03 September 2016

कश्मीरियों का देशद्रोही रवैया

कश्मीर में देशद्रोही गतिविधियों का इतिहास पुराना रहा है| धर्म, जिहाद या पाकिस्तानपरस्ती की आड़ में देश के विरूद्ध साजिश रचना और घाटी को अशांत करने की कोशिश उनकी पैदाइशी फितरत बना चुकी है| चंद अलगाववादी नेताओं और हुर्रियत की मनोदशा हमेशा उसे पाकिस्तान का अंग बनाने की रही है| सरकार के साथ कई बातचीत के दौर के बावजूद भी न तो कश्मीरी मुसलमानों की मानसिकता में कोई परिवर्तन आया और न ही उनके देशद्रोही रवैये में|

Image result for kashmir pellet gun stone pelter imageक्या इसे हमारी सरकार की असफलता कही जा सकती है जिसने इन 5-6 दशकों में अरबों-खरबों रुपये कश्मीरी लोगों, युवाओं को मुख्याधारा में लाने के नाम पर बर्बाद की फिर भी उनका शांति-सन्देश, देशप्रेम और अरबों रूपये धर्म, जूनून और जिहाद के पागलपन के आगे फीका पड़ गया| दुनिया की वर्तमान वैश्विक हकीकत है की इस्लाम की सोच, उसकी विचारधारा शांति से नफरत करती है| इतिहास गवाह है की किस तरह घाटी से कश्मीरी पंडितों को काफिर के नाते भगाया गया, उनकी इज्जत लुटी और धन-दौलत को अपना बनाया| बुरहान वाणी तो कश्मीर के आतंक का एक छोटा सा आइकॉन था| उसकी आतंक के अलावे कोई अपनी खुराफाती विचारधारा भी नहीं थी जैसा की भारत सरकार के पैसों और सुरक्षा से पल रहे गिलानी, मसूद जैसे हुर्रियत नेताओं की है| या फिर मुफ़्ती और अब्दुल्ला की दबी जुबान से है|

Image result for kashmir pellet gun stone pelter imageसेना को मारना, उन पर पत्थर बरसना उनका अधिकार है, पर सेना का पैलेट गन चलाना अधिकारों का हनन| शायद कानून इस बात से अनजान है की राजकाज चलाने के लिए सारे जुर्म, हनक और कारवाई जायज होती है जैसा चुनाव जितने में होता है| लेकिन मानवाधिकार की चिंता करने को उनलोगों को कतई अधिकार नहीं है जो नुमाइंदे या रक्षक के नाम पर ठंढे एसी कमरों में बैठकर हजारों किलोमीटर दूर की वास्तविकता पर सही-गलत की निर्णय लेता है| देश की सुरक्षा, उसकी एकता और अखंडता को सुनिश्चित कराने की जिम्मेदारी सेना की है, सरकार और कोर्ट की नहीं| इसलिए सेना के कार्यों में बेवजह हो रही दखलंदाजी हमारे लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा कर सकता है... फिर तो जनता मौज मना सकती है... किसलिए? आप जानते हैं...

लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...


02 September 2016

भारत अमेरिका का दास या अनुयायी

Image result for india america defence imageवैश्विक पटल पर दुनिया के ताकतवर देशों का बदलता कुटनीतिक मिजाज हमें चर्चा के लिए बाध्य कर रहा है| इसलिए की अमेरिका का भारत जैसे देशों की तरफ हो रहा झुकाव विश्वशांति, भाईचारे के तकाजे से है या सामरिक, आर्थिक स्वार्थ की भावना लिए है इसे हमें समझना होगा| दुनिया का सबसे ताकतवर देश अमेरिका, जिसने न जाने कितने देशों की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक आजादी नष्ट कर दी वहीँ चीन जैसे देशों को संपन्न भी बनाया| आजादी के बाद से भारत और अमेरिका की दूरी पंचशील, निर्गुट, शीतयुद्ध और सोवियत संघ पर नेहरु के फैसले से रही| वहीँ साम्यवादी चीन इस दौरान राजनीति से दूर अपनी सम्पन्नता के रास्ते तलाशता रहा| पर भारत भाईचारा, विश्वशांति और पिछड़े देशों का अगुआ बनने का ढोल पिटता रहा| 

