, whose husband follow her idea. Now, The exploit of Radhe maa has come out and expose her worst work.
                                                                Altogether, Today Hindu dharma have the character of mocking. That type of Baba made it loom of the brightness of hinduttva, its calmness, its sacreness. Government of India must be bring an ordinance to restrict these Baba’s, who growing as mushroom and exploit the beauty of our ancient society even country. Anything happened but after which our hinduttva attracts world and rise question, How sacred India? Untill, Ganga exist on this land, Tulsi exist on houses. The dignity of India will safe.

Writer:- Ashwani kumar, who fill very disappointed, when People make fool in the shelter of Dharma. Because, we have so many ved, Ramayan, Geeta & Puran to pioneer our good way.
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09 August 2015

पोर्न साइट्स: आखिर भारत भी युवा है!

एक NGO ने उच्चतम न्यायालय में चाइल्ड पोर्नोग्राफी से संबंधित याचिका दायर कर 857 वेबसाइटो पर बैन लगाने की मांग की। कोर्ट ने सरकार को फटकार क्या लगाई, सरकार ने सारे 857 वेबसाइटो को आनन-फानन में बंद कर दिया। फिर क्या था, दशकों से जाती-धर्म-संप्रदाय के नाम पर आपस में लड़ रहे लोग, एक मंच पर आ खड़े हुए और इतनी आलोचना की, कि सरकार की चूजें हिल गई और उन्हें 24 घंटे में ही बैन वापस लेना पड़ा। इससे क्या साबित होता है? की देश की जनता को आपस में कितनी भी मतभेदें रहे, लेकिन जब बात उनके निजता तक पहुंचेगी तो वो चुप नहीं बैठनेवाले। आखिर उनकी भी इच्छाएं हैं, उनका भी अपना मान-सम्मान है। जब देश की संसद और विधानसभा के सदस्य सदन के अंदर कुछ भी कर सकते हैं, तो एक आम-आदमी बंद कमरे में वही चीज क्यों न करे? एक पन्ने पर जहाँ सुप्रीम कोर्ट इन सामग्रियों को हटाने का आदेश देती है, वहीँ उसी पृष्ठ के दूसरे पन्ने  स्वतंत्रता का अधिकार के अंतर्गत निजता का हनन पर अपनी विचार प्रकट करती है।  
                                                                                       चुनाव आते ही टीवी चैनलों पर मुर्गा-लड़ाई शुरू हो जाती है। जब कोई संवाददाता किसी बेरोज़गार युवा से सवाल करता है तो वो कहता है-  देखिये मुझे इनसब में कोई दिलचस्पी नहीं, मुझे तो केवल नौकरी चाहिए, ताकि देश का विकास हो। लेकिन उसी टीवी चैनल पर हमें ये भी सुनने को मिलता है की, वर्ष 2014 में सनी लियोनी लगातार दूसरे साल गूगल पर सबसे ज्यादा सर्च की गई। कौन करता है इसे सर्च?  आप कह सकते है- "बंद कमरे में कोई क्या करता है यह उसका अपना अधिकार है"। लेकिन कैसे? दिल्ली दामिनी कांड अभी भी हमारी जेहन में ताजा है, उस वक्त हम सभी ने देखा की कैसे छोटे-छोटे स्कर्टों में लड़कियां कैंडल लेकर,लड़कों के साथ संवेदना प्रकट कर रही थी। मेरा मकसद उन्हें गलत कहना कतई नहीं है, बल्कि जो लोग लड़कियों के प्रति बढ़ते अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाते हैं, वही लोग साइट्स पर लगी पाबंदी पर चीख-चिल्ला रहे थे। उन्ही लोगों की वजह से गूगल पर सनी लियोनी सबसे ज्यादा सर्च होने वाली सेलिब्रिटी बनती है और उसे स्टार का तगमा हासिल होता है। नतीज़न सनी लियोन बनने की चाहत देश की लड़कियों में देखने को मिल रही है। नारी सशक्तिकरण के हिमायती लोग अक्सर लड़कियों के पहनावे पर सवाल उठाये जाने पर उग्र हो जाते हैं। कहते है:- लड़कियां कुछ भी पहने इससे लड़कों का क्या?  नतीजा? आज कपडे ऐसे पहने जाते हैं की जितना छिपे उससे अधिक दिखे। लेकिन हमारी सभ्यता, संस्कृति इसकी अनुमति तो नहीं देता। हमारी सभ्यता पश्चिम की नग्नता से तो बेहतर है ना!
                                                                        बेशक, अगर सरकार सचमुच इन समस्याओं के प्रति गंभीर है तो उसे इस तरीके के प्रदर्शनों से कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। सबसे पहले तो उन सारे वेबसाइटो को बंद किया जाए, जो भारत सरकार के नियमों की अवहेलना करते हैं। सरकार उन वेबसाइटो के सर्वर भारत में स्थापित करने का आदेश जारी करे ताकि उनपर बारीकी से नज़र रखा जा सके । सेंसर बोर्ड नग्ण्ता का प्रदर्शन करने वाले अभिनेत्रियों को बैन करे, जिसे समाज को दूषित करने का एक हद तक श्रेय जाता है। तमाम रिसर्च ये मानते हैं की इन कंटेंट से व्यक्ति के मस्तिष्क पर कुछ तो असर अवश्य होता है। दुनिया में पोर्न देखने के मामले में हमारा देश तो अभी तीसरे स्थान पर हैं, लेकिन संभव है की एक-दो वर्षों में उसमे भी अव्वल हो जाएगा। अब तो 8  साल के बच्चे भी संक्रमित हो चुके हैं, देखिये आगे क्या-क्या होता है? जानकार कहते हैं:- "भले ही पूजा-पाठ के माध्यम अलग अलग हो लेकिन हर कोई ईश्वर की खोज में लगा है..... ईश्वर की। हंसो मत!

लेखक:- अश्वनी कुमार, जिसकी राय से कई लोग सहमत भी हो सकते हैं, और कई असहमत भी। फिर भी जो असहमत होंगे, उसका तो कुछ नहीं किया जा सकता। वही देश के भविष्य भी  हो सकते हैं... 

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07 August 2015

संसद में 'खामोश' रहने वाले शत्रुधन की नाराजगी

पटना साहिब लोकसभा सीट से बीजेपी के सांसद शत्रुधन सिन्हा हाल के दिनों में पार्टी से नाराज़ चल रहे हैं। इधर वो हर एक मुद्दों पर पार्टी लाइन से हटकर बोल रहे हैं, पहले उन्होंने मोदी के DNA वाले बयान की आलोचना की, फिर याकूब की रिहाई याचिका पर अपने दस्तखत किये और अब संसद से कांग्रेस सांसदों के निष्काशन को अवैध बताया। सवाल है, शत्रुधन और बीजेपी के बीच ये दूरियां कैसे पनपी? उनका ऐसा कौन सा स्वार्थ है, जो उन्हें नीतीश और उनकी जदयू अच्छी लगने लगी? नीतीश के साथ ताबरतोड़ मुलाकातों के कई मतलब निकले जा सकते हैं। खबर तो ये भी आ रही है की सिन्हा बीजेपी छोड़कर जदयू में शामिल हो सकते हैं ऐसे में पटना साहिब में उपचुनाव होंगे और सिन्हा जदयू की तरफ से मैदान में उत्तर सकते हैं। JDU उन्हें ये भरोसा दिलाने में जुटी है की अगर वो चुनाव हार भी जाते हैं तो राज्यसभा से उन्हें दिल्ली भेजा जायेगा? पर शत्रु इसे लेकर आशंकित हैं। ऐसी स्थिति में दोनों ही अपने-अपने फायदे ढूंढने में लगे हैं। एक तरफ जहाँ जदयू को स्टारडम प्रचारक मिल जाएगा, जिसकी मदद से वो भाजपा पर हमलावर हो सकेगी। वहीँ दूसरी तरफ शत्रुधन केंद्र में मंत्री न बनाये जाने को लेकर पिछले एक साल से नाराज़ चल रहे हैं, ऐसे में वे संगठन पर दबाव बनाकर खुद मंत्री व पूनम सिन्हा को विधानसभा चुनाव में टिकट दिलाने की राजनीती पर काम कर रहे हैं।   
                                                                                                        कुल मिलाकर देखा जाए तो शत्रुधन सिन्हा 2009 लोकसभा चुनाव में भी पटना साहिब सीट से ही जीतकर संसद गए थे। लेकिन उन 5 सालों  क्षेत्र में न आने के कारण उनके 'लापता' होने के पोस्टर भी चिपकाये गए थे। बेशक, क्षेत्रीय रिकॉर्ड ख़राब रहने के बावजूद भी 16वीं लोकसभा चुनाव में बीजेपी की तरफ से उतरे और मोदी लहर के बदौलत बाजी मार ली, ना की शख्सियत के दम पर।  मैं भी पटना साहिब संसदीय क्षेत्र का मतदाता हूँ, और मेरा संसद महोदय के प्रति अपना अनुभव भी रहा है। संसद की कार्यवाही के दौरान उन्हें अक्सर खामोस देखा जाता रहा है। चुनाव-प्रचार के समय अपने  मशहूर डॉयलॉग 'खामोश' से निर्भीकता का प्रदर्शन करने वाले का संसद में ऐसा रवैया कितना जायज है? आखिर 6 वर्षों में सदन में उनकी उपस्तिथि कितनी रही? इन 6 सालों में अपने क्षेत्र के कितने मुद्दों के प्रति सदन का ध्यान आकृष्ट किया है? इस दौरान कितने किन अपने क्षेत्र के लोगों के बीच बिताये हैं, उन्होंने? जबकि पड़ोसी पाटलिपुत्र क्षेत्र से सांसद 'रामकृपाल यादव' सत्र के अवधि में नियमित रूप से प्रश्न पूछते देखा जाता हैं। 
                                                                                         जो भी हो, लेकिन इस तरीके की दबाव की राजनीति से न तो उनका भला होगा और न ही क्षेत्र की जनता का। उन्हें जनता ने जो जिम्मेदारी दी है उनका बेहतर ढंग से पालन करना ही श्रेष्ठ प्रतीत होगा। 
लेखक:- अश्वनी कुमार, पटना सिटी, जो एक स्वतंत्र टिप्पणीकार बनना चाहता है। 
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06 August 2015