हाल के वर्षों में मोदी सरकार ने अमेरिका के साथ जितनी तीव्र गति से सामरिक और आर्थिक समझौते किये हैं, उनके कई मायने हैं| भारत के लिए चीन और पाकिस्तान जैसे दुश्मनों से निपटने का एकमात्र जरिया अमेरिका है तो अमेरिका के लिए भी भारत एक बड़ा बाजार, रक्षा खरीददार, भरोसेमंद समर्थक और चीन के मुकाबले खड़े होने की जरूरतें पूरी करता है| जिस चीन को अमेरिका ने एशिया का महाशक्ति बनाया वही चीन ड्रैगन बनकर फुफकार रहा है| जो अमेरिका को तनिक भी नहीं सुहा रहा| दक्षिण चीन सागर जैसे अहम् मुद्दों पर वह विश्व पंचाट, आसियान जैसे संगठनों को धमका रहा है, उसे कूड़ेदान बता रहा है| वियतनाम, फिलीपिंस, दक्षिण कोरिया पर चीन की दादागिरी से एशिया में तनाव का माहौल पनप रहा है| इनसब के बीच चीन पाकिस्तान में जो कॉरिडोर बना रहा है, उससे उसकी पहुंच सीधे हिन्द महासागर तक हो जायेगी| फिर तो हिन्द महासागर में चीन की दादागिरी पूरे मध्य एशिया को अशांत कर देगी| चीन के इस रवैये का भारत सिर्फ विरोध ही कर सकता है, लेकिन चीन को सबक सिखाने के लिए उसे अमेरिका की सख्त दरकार है|

Image result for india america imageदूसरी तरफ अमेरिका एशिया और दक्षिण चीन सागर में चीन की बढती मनमानी को रोक नहीं पा रहा| इस स्थिति में उसने भारत के साथ जो एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल की संधि की है वो हर हाल में चीन के लिए चिंता पैदा करेगा| संभव है की भारत के बाजारों पर चीन का प्रभुत्व कम करने की दिशा में अमेरिका कोई कारगर कदम जरूर उठाएगा|
                                                 
इस तरह निष्कर्ष है की भारत की अमेरिका पर बढती निर्भरता हमारे लिए कुटनीतिक और सामरिक मोर्चे पर फायदेमंद है| उत्तर कोरिया और पाकिस्तान को मोहरा बनाकर विश्व शांति भंग करने की चीन की साजिश को दुनिया को नाकाम करना होगा| फिर भी हमें अमेरिका के स्वार्थी इतिहास को देखकर उससे दुरी बनाकर चलनी होगी और इनसब के बीच अपना हित तलाशना होगा...

लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...


न्यायपालिका की मनमानी कैसे रुके?

सरकार और न्यायपालिका के बीच टकराव संवैधानिक संकट पैदा करता है| लेकिन इस टकराव का कोई ख़ास प्रभाव न तो सरकार और न ही न्यायपालिका पर पड़ता है बल्कि इन दोनों के सर्वश्रेष्ठ होने की जंग में जनता मारी जाती है, उनका हक़ इनके बेमतलब के कायदों-कानूनों से छीनता रहता है| लोकतंत्र के सफल होने के शर्तों में न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका एक दुसरे के अनुपूरक हैं| संविधान में कार्यपालिका को विधायिका के प्रति जबकि विधायिका को जनता के प्रति जबावदेह बनाया गया है, वहीँ न्यायपालिका को स्वतंत्र रखा गया है| फिर सवाल है की स्वतंत्रता के बहाने असीमित अधिकारों के बलबूते किसी के अधिकार क्षेत्र में दखलंदाजी क्यों हो रही है? देश का सर्वोच्य पथप्रदर्शक बनने की कोशिश हमारे न्यायालय क्यों कर रहे हैं? जिनमें आलोचना सहने तक की क्षमता नहीं!