कितना बड़ा है परीक्षा माफिआयों का नेटवर्क

यह सवाल दशकों से देश के पढ़े-लिखे नौजवानों को चिंतित करता रहता है। पढ़ने-लिखने में अच्छे होने के बावजूद भी करोड़ों नौजवानों को नौकरियाँ नहीं मिल रही। सरकारी विभागों की तरफ से 2-3 साल में जो नाममात्र की रिक्तियां निकाली जाती है, उस पर परीक्षा माफियाओं की पैनी नज़र होती है। परिणाम क्या होता है? योग्य उम्मीदवार रहने के बावजूद भी अयोग्यों की पूजा होने लगती है। आख़िरकार उन्हें नौकरी दिलाने वाले आकाओं ने अफसरों की तमीज से पूजा-पाठ जो की है। कौन कहता है की पैसे से सब कुछ नहीं ख़रीदा जा सकता? हम छात्रों के लिए तो सबकुछ का मतलब ही नौकरी है। ये नौकरियां भी आजकल रियल-एस्टेट कारोबार की तरह कमसिन हो गयी है। एक बार माँ-बाप की जमा पूँजी इस सेक्टर में इन्वेस्ट कर दो, फिर जिंदगी भर मौज करो। कार, बंगला, पेंशन, ऐसो-आराम व 10-15 लाख देने वाले की सुन्दर बेटी। 
                                                                      ये हालत हो गयी है, हमारे देश के शिक्षा व्यवस्था की। अंग्रेज तो भारत पर अपनी नौकरी आधारित शिक्षा व्यवस्था थोपकर चले गए, क्योकि वे तो गैर थे। लेकिन उसी व्यवस्था का 67 सालों से अनुसरण कराने वाले तो हमारे अपने हैं। शायद सही कहा गया है की "हमें अपनो ने लूटा, गैरों में कहाँ दम था। ये हमें पिछले 67 सालों से नौकरी के नाम पर वोट लूटते रहे है और हम अपने को लूटने देते रहे, यही विडम्बना है। कोई सरकार क्यों नहीं इसपर अपनी मजबूत इच्छाशक्ति दिखाती? क्या हमारी सरकार अंग्रेजियत की इतनी गुलाम हो गयी है की वो विदेशी भाषाओं, विदेशी कानूनो को बाहर का रास्ता नही दिखा सकती? 10 साल अंग्रेजी सिखने में बर्बाद करो, फिर पूरी जवानी इतिहास-भूगोल याद करने में। फिर भी इसकी कोई गारंटी नहीं की आप सर्विसमैन कहलाओ, हाँ अगर आप के पास पैसे ना हो तो। नौकरी के लिए महामारी सी स्थिति पैदा हो चुकी है। ये सिर्फ सरकारी नौकरियों के बारे में नहीं है, बल्कि प्राइवेट व अन्य संस्थानों की भी यही स्थिति है। अनियंत्रित जनसँख्या वृद्धि का असर दिखने लगा है, जहाँ 500 पद के लिए 20 लाख फॉर्म भरे जा रहें हैं। उसमें भी आधे पद माफियाओं के लिए आरक्षित होती है। कर डालिये, अपनी सेक्युलर नीतियों से भारत को चीन से आगे। तभी तो 500 पद के लिए 50 लाख फॉर्म बिकेंगे, जिससे आपको अधिक राजस्व आएगा। 
                                                                        कुल मिलाकर अगर देखा जाए तो, देश की प्रगति में अयोग्य अफसर बड़ी रूकावट हैं। विभिन्न विभागों में जैसे, गृह मंत्रालय,  मंत्रालय, वित्त मंत्रालय आदि जिन्हे देश के विकास के लिए तेज-तर्रार अफसरों की जरूरत होती है, वहां फ़िलहाल भोंदे अफसर व कर्मचारियों की भरमार है। किसके कारण? अफसरों को नियुक्त करने की जबावदेही सरकारी आयोगों की होती है। क्यों नहीं ऐसे आयोगों पर कड़ी कार्रवाई की जाए, जिसकी उदासीनता के कारण योग्य उम्मीदवार अपने अधिकार से वंचित रह जाते हैं। हाल ही में कर्मचारी चयन आयोग ने संयुक्त स्नातक स्तरीय परीक्षा को 3 बार रद्द किया फिर भी उसके रिजल्ट पर उँगलियाँ उठी। बिहार सिपाही भर्ती परीक्षा में सफल अभियर्थियों से जब ट्रेनिंग के दौरान राज्यपाल का नाम, जिले की संख्या पूछी गयी तो हकीकत सामने आ गयी। क्या ऐसा आयोग कार्रवाई योग्य नहीं हैं, जिनके अपने ही अफसर परीक्षा माफियाओं से सांठ-ग़ांठ रखते हैं? कई बार तो राजनीतिक हस्तक्षेप की भी बात सामने आती है। मध्य प्रदेश व्यापम घोटाला तो किसी चूक की वजह से सामने आ गया, नहीं तो कितनी ऐसी परीक्षाएं और नियुक्तियां हो भी गयी है, और हो जायेगी, लेकिन किसी को कोई पता नहीं चलेगा।                                                                                                     ऐसे देश में कई आयोग व भर्ती परीक्षा बोर्ड है जो नौकरी के नाम पर करोड़ों-अरबों रूपये का कारोबार कर रही है। नतीजन, युवाओं में घोर निराशा की स्थिति पैदा हो चुकी है, आत्महत्या के मामले बढे हैं। इस स्थिति में वर्तमान सरकार व कोर्ट को सामने आकर इस दोषपूर्ण प्रणाली में व्यापक सुधर करनी चाहिए। मैं नहीं, तमाम विशेषज्ञ ये मानते हैं की सरकारी नौकरी के लिए भाग-दौड़  वजह इसमें मिलने वाली सुविधाएँ व समाज में इज्जत है। सुविधाओं में कटौती करके उन्हें 'खास' से 'आम' बनाने का रास्ता ज्यादा सुलभ हो सकता है। संभव तो नहीं, लेकिन इसकी शुरुआत हमारे प्रधानमंत्री जी को करना चाहिए।