Image result for supreme court judgment imageलोकतंत्र की सबसे बड़ी शर्त है की उसके द्वारा चुनी हुई सरकार उनके प्रति उत्तरदायी हो| सांसद, विधायक जैसे भी हों चाहे गुंडे, मवाली या अरबपति क्यूँ न हों उन्हें हर अगले 5 साल में जनता को हिसाब देना होता है, उनको खरी-खोटी सुननी होती है| मतदाता चाहे जितना भी नासमझ हो या लालची, बिकाऊ हो वो अपने अधिकारों के लिए नेताओं के दरवाजे पर हक़ से ज्यादा है| इस तरह से क्षेत्र की जनता की बुनियादी समस्याओं को नेताओं से बेहतर कोई नहीं जानता| फिर भी जब जनता की बेहतरी के लिए योजनाओं का क्रियान्वयन किया जाता है तो कोर्ट स्टे आर्डर पारित करना अपना अधिकार मानती है| लेकिन ये अधिकार चुनाव प्रक्रिया या चुनाव सुधार के मामले में प्रभावी क्यूँ नहीं होती? न्यायपालिका निष्पक्ष है पर वो नेता, अभिनेता या अरबपतिओं पर भावनात्मक तौर पर त्वरित फैसले लेती है| देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में लाखों केस पेंडिंग हैं पर उनके लिए सरकार के बनाए कानूनों का रिव्यु, फिल्मों को प्रमाण पत्र देना या निचली अदालतों के फैसलों को नैतिकता के हवाले रद्द करना या फिर किसी ख़ास धर्म को दिशा दिखाना ज्यादा जरूरी है|

राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति बिल को रद्द करना लोकतंत्र में निष्पक्षता और स्वतंत्रता के नाम पर तानाशाही, अराजकता पनपना है| दुनिया का कौन सा ऐसा लोकतान्त्रिक देश हैं जो खुद की नियुक्ति खुद ही करता है? अगर कॉलेजियम प्रणाली जैसे ही संसद की समितियां खुद ही सांसद नियुक्त करने लगे तब क्या होगा? अमेरिका, जहाँ की न्यायिक पुरावलोकन की प्रक्रिया हमारे संविधान का स्त्रोत है, वहां भी सरकार के तीनों अंग एक दुसरे को नियुक्त करते हैं| लेकिन हम अपनी न्यायपालिका पर वैसा नाज नहीं कर सकते| कई विद्वान न्यायधीशों ने पहले भी कहा है की उपरी अदालतों में पहुँचने वाले आधे जज अयोग्य होते हैं| इसमें कोई संदेह नहीं की हमारे न्यायालय ने कई बार विषम परिस्थितियों में भी एतिहासिक निर्णय देकर देश और लोकतंत्र की रक्षा की है|
                                                                                                       
Image result for supreme court judgment imageहमारी न्यायपालिका अक्सर संविधान का रक्षक होने की दुहाई देकर तमाम योजनाओं, सरकारों और कार्यपालिका के सुचारू कार्यप्रणाली में बेवजह बाधा डालती है| तमाम तरह के गैर-जरूरी आदेशों और निर्णयों का बोझ चुपचाप हमें सहना होता है| फिर भी कोर्ट के कई निर्णय जनहितैषी व व्यवहारिक भी होते हैं लेकिन अधिकतर मामलों में कोर्ट के रवैया बेहद तल्ख़ और संदेहास्पद होता है|

वर्ष 1993 में देश के सुप्रीम कोर्ट ने खुद ही जजों को नियुक्त करने वाली कॉलेजियम व्यवस्था बना ली| देश का शासन उस वक्त घोटालों, आर्थिक सुधार व राजनीतिक हित से आगे इस मनमानेपन पर अंकुश लगाने की नहीं सोच सका| नतीजा यह हुआ की देश के सर्वोच्य अदालतों में फिल्मों के डायलाग और कविताओं, दोहों के आधार पर फैसले सुनाने वाले जज न्यायमूर्ति कहलाने लगे| जस्टिस काटजू जैसे जजों का सुप्रीम कोर्ट पहुंचना ताजा उदाहरण है| मतलब, संविधान की सही व्याख्या करने वालों की नियुक्ति का ही प्रावधान संविधान में नहीं है|
                                      
Image result for blind justice imageसवाल है की कोर्ट किसी मामलों की निर्णय में एकरूपता क्यूँ नहीं बना पाया? हर एक जजों के फैसले एक ही मामलों में अलग-अलग और विरोधाभाष लिए क्यूँ रहती है? अगर ऐसा है तो हम समझ सकते हैं की न्याय की परिभाषा नियम-कानून या संविधान से नहीं आती बल्कि वो जजों की मानसिकता, उनके फ़ालतू  विचारों की मोहताज होती है| क्या वाकई न्याय हो रहा? क्या वाकई संविधान की रक्षा हो रही है? क्या सच में देश में कानून का शासन है? या देश में हजारों-लाखों सालों से चली आ रही धर्म से लेकर समाज तक को दिशा दिखाने में 67 साल पुरानी न्यायपालिका और उसके संविधान के आगे यह बौनी है... सत्ता या शासन, देखते हैं कौन राज करता है और कब तक...

लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...