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लेखक:- अश्वनी कुमार, एक छात्र जो एक स्वतंत्र टिप्पणीकार बनना चाहता है। 

02 August 2015

इन नेताओं से अब सचमुच देश को बचाओ

 देश की राजनीति जिस गति से अपने घटियापन की जड़ें छू रही है, उससे तो अब कुछ अनहोनी की आशंका प्रबल होती दिख रही है। नेता... एक ऐसा शब्द, जिसे सुनते ही आम-आदमी क्रोध से भर आता है, कहता है...हमारी गरीबी-बदहाली के जिम्मेदार तो यही नेता हैं। अरे इन्हे तो लाइन में खड़े करके गोली मार देनी चाहिए। अनपढ़-भोंदू-तोंदू  नेता अपनी अजीब हरकतों से प्रिंट मीडिया के आखों का तारा बने बैठे हैं। TRP बटोरने व दिन-रात महिमामंडन करने के आलावा इन्हे काम ही क्या बचा है? भारत एक बाज़ार है, देश नहीं। लूट सके जो लूट ले। देश की गरीब आबादी भूख से बिलबिला रही है, धुप से तड़प रही है, पर इन्हे क्या? इनके लिए चुनाव के समय बेशक इंतजाम होता है, वोट लेने के लिए नरनारायण बना दिया जाता है। जितने के बाद वे इनसब पर ध्यान क्यों दे? आखिर चुनाव में जो खर्च हुआ है, उसका सौ गुना कमाने में 5 साल तो काम ही पड़ जाते हैं!
                                                                 आज हालात ये  राजनीति का मतलब ही लूट-खसोट तथा एक दूसरे को गलियां देना हो गया है। नेता खेमा दो वर्ग में बँटा है, पहला- सेक्युलर व दूसरा- कम्युनल। सेकुलरो की आबादी उनके मुकाबले काफी ज्यादा है। ऐसे में ये लोग खुद को ज्यादा सेक्युलर घोषित करने के लिए एक खास धर्म के लोगों के तलवे चाटने से भी परहेज़ नहीं करते। अंतराष्ट्रीय जनसँख्या एजेंसी के अनुसार तो भारत 2050 में नहीं, बल्कि 2028 में ही जनसँख्या में चीन से आगे निकल जाएगा। बेशक इनलोगों की सेक्युलर नीतियों के चलते हम सभी एक दिन बड़ी मुश्किल में फंस जाएंगे क्योंकि इनके अनुसार बच्चे पैदा होना गॉड-गिफ्टेड है ना!
                                                      देश की जनता देश रही है। उसका खून जिस दिन उबला, समझो फ़्रांस की क्रांति, इंग्लैंड की क्रांति, रूस की क्रांति के साथ ही भारत की क्रांति भी जुड़ जायेगी। फ़्रांस में 1789 में वहां के राजा लुइ सोलहँवा के विरुध जनता का असंतोष फैलना, क्रांति का एक कारण बना। रूस में जार के अत्याचारों के खिलाफ लोग खड़े हुए। मिस्र के काहिरा चौक की ताज़ा तस्वीर तो अभी भी लोगों के जेहन में मौजूद है। कर्नल गद्दाफी के साथ क्या हुआ, वो भी हमारे राजनेताओं के लिए एक उदाहरण है। इतिहास गवाह रहा है की जब-जब जनता पर अत्याचार बढे हैं, उनका शोषण किया गया है, तब-तब लोगों का रौद्र रूप देखने को मिला है। पर, भारत में ये लोकतंत्र के नाम पर खून चूस रहे है। लोकतान्त्रिक व्यवस्था का हमेशा महिमामंडन करने वाले इन नेताओं को भी पता की ये लोकतंत्र है किसके लिए? बड़ा दुःख होता है, जब वोट के ध्रुवीकरण के लिए इन गद्दारों की हरकते देखता हूँ। क्या महात्मा ग़ांधी ने ऐसे ही भारत की कल्पना की थी, जहाँ भाईचारा और प्रेम शब्द का समाज में दूर-दूर तक कोई अता-पता नहीं? क्या सरदार पटेल ने इसलिए 536 टुकड़ों को जोड़ा था, की यहाँ कोई भी अलग राज्य की मांग करे और उसका बंटवारा कर दिया जाए!
                                                    राजनीति देखनी है तो बिहार, यूपी दिल्ली के साथ साथ कश्मीर इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। जहाँ के देशद्रोही नेता, वोट के लिए पाकिस्तानी, ISIS के झंडे लहराने वालों के लिए भी धरने दिए जाते हैं। यूपी में तो एक आतंकवादी याकूब के पत्नी को सांसद बनाने की मांग होती है। इस देश का कुछ हो सकता है, इसमें भी शक है। शायद इसलिए की, अगर आज चाणक्य भी होते तो इनलोगों के दावं-पेंच के आगे बौने पड़ जाते।
लेखक:- अश्वनी कुमार, जिसका गुस्सा ना तो सिस्टम से है और ना ही इस देश के नेताओं से। गुस्सा आता है तो आज के नेताओं के व्यवहार पर, उनके कार्यकलापों पर।


Innocent ‘Yakub’ along with secular leaders

What happening with our country now? A terrorist, who is responsible to take life of 257 people and which is innocent in the view of our secular politicians. Today, the meaning of ‘Secular’ word has convert into ‘Coward Nationalist’. Few muslims & secular leaders was hyping that Yakub is muslim so, he hanged. Their stance is totally irksome. They were demanded to release him in the name of religion. Though, Hypocrites should have a limit, but they are limitless fool, burden on nation and have ridiculous mind. Yakub Memon, which is a brother of Tiger Memon. Tiger Memon is the main accused of 1993 mumbai blast and Yakub had help him to planting the bombs and other arrangements for colleague terrorist. The rumor is that Yakub had surrendered after blast and collaborate with cops to investigate into incident. But why did he not reveal any evidence of surrender to the court.
                                                 Owaisi initiated for the mercy of yakub. He said that why don’t hang hindu accused of Babri demolition, Godhara incident? Court was made hang Yakub because of muslim. But, probably Owaisi hasn’t knowledge about mumbai balst. Other accused of the blast is also muslim so, why did their death penalty change into life custody? That is the proof of court. Court is true secular, Justice for all is its moto. 300 achievers including politicians, film-maker, actor and former justices has send a mercy petition to the president. Why? Was Yakub a good citizen? He was humanitarian in the sense of these great men, specially Salman Khan.
                                                 Many of people are making discussion for elaborate death sentences. But, Is it the sign of restrain hineaous crimes like terror. Significant point of this conception is totally bias upon victim. Often seen that victim is poor & inferior, but accused exist rich. So, How people discuss about erase death penalty? I completely fail to understand and I can’t agree with those ever. Thanx…

Writer:- Ashwani kumar, Patna…who ever want to become an independent remarker